भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

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अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 3

का सम्पादन करना चाहता है तब उसका अन्तिम लक्ष्य तो कवि-प्रणीत हो ऐसे मौलिक पाठ की गवेषणा करना, अथवा कवि-प्रणीत होने की जिस में सब से अधिक सम्भावना है ऐसे पाठ का निर्धारण करना होता है।¹ इस अन्तिम लक्ष्य को सिद्ध करने से पहले, पाठसम्पादक को प्राचीन काल से चली आ रही शताधिक पाण्डुलिपियों में से सब से पुराने समय में लिखी गयी हो ऐसी पाण्डुलिपि के सहारे “प्राचीनतर” काल के पाठ को ढूँढना है। और प्राचीनतर पाठ का निश्चय करने के बाद, उस काव्यकृति पर लिखी गयी टीकाओं में प्रतिबिम्बित हो रहे प्राचीनतम पाठ को भी ढूँढना आवश्यक होता है। क्योंकि काव्यकृति की पाण्डुलिपियाँ तो दो सौ, तीन सौ साल से अधिक पुरानी होती नहीं है, जब कि उनके टीकाकार तो इन पाण्डुलिपियों के रचना-काल से कहीं अधिक प्राचीनतर काल में बैठे होते हैं। अतः किसी भी एक-कर्तृक काव्य के प्राचीनतम पाठ को उजागर करने के लिए टीका-ग्रन्थों का मूल्य निर्विवाद रूप से बहुत अधिक है।। प्रस्तुत सन्दर्भ में बंगाली पाण्डुलिपियों के आधार पर प्रॉफे. रिचार्ड पिशेल (1876) तथा डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980) ने अभिज्ञानशकुन्तल के बंगाली पाठ का समीक्षित पाठ-सम्पादन प्रकाशित किया है। लेकिन उसमें केवल नाटक के पाठ को संचरित करनेवाली बंगाली पाण्डुलिपियों का प्राधान्येन विनियोग हुआ है ऐसा दिखता है। यद्यपि उन दोनों महाशयों को चन्द्रशेखर की टीका का सुचारु परिचय है और उन्होंने उसका (प्राकृत उक्तियों के पाठ का निश्चय करने के लिए) बहुशः विनियोग भी किया है ऐसा कहा है। फिर भी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की टीका में प्रतिबिम्बित हो रहे पाठ के साथ बंगाली पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठ का तौलनिक अभ्यास करके बंगाली पाठपरम्परा का प्राचीनतर पाठ कौन सा हो सकता है उसका निष्कर्ष शायद नहीं निकाला है ऐसा लगता है। कहने का तात्पर्य यही है कि केवल नाट्यकृति के पाठ की पाण्डुलिपियों के आधार पर समीक्षित पाठसम्पादन तैयार करने से पहले उस नाट्यकृति की जितनी भी टीकायें उपलब्ध हो सकती हैं उनका प्रकाशन होना चाहिए। टीकाकार अतिप्राचीन काल के होने से उनके समक्ष निश्चित रूप से अधिक पुरानी पाठपरम्परा हो सकती है। अतः ऐसी प्राचीन काल की टीकायें पाठसम्पादन के कार्य में अधिक श्रद्धेय “सहायक सामग्री” मानी जाती हैं, जिसमें काव्यकृतियों की पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठ की अपेक्षा से अधिक प्राचीनतर पाठ सुरक्षित मिल सकता है। अतः प्रस्तुत टीका के सम्पादन से यह भी जानने को मिलेगा की बंगाली पाठ का प्राचीनतम स्वरूप कैसा रहा है।


  1. प्राच्यविद्या से सम्बद्ध साहित्य की कृतियों का पाठ पञ्चविध है। 1. अकर्तृक वेदसाहित्य (मन्त्रसंहितायें), 2. श्रुतसाहित्य (बुद्ध एवं महावीर की वाणी), 3. अनेककर्तृक रचनायें (सूत्र, रामायण-महाभारतादि), 4. एककर्तृक रचनायें (काव्य, शास्त्रग्रन्थ, भाष्यादि) एवं 5. उत्कीर्ण शिलालेखादि। द्वितीय-तृतीय प्रकार के पाठ के संशोधन में केवल प्राचीनतम पाठ का निर्धारण ही इष्ट माना जाता है।