अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 18, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें4 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
3. समीक्षणीय सामग्री के रूप में उपयुक्त पाण्डुलिपिओं का विवरण
टीकाकार चन्द्रशेखर चक्रवर्ती के द्वारा प्रणीत “अभिज्ञान-शकुन्तल-सन्दर्भदीपिका” (अपर नाम “अभिज्ञानशकुन्तल-विवरण”) नामक टीका की दो पाण्डुलिपियाँ दि इण्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लन्दन के डीस्क्रिप्टिव केटलॉग में, (1) san, ms, i.o. 77-a : Keith, 4117 एवं (2) san, ms, i-o-1398e : Keith, 4118 क्रमाङ्क से निर्दिष्ट हैं।।
(क) प्रथम मातृका (क्रमांक-77-अ.) 4117, जिसके फलक का आकार 12×08 इंच है और पीले कागज पर पुरानी बंगलिपि में लिखी गयी है। यह कुल मिला कर 38 फोलियो में परिसीमित है। प्रत्येक पृष्ठ पर 8 पङ्क्तियाँ लिखी हैं, तथा प्रत्येक पङ्क्त में प्रायः 76 अक्षर अंकित हैं। इस मातृका का लेखन-काल 1728 शकाब्द है, अर्थात् 1806 ई.स. में लिखी गयी है।।
(ख) द्वितीय मातृका (कोलंब्रुक कलेक्शन, क्रमांक-1398,) 4118 है, जिसमें 12×06 इंच का फलक है और पुराने पीले कागज पर लिखी गयी है। प्रत्येक पृष्ठ पर 10 पङ्क्तयाँ लिखी गयी हैं तथा प्रत्येक पङ्क्त में करीब 60 अक्षर अंकित हैं। यह पाण्डुलिपि 18वीं शताब्दी के प्रारम्भिक समय में बंगलिपि में लिखी गयी है। यह पाण्डुलिपि कुल मिला के 40 फोलियो में परिसीमित है। 22 से 36 क्रमाङ्क के फोलियो लिखनेवाला लिपिकार कोई अन्य व्यक्ति हो सकता है। पुष्पिका भी किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा लिखी गयी दिखती है। यह मातृका पहलीवाली से अधिक सुवाच्य है।
(ग) डॉ० श्रीदिलीपकुमार काञ्जीलाल ने (लन्दन में) ऊपर वर्णित दोनों पाण्डुलिपियों की एक प्रतिलिपि अपने हाथों से लिखी थी। उन्होंने वह कॉपी उनकी ओर से मुझे सहर्ष भेंट की है। मूल मातृकायें जहाँ भी अवाच्य या सन्देहास्पद थीं वहाँ पर उनकी लिखी हुई प्रतिलिपि का विनियोग किया गया है जिसके लिये मैं डॉ० काञ्जीलालजी के प्रति आभारी हूँ और प्रणामाञ्जलि के साथ उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।।
(घ) ऐसा संकेत मिलता है कि एक और पाण्डुलिपि भी बांग्ला देश की राजशाही लाईब्रेरी में सुरक्षित है, जिसका क्रमांक-4336 है। परन्तु वहाँ पर किये गये पत्राचार का कोई प्रत्युत्तर मिला नहीं है।
4. प्रस्तुत पाठसम्पादन का परिचय एवं स्वीकृत नियम
भूमिका:- पूर्व-निर्दिष्ट दोनों बंगीय लिपि में लिखी हुई पाण्डुलिपिओं में संचरित पाठ का सर्व प्रथम देवनागरी-लिप्यन्तरण किया जाना चाहिए। इस टीका का पाठ देवनागरी में उपलब्ध होने पर ही इसका विनियोग व्यापक फलक पर हो सकता है। तदनन्तर, द्वितीय सोपान पर पाण्डुलिपिओं में पढ़े गये पाठ का व्याकरणानुसारी शुद्धिकरण करना परम