भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 262 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 5

आवश्यक है। इसके लिये लिपिकार के प्रमादजन्य-स्खलनों को दूर करना तथा जहाँ भी कोई अवाच्यांश हो तो उस अंश का दूसरी पाण्डुलिपि के आधार पर विशदीकरण करना जरूरी है। दूसरी पाण्डुलिपि के पाठ से साथ पहली पाण्डुलिपि के पाठ का मिलान करते समय जो जो पाठभेद मिलते हैं उसका पादटीप में निर्देश किया गया है। दोनों प्रतियों का तुलनात्मक अभ्यास करके व्याकरण-शुद्ध एवं पूर्वापर सन्दर्भ में सुसंगत हो ऐसे पाठ का चयन करके, उसे आधुनिक विरामचिह्नादि के साथ, एक सुगम एवं परिष्कृत संस्करण तैयार करने का लक्ष्य रखा है।

भाष्य, वृत्ति, टीकादि रूप कृतियाँ अनेक-कर्तृक नहीं होने से (अर्थात् एक-कर्तृक होने के कारण ऐसे) टीका-ग्रन्थों के पाठ-सम्पादन में वाचनाभेद की प्रायः² समस्या नहीं होती है। अतः टीका-ग्रन्थ की दो प्रतियाँ जब समान काल में लिखी गयी हों तब उन दोनों में से किसी एक प्रति का पाठ, जो अधिक शुद्ध प्रतीत होता हो, उसको मुख्य आधार के रूप में स्वीकारना चाहिए। यदि उस आधारभूत प्रति में भी कुत्रचित् अवाच्यांश, अशुद्ध पाठ्यांश दिखायी दे तो वहाँ पर दूसरी प्रति का सहारा लेकर मूल पाठ का परिष्कृत स्वरूप तैयार किया जा सकता है। अतः प्रस्तुत टीका का देवनागरी लिप्यन्तरण और उसका एक परिशुद्ध संस्करण तैयार करना सम्पादक का प्रमुख कर्तव्य रहा है।

यहाँ जिन दो पाण्डुलिपियों का उपयोग किया गया है वह किसी एक पूर्वज पाण्डुलिपि से प्रतिलिपि करके तैयार की गयी प्रतीत होती हैं क्योंकि दोनों पाण्डुलिपियों के पाठ में प्रायः सर्वत्र समानता है। पाण्डुलिपि क्रमांक-4118 में कुत्रचित् एक या दो वाक्य अधिक हैं। अन्यथा समान पाठ्यांश मिलता है। अतः इन दोनों को हम समान वंशज प्रतियाँ कहेंगे। इन पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए पाठ्यांश का पूर्व इतिहास प्रतिलिपि-कर्ताओं ने कहीं पर भी लिखा नहीं है, किन्तु उसका अनुमान किया जा सकता है:-

“क्ष” (चन्द्रशेखर का अप्राप्य स्वहस्तलेख)

“ज्ञ” (अज्ञात पूर्वज प्रति)

4117 क्रमांक की वंशज पाण्डुलिपि ............ 4118 क्रमांक की वंशज पाण्डुलिपि

इस तरह से उपलब्ध की गयी दोनों पाण्डुलिपियों का सम्बन्ध अनुमित किया जा सकता है। (बांग्लादेश में इसी टीका की जो तीसरी पाण्डुलिपि होने की जानकारी मिलती है, वह अनुपलब्ध होने से उसका सम्बन्ध अभी नहीं सोचा जा सकता है।)


  1. कालिदास के पद्यकाव्यों के प्रथम टीकाकार कश्मीर के वल्लभदेव की टीका में ऐसी समस्या निश्चित रूप से है कि उसका शारदा लिपिवाली पाण्डुलिपियों का पाठ और देवनागरी पाण्डुलिपियों में मिलने वाला पाठ बहुशः भिन्न दिखायी देता है। अतः वहाँ वाचनाभेद की समस्या हो सकती है।