भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 262 में से

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6 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

इस सम्पादन में उपर्युक्त दोनों पाण्डुलिपियाँ एक समान पूर्वज से बनी हैं ऐसा दिखता है, इसलिए किसी एक पाण्डुलिपि का पाठ मुख्य रूप से स्वीकारा हो और दूसरी प्रति का पाठ गौण माना हो, ऐसा नहीं है। दोनों प्रतियों में मिल रहे समान पाठ्यांश में से जिसका पाठ कुत्रचित् अशुद्ध मालूम हुआ है, उसको पादटीप में रखा गया है। जहाँ दोनों में एक समान अशुद्धि दिख रही हो वहाँ पर पाठ की संशुद्धि प्रदर्शित करने के लिए निम्नोक्त कोष्ठकों का विनियोग किया गया है।।

(क) जहाँ किसी खण्डित या लुप्तांशवाले शब्द में किसी एक या दो वर्ण की पूर्ति करनी आवश्यक लगती है वहाँ [ ] इस तरह के कोष्ठक से क्षतिपूर्ति की गयी है।। उदाहरण के रूप में-[न] कदाचित् स[त्]पुरुषाः शोकपरवशा भवन्ति। (पृ. 203)

(ख) जहाँ पर लिपिकार के प्रमाद या अनवधान से किसी अनर्थक वर्ण का लेखन (=पुनर्लेखन) दिख रहा हो और उसे हटाना आवश्यक लगता है, उस निष्कास्य अंश को { } इस कोष्ठक में रखा गया है। उदाहरण रूप में-सखि, चपलः खल्वेष नूनम्। निवारयितुमेकाकिनी न पारयि{ष}ष्यसि। (पृ. 146)

(ग) किसी अशुद्ध पाठ्यांश के स्थान में सूचित शुद्ध पाठ को प्रदर्शित करने के लिए इस सामान्य ( ) कोष्ठक का विनियोग किया है।। (यहाँ पाण्डुलिपि में जो अशुद्ध मिलता है उसको पहले यथावत् रखते हुए सूचितांश को ही कोष्ठक में दिया गया है।) उदाहरण के रूप में-अत्र तावद् दुःस्व(ष)प्तम् स्मर। यतो राजरक्षितानि तपोवनानि। (पृ. 111)

(घ) किसी शुद्ध पाठ्यांश के स्थान में शुद्ध पाठ की कल्पना करना मुश्किल था उसको इस (?) तरह के निशान से अंकित किया है। उदाहरण रूप में-सोमवन्मनपत्यषे (?)। (पृ. 164)

(ङ) और जब पाण्डुलिपियों में कुछ अंश लुप्त या खण्डित मिलता है (और उसका पुनर्गठन सम्भव नहीं है) तो उसे ........ बिन्दुओं की लकीर से व्यक्त किया गया है।

सारांश यही है कि दोनों पाण्डुलिपियों का विवेक पुरस्सर विनियोग करते हुए प्रस्तुत टीका का पाठ परिष्कृत रूप में सम्पादित करने का उपक्रम रखा गया है। तथा उपर्युक्त विविध प्रकोष्ठों का विनियोग करने के साथ साथ अल्पविराम, पूर्णविरामादि का भी विनिवेश करके मूल पाठ्यांश को सुगम बनाने का भी लक्ष्य रखा है।

दूसरी महत्त्वपूर्ण स्पष्टता यह करनी है कि अकेले चन्द्रशेखर की टीका का पाठ प्रस्तुत करने से नाटक के किस पाठ पर टीका लिखी जा रही है वह तुरन्त नहीं मालूम होता है। अतः पहले नाट्यकृति का मूल पाठ देकर चन्द्रशेखर की तत्सम्बद्ध टीका उसके नीचे ही दी गयी है। यहाँ नाट्यकृति का जो पाठ दिया है वह प्रायः डॉ० रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति का अनुसरण करते हुए रखा है। एवं जहाँ पर भी डॉ० रिचार्ड पिशेल ने किसी श्लोक को

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