भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

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अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 7

“मूल पाठ” माना नहीं है, और उसे हटा दिया है, किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने ऐसे श्लोक पर टीका लिखी है तो उस श्लोक को यहाँ [ ] इस तरह के प्रकोष्ठ में रखा गया है। ऐसा करने से यहाँ तुलनात्मक दृष्टि से दो बातें ध्यान में आ सकेंगी कि चन्द्रशेखर ने कितने श्लोकोंवाले नाटक का पाठ स्वीकारा है, और चन्द्रशेखर ने जिन प्राकृत उक्तियों का संस्कृत-छायानुवाद दिया है उनमें से डॉ० रिचार्ड पिशेल ने कितनी सहायता प्राप्त की है। यद्यपि डॉ० पिशेल ने ऐसा कहा है कि उन्होंने प्राकृत उक्तियों के पाठ का निर्धारण करने के लिए चन्द्रशेखर की टीका से काफी सहायता ली है, फिर भी यहाँ प्रस्तुत हो रहे नाट्यकृति के पाठ और टीका को पाठ का तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करने से मालूम होगा कि कुछ ऐसे भी स्थान हैं जहाँ पर डॉ० पिशेल ने चन्द्रशेखर का अनुसरण नहीं किया है। यहाँ प्राकृत उक्ति के ध्वन्यात्मक स्वरूप-निर्धारण का प्रश्न तो द्वितीय सोपान पर आता है। किन्तु प्रथम सोपान पर तो उस उक्ति का, उसी स्वरूप में मूल नाटक में होना या नहीं होना-यह निश्चित करना ही महत्त्वपूर्ण बात बन जाती है। डॉ० पिशेल के प्राकृत भाषा के तलस्पर्शी ज्ञान को लेकर कोई विवाद नहीं हो सकता है किन्तु चन्द्रशेखर ने जिस प्राकृत उक्ति को मूल पाठ का अंश माना हो, और डॉ० पिशेल ने उसका त्याग किया हो या कुछ परिवर्तित पाठ को माना हो तो उन दोनों में से प्राचीनतर पाठ क्या हो सकता है? वह विचारणीय बनता है। इस दृष्टि से यहाँ केवल टीका का पाठ न देकर, नाटक के पाठ को (वह भी डॉ० पिशेल-अनुसारी) देकर, ठीक उसके नीचे ही टीका का पाठ देना उपयुक्त समझा है।

5. चन्द्रशेखर का परिचय एवं काल

अभिज्ञानशकुन्तल पर लिखी गयी जिस “सन्दर्भदीपिका” टीका का पाठ यहाँ प्रस्तुत हो रहा है उसके रचयिता बंगाल के चन्द्रशेखर चक्रवर्ती हैं। उन्होंने पुष्पिका में अपने बारे में निम्नोक्त जानकारी दी है:-उनके पिता का नाम श्री विष्णु पण्डित है, जिनको महामहोपाध्याय की उपाधि भी दी गयी थी। इसके अलावा और कोई जानकारी उन्होंने नहीं दी है। संस्कृत साहित्य के अनगिनत रचनाकारों में चन्द्रशेखर नामधारी व्यक्ति भी एकाधिक हैं।³ अतः अभिज्ञानशकुन्तल पर सन्दर्भदीपिका लिखनेवाले चन्द्रशेखर कौन थे यह निश्चित करना बड़ा मुश्किल कार्य है। डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने इस विषय में लिखा है कि


  1. एशियाटिक सोसायटी के कैटलॉग में लिखा है कि एक (1) चन्द्रशेखरपण्डित ने सन्दर्भचिन्तामणि टीका की रचना की है। दूसरे (2) चन्द्रशेखरवाचस्पति ने धर्मदीपिका लिखी थी। तथा तीसरे (3) चन्द्रशेखरशर्मा ने स्मृतिदुर्गमभञ्जनम् एवं तत्त्वचन्द्रिका की रचना की है। यह चन्द्रशेखर शर्मा नवद्वीप में स्थायी बने वारेन्द्र ब्राह्मण थे। महानाटक पर टीका लिखनेवाले एक (4) चौथे चन्द्रशेखर सर्वथा कोई भिन्न व्यक्ति ही हैं। श्रीराजेन्द्र लाल मित्र के मत से “महामहोपाध्याय चन्द्रशेखर” एवं “चन्द्रशेखर वाचस्पति” ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं। लेकिन इस अभिप्राय के समर्थन में उन्होंने कोई सबल तर्क नहीं दिया है।