अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 22, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें8 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
केटलॉगस केटलॉगोरम में चन्द्रशेखर नामधारी कुल 11 व्यक्ति निर्दिष्ट किये गये हैं। किन्तु अभिज्ञान-शकुन्तल पर “सन्दर्भदीपिका” टीका लिखनेवाला चन्द्रशेखर रङ्गभट्ट का पौत्र और विष्णु पण्डित का पुत्र है। इस विष्णु पण्डित की पहचान निश्चित नहीं है। प्रॉफेसर मोनियर विलियम्स एवं डॉ० ऑटो बोथलिंक के मतानुसार यह चन्द्रशेखर साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ के पिता थे। किन्तु प्रॉफेसर डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980) के मतानुसार ऐसा मानना उचित नहीं है। क्योंकि स्वयं चन्द्रशेखर ने अनेक स्थानों पर साहित्यदर्पण का उल्लेख किया है। अतः वह विश्वनाथ के पुरोगामी या पिता नहीं हो सकते हैं।⁴
चन्द्रशेखर ने अभिज्ञानशकुन्तल पर सन्दर्भदीपिका टीका लिखने के उपरान्त 1. शिशुपालवध पर सन्दर्भचिन्तामणि टीका, तथा 2. हनुमन्नाटक पर भी टीका लिखी है। चन्द्रशेखर ने इस सन्दर्भ-चिन्तामणि टीका में एक भावदत्त नामक विद्वान् का नामोल्लेख किया है। इस भावदत्त ने जो तत्त्वकौमुदी नामक ग्रन्थ लिखा है, जिसकी पाण्डुलिपि में लक्ष्मण संवत 572 का निर्देश है। अब लक्ष्मण संवत 572 में “शक संवत 1552” चल रहा था, जिसमें “ईसवीय 1630” चल रही थी। इस के आधार पर चन्द्रशेखर का समय ई. स. 1600 से 1650 के बीच में अनुमित किया जा सकता है।
प्रॉफेसर रिचार्ड पिशेल के मतानुसार (Die Recension der Śakuntala, p. 7) चन्द्रशेखर अभिज्ञान-शकुन्तल का सर्वोत्तम टीकाकार है। या यों कहें कि सब से बड़ा एवं बुद्धिमान् टीकाकार है। उसमें निष्पक्ष न्यायिक बुद्धि, सतर्क पाठसन्तुलन, उपलब्ध सामग्री का सही मूल्यांकन, परम्परा का समुचित ज्ञान एवं श्रद्धेय पाठ-निर्धारण की क्षमता होने से वह एक अच्छा पाठालोचक बन सका है। यद्यपि उसमें कुत्रचित् ज्यादा आत्मविश्वास दिखता है, एवं वह अपने नजदीक के पुरोगामी शंकर की ओर तीव्र-प्रतिक्रिया भी दिखाता है। बड़ा विद्वान् होने से उसने “महामहोपाध्याय” की उपाधि भी अर्जित की है।।
6. लिपिकार द्वारा दी गयी सूचनायें
चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की अभिज्ञानशकुन्तल नाटक पर लिखी गयी सन्दर्भदीपिका टीका की उपलब्ध की गयी दो पाण्डुलिपियों के लिखने वाले लेखक कौन थे? यह स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है। किन्तु उन्होंने इन पाण्डुलिपियों के अन्त में जो पुष्पिका के रूप में दो-चार पंक्तियाँ लिखी हैं उसमें से निम्नोक्त सूचनाएँ मिलती हैं। जैसे कि,
- But Chandrashekhar himself had quoted long passages from the Sahityadarpana and has referred to some of the emendations occuring in the Sahityadarpana, which clearly proves his posteriority to Vishvanatha.-D.K. Kanjilal, preface, p. 24