भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

अभिज्ञानशकुन्तलम् | प्रस्तावना | 9

इति महामहोपाध्याय-श्रीविष्णुपण्डित-तनूज- श्रीचन्द्रशेखर-चक्रवर्तिकृतावभिज्ञानशकुन्तलटीकायां (ज्ञान)सन्दर्भदीपिकायां⁵ सप्तमाङ्क-विवरणं समाप्तम्।। श्रीहरये नमः।। श्रीरामय नमः।। शकाब्दाः 1728।। ॐ गङ्गायै नमः।।

इससे यह सूचित होता है कि मातृका 4117 के अनुसार समग्र टीका का नाम “ज्ञानसन्दर्भदीपिका” है और मातृका 4118 के अनुसार “सन्दर्भदीपिका” नाम है। यद्यपि इसके अलावा टीका के आरम्भ में तो इस टीका का नाम केवल “सन्दर्भदीपिका” इतना ही दिया है। चन्द्रशेखर ने शिशुपालवध पर जो टीका लिखी है उसे “सन्दर्भचिन्तामणि” नाम दिया है जिससे सिद्ध होता है कि इस टीका का सही नाम “सन्दर्भदीपिका” ही होगा। प्रथमांक की पूर्ति होने पर दोनों ही पाण्डुलिपियों में ऐसी पुष्पिका दी गयी है-इति महामहोपाध्याय-श्रीविष्णु-पण्डित-तनुजन्म-श्रीचन्द्रशेखर-चक्रवर्ति-कृतावभिज्ञान-शकुन्तल-टीकायां प्रथमाङ्क-विवरणम्।। अन्यत्र अङ्कों की समाप्ति पर, संक्षेप में उसे एक अन्य नाम, “अभिज्ञानशकुन्तल-विवरण” से भी घोषित किया गया है तथा कुत्रचित् इतना भी नहीं लिखा है। केवल अमुक अंक समाप्त हुआ इतना ही बताया गया है।।

लिपिकारों के लेखन में कुछ विशेषतायें इस प्रकार दिख रही हैं:-

(क) दोनों पाण्डुलिपियाँ वंगीय लिपि में लिखी हुई हैं। लेकिन दोनों पाण्डुलिपियाँ लिखनेवाले व्यक्ति भिन्न भिन्न हैं। तथा मातृका 4117 का लेखन-काल शकाब्दाः 1728 है, जो ईसा का 1806 वर्ष होगा। मातृका 4118 की पुष्पिका में लेखनकाल नहीं है।।

(ख) यहाँ कुछ संयुक्ताक्षरों की वर्तनी में प्राचीनता झलक रही है। तद्यथा-अवग्रह, ज्ञ, ङ्क, इत्यादि। इसी तरह से वकार एवं रेफ की वर्तनी में बिन्दी के चिह्न से स्पष्टता लायी जा सकती थी, जो नहीं है।

(ग) पाण्डुलिपि क्रमांक-4117 में प्रायः सर्वत्र “प्रियंवदा” के स्थान में “प्रियम्वुदा” ऐसा शब्द रखा गया है, जो लिपिकार के अज्ञान या अशक्ति का दुष्परिणाम हो सकता है।

7. चन्द्रशेखर द्वारा स्वीकृत बंगाली पाठ का स्वरूप

चन्द्रशेखर की सन्दर्भदीपिका-टीका का सब से पहले जो परिचय देना आवश्यक है वह यह कि उन्होंने अभिज्ञानशकुन्तल पर टीका लिखते समय अपने समक्ष नैरन्तर्येण शङ्कर की रसचन्द्रिका टीका को रखा है। लेकिन शङ्कर के द्वारा स्वीकृत जो पाठ है उससे अपना साम्प्रदायिक बंगाली पाठ जहाँ जहाँ पृथक् है उसकी ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया ही है। उदाहरण के रूप में देखें तो-


  1. मातृका 4118 इत्यत्र तु केवलं “सन्दर्भदीपिकायाम्” इति लिखितं वर्तते।