भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 262 में से

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पृष्ठ 24

10              चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

(क) प्रथमाङ्के में सरसिजमनुविद्धम्० (1-19) श्लोक के बाद “अपि च” से अवतारित, कठिनमपि मृगाक्ष्या वल्कलं कान्तरूपम्० (1-20) ऐसा एक विशेष श्लोक चन्द्रशेखर ने माना है और उस पर व्याख्या की है। किन्तु यह श्लोक मैथिल पाठपरम्परा में नहीं होने से शङ्कर ने उस पर व्याख्या नहीं लिखी है। इस बात की जानकारी दिखाते हुए चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-पद्यमिदं दाक्षिणात्य-तीरभुक्तीयग्रन्थेषु न दृश्यते। अर्थात् यह श्लोक केवल बंगाल की पाठपरम्परा में ही प्रचलित है। वह दाक्षिणात्य (याने उत्कलीय-?) एवं तीरभुक्तीय (याने तिरहुत-बिहार) की परम्परा में कहीं पर भी नहीं मिलता है।।

(ख) प्रथमाङ्के में शकुन्तला की उक्ति है-अम्मो, नवमालिकामुज्झित्वा वदनं मे मधुकरः अभिलषति। इस पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि, शङ्करस्तु सलिलसेकसम्भ्रान्तो मधुकरो वदनं मे अभिलषति पीडयतीति पाठान्तरमाह। अर्थात् चन्द्रशेखर मैथिल पाठ में कुछ प्रक्षिप्त अंश है उसकी जानकारी रखते हैं।

(ग) तृतीयाङ्के में शकुन्तला की उक्ति है-तद्यदि वाम् अनुमतं ततः तथा प्रयतेथाम् यथा तस्य राजर्षेरनुकम्पनीया भवामि। अन्यथा स्मरतं माम्। इस पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-अन्यथा प्रसीदतं, सिञ्चतम् इदानीं मे उदकम्, मामुदकैः सिञ्चतमित्यर्थः इति शङ्करसम्मतः पाठोऽर्थश्च।। यहाँ “स्मरतम्” के स्थान पर “सिञ्चतम् उदकम्” जैसा पाठभेद मैथिल परम्परा में है।

(घ) तृतीयाङ्के में राजा की उक्ति है-सुन्दरि, किमन्यत्। इदमप्युपकृतिपक्षे सुरभि मुखं ते मया यदाघ्रातम्। ननु कमलस्य मधुकरः सन्तुष्यति गन्धमात्रेण।। (3-37) यहाँ पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-ननु निश्चये। न त्विति शङ्करः। तेनालिङ्गनमपि देहीति भावः इति व्याचष्टे दृष्टान्तः। यहाँ उपर्युक्त श्लोक में “ननु” के स्थान में मैथिल परम्परा में “न तु” इतना ही परिवर्तित किया हुआ जो पाठभेद है (और जिसके कारण पूरा वाक्यार्थ बदल जाता है), वह चन्द्रशेखर अच्छी तरह से जानते हैं ऐसा उन्होंने लिखा है।

(ङ) उसी तरह से चतुर्थाङ्के में प्रियंवदा की उक्ति है-अहो, आभरणार्हं ते रूपमाश्रमसुलभैः प्रसाधनैः विप्रकार्यते। इस पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि, आभरणान्ते अस्य वा रूपमाश्रमसुलभैः प्रसाधनैर्विप्रक्रियते पीड्यते। विप्रलभ्यत इति शङ्करः पठति।।

(च) पञ्चमाङ्के में शकुन्तला की उक्ति है-इदम् अवस्थान्तरं गते तादृशे अनुरागे किं वा स्मारितेन। अथवा, आत्मेदानीं मे शोधनीयः। भवतु। व्यवसिष्यामि। इस पर चन्द्रशेखर लिखते हैं कि, शङ्करस्तु शोचनीय इति पठित्वा, सदसि तादृशं रहस्यप्रकाशनात् त्रपया शोचनीया भविष्यसीति भावः इत्याह। भवतु, व्यवस्यामि रहस्यं वक्तुमिति शेषः। वदिष्यामीति शाङ्करः पाठः।