भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 262 में से

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पृष्ठ 25

अभिज्ञानशकुन्तलम् \quad\quad\quad\quad\quad\quad प्रस्तावना \quad\quad\quad\quad\quad\quad 11

इन उदाहरणों से यह निश्चित होता है कि चन्द्रशेखर ने बंगाली-लिपि में संचरित हुए (साम्प्रदायिक) पाठ का ही अनुसरण किया है। तथा वे, मैथिली पाठ से बंगाली पाठ कहाँ पर भिन्न पाठ परम्परावाला है, यह बहुत बारिकी के साथ दिखाते रहे हैं।

टीकाकार चन्द्रशेखर को बंगाल का परम्परागत (साम्प्रदायिक) पाठ अभिमत है। यह पाठ शङ्कर के द्वारा स्वीकृत मैथिली पाठ से कई स्थानों पर पृथक् ही है। उन्होंने इस मैथिल पाठपरम्परा को “शङ्करधृतः पाठ” के नाम से या “तीरभुक्तीय” (तिरहुत) के नाम से निर्दिष्ट किया है। अब यह भी ज्ञातव्य है कि चन्द्रशेखर ने अपने समय की कुछ और भी पाठपरम्पराओं का निर्देश किया है। जैसे कि-1. विदेशीय, 2. प्राचीनपुस्तक और 3. दाक्षिणात्य पाठपरम्परा। यहाँ विदेशीय पाठ शब्द से सम्भवतः काश्मीर या नेपाल की परम्परा का निर्देश हो सकता है। प्राचीनपुस्तक शब्द से तो केवल किसी प्राचीन काल की हस्तलिखित प्रति का ही उल्लेख करते हैं ऐसा मालूम होता है। लेकिन उन्होंने जो दाक्षिणात्य पाठपरम्परा का एक स्थान पर उल्लेख किया है वह भ्रम में डालनेवाला है। सामान्य रूप से दाक्षिणात्य शब्द से कोई भी व्यक्ति उसे दक्षिण भारत की पाठपरम्परा मानने को तैयार हो जायेगा। लेकिन चन्द्रशेखर ने जिन श्लोकों को दाक्षिणात्य पाठपरम्परा का श्लोक कहा है वह श्लोक दक्षिण भारत के एक भी अभिज्ञानशकुन्तल में नहीं मिलता है। जैसे कि-

अस्यास्तुङ्गमिव स्तनद्वयमिदं, निम्नेव नाभिः स्थिता
दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तौ समायामपि।
अङ्गे च प्रतिभाति मार्दवमिदं स्निग्धप्रभावाच्चिरं
प्रेम्णा मन्मुखमीषद्रीक्षत इव स्मेरा च वक्तीव माम्॥
\hfill (6–16)

इस श्लोक पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-पद्यमिदम् अनतिमधुरं दाक्षिणात्यपुस्तकेष्वेव दृश्यते। अब प्रश्न होता है कि यह दाक्षिणात्य परम्परा कहाँ की है? क्योंकि यह श्लोक दक्षिण भारत के एक भी टीकाकार, जैसे कि, काटयवेम, अभिराम, घनश्याम, श्रीनिवासाचार्य, नीलकण्ठ, चर्चा आदि के द्वारा किसी भी तरह से निर्दिष्ट नहीं है। अतः ऐसा सूचित होता है कि चन्द्रशेखर यहाँ “दाक्षिणात्य” शब्द से सम्भवतः उत्कलीय पाठ परम्परा का निर्देश कर रहे होंगे। उत्कल प्रदेश बंगाल से दक्षिण में कहा जा सकता है। और उत्कलदेशीय श्रीनवकिशोरकर शास्त्रीजी ने जो अभिज्ञानशाकुन्तल प्रकाशित किया है उसमें यह श्लोक है। इस दृष्टि से सोचने पर चन्द्रशेखर अपनी बंगाल की पाठ परम्परा को जानने के साथ साथ काश्मीर या नेपाल की, तीरभुक्तीय यानि बिहार की मैथिल एवं (बंगाल से दक्षिण में स्थित) उत्कल की पाठपरम्परा को भी जानते थे। चन्द्रशेखर ने चतुर्दिकू फैली पाठ परम्पराओं को जानने के बावजूद उनमें से अपनी बंगाल की पाठपरम्परा की अस्मिता बनाये रखने का जो उपक्रम रखा है उसीमें उसकी मूल्यवत्ता निहित है।