अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें| 12 | चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम् |
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यद्यपि यहाँ उल्लेखनीय है कि चन्द्रशेखर के द्वारा प्रस्तुत किये गये करीब 15 पाठान्तरों में से 4 पाठान्तर काश्मीरी पाठ के साथ संगत बैठते हैं। उदा. 1. कृतार्थेदानीम् गमिष्यसि। 2. नेदं विस्मरिष्यामि। 3. कृतावमर्षाम् अनुमन्यमानः। 4. कण्वाश्रम की गौतमी की पहचान देते हुए उसे कण्व की “धर्मभगिनी कनीयसी” कहा है, जो काश्मीरी पाठ के अनुरूप है। इसके अलावा अन्य सभी पाठान्तर प्रायः बंगाली वाचना के साथ संगत होते हैं।
प्रस्तुत चर्चा के उपसंहार में इतना कहेंगे कि चन्द्रशेखर ने कुल मिला कर 225 श्लोकोंवाले अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ पर टीका लिखी है। उन्होंने जिस पाठ को स्वीकार करके टीका लिखी है, वह बंगाल का परम्परागत पाठ है। यद्यपि यह उल्लेखनीय है कि प्रेमचन्द, डमरुवल्लभ एवं कृष्णनाथ जैसे सम्पादकों ने अतीत में बंगाली पाठ का जो (230 श्लोकोंवाला) एक प्रलम्ब पाठ प्रकाशित किया था उससे भिन्न पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है। इस तरह चन्द्रशेखर ने बंगाल का जो पाठ स्वीकारा है वह अधिक पुराना एवं प्रामाणिक है।
दूसरा ध्यातव्य बिन्दु यह भी है कि टीकाकार चन्द्रशेखर जिस बंगाली पाठ को पुरस्कृत कर रहे है वह डॉ० रिचार्ड पिशेल (1876 ई.सन्) द्वारा सम्पादित जो “समीक्षित पाठ” है, उससे कुत्रचित् भिन्न और शायद पुराना पाठ है। इस सन्दर्भ में, विद्वानों के समक्ष कुछ ठोस प्रमाण रखना आवश्यक है:-(क) डॉ० रिचार्ड पिशेल ने और डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलालजी ने बंगालीलिपि में लिखित पाण्डुलिपियों में प्रत्येक अङ्क की समाप्ति पर उन अङ्कों के जो विभिन्न नाम दिये हैं, जैसे-1. इत्याखेटको नाम प्रथमोऽङ्कः। 2. इत्याख्यानगुप्तिर्नाम द्वितीयोऽङ्कः। 3. इति शृङ्गारभोगो नाम तृतीयोऽङ्कः। 4. इति शकुन्तलाप्रस्थानं नाम चतुर्थोऽङ्कः। 5. इति शकुन्तला-प्रत्याख्यानं नाम पञ्चमोऽङ्कः। इत्यादि उसे स्वीकृत रखा है एवं उल्लिखित किया है। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने तो किसी भी अङ्क के नाम का निर्देश ही नहीं किया है। सम्भव है कि इस नाटक के अङ्कों का नामाभिधान करने का प्रघात चन्द्रशेखर के काल के पश्चात् शुरू हुआ हो। (ख) डॉ० रिचार्ड पिशेल ने और डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलालजी ने अपने समीक्षित पाठ में (तृतीयाङ्क के एक सन्दर्भ में) शकुन्तला की उक्ति इस तरह दी है: अज्जउत्त, एसा खु मम वुत्तन्तोवलम्भणणिमित्तं अज्जा गोदमी आअदा। ता विडवन्तरिदो होहि। (आर्यपुत्र, एषा खलु मम वृत्तान्तोपलम्भननिमित्तम् आर्या गौतमी आगता। ततो विटपान्तरितो भव।) यहाँ पर “समीक्षित पाठ” में, कण्व मुनि के आश्रम में रहनेवाली गौतमी कौन थी? उसकी कोई पहचान नहीं दी गयी है। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने अपनी टीका में उपर्युक्त प्राकृत उक्ति के संस्कृतच्छायानुवाद में लिखा है कि-आर्यपुत्र, एषा खलु तातकण्वस्य धर्म्मभगिनी कनीयसीवार्या गौतमी मम वृत्तान्तोपलम्भननिमित्तमागता। तद् विटपान्तरितो भव।। अर्थात् चन्द्रशेखर के सामने अभिज्ञानशकुन्तल की जो पाठ परम्परा है उसमें गौतमी को कण्व मुनि