भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 262 में से

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पृष्ठ 27

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 13

की छोटी धर्मभगिनी बताया गया है। (ग) रिचार्ड पिशेल की समीक्षितावृत्ति में कुल मिला कर 222 श्लोकोंवाला पाठ ग्राह्य रखा गया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने 225 श्लोकों पर टीका लिखी है। इसका निष्कर्ष यही है कि चन्द्रशेखर द्वारा पुरस्कृत बंगाली पाठ और “बंगाली वाचना का समीक्षित पाठ” के नाम से रिचार्ड पिशेल के द्वारा सम्पादित जो पाठ है उन दोनों में जो अन्तर है वह भी अतीव ध्यानास्पद है।

यद्यपि डॉ० रिचार्ड पिशेल ने ऐसा प्रकट शब्दों में कहा है कि उनका समीक्षित पाठ चन्द्रशेखर की टीका पर ही सम्पूर्णतया आधारित है।

Candraśekhara's text is the basis of the present edition- In the Appendix I have added his version of the Prakrit passages, and his various readings as far as they could be ascertained from his commentary.

(Pischel's Preface to the First Edititon p- 10);
Kalidasa's Śakuntala, Ed- Richard Pischel,
Harward University Press, Second ed. 1922

लेकिन अब जब चन्द्रशेखर की टीका का प्रथम बार प्रकाशन हो रहा है तब मालूम होता है कि रिचार्ड पिशेल का पाठ चन्द्रशेखर की टीका में स्वीकृत पाठ के साथ सम्पूर्णतया मिलता जुलता नहीं है। वह तो बहुशः बंगाली पाण्डुलिपिओं पर आश्रित है। अर्थात् उपलब्ध बंगाली पाण्डुलिपियों के समय से अधिक पुराने समय की यह टीका होते हुए भी, (और उसमें बंगाल का साम्प्रदायिक पाठ प्रतिबिम्बित हो रहा है फिर भी) प्राकृत उक्तियों का संस्कृतच्छायानुवाद देने के लिए भी उन्होंने सर्वत्र चन्द्रशेखर की टीका का अनुगमन नहीं किया है। एवमेव, संस्कृत उक्तियों का पाठ भी चन्द्रशेखर के द्वारा जो स्वीकृत है वह भी सूक्ष्मेक्षिका से ध्यान में नहीं लिया गया है। इस सन्दर्भ में कुछ उदाहरण देखने से यह बात और भी स्पष्ट होगी।

(क) तृतीयाङ्क में दोनों सहेलियों की उक्ति है:- अइ अत्तगुणावमाणिणि, को णाम संतावणिव्वाव-इत्तिअं सारदीअं जोण्हं आदवत्तेण वारइस्यदि। इसका संस्कृतच्छायानुवाद इस तरह से किया गया है: अयि आत्मगुणावमानिनि, को नाम संतापनिर्वापयित्रीं शारदीयां ज्योत्स्नाम् आतपत्रेण वारयिष्यति।। (3-17 के नीचे), लेकिन चन्द्रशेखर ने उसका अनुवाद इन शब्दों से किया है: आत्मगुणावमानिनि, को नाम सन्तापनिर्वाणकारिणीं शारदीयां ज्योत्स्नाम् आतपत्रेण वारयिष्यति।। यहाँ निर्वापयित्रीम् के स्थान में निर्वाणकारिणीम् ऐसा अनुवाद है।

(ख) चतुर्थाङ्क में शकुन्तला के सुशोभन के लिए वनस्पति ने जो आभरण, लाक्षारसादि दिये हैं उसको देख कर प्रियंवदा बोलती है कि-कोडरसंभवा वि महुअरी पोक्खरमहुं जेव अहिलसदि। इसका संस्कृतच्छायानुवाद डॉ० रिचार्ड पिशेल ने “कोटरसम्भवापि