अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 13
की छोटी धर्मभगिनी बताया गया है। (ग) रिचार्ड पिशेल की समीक्षितावृत्ति में कुल मिला कर 222 श्लोकोंवाला पाठ ग्राह्य रखा गया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने 225 श्लोकों पर टीका लिखी है। इसका निष्कर्ष यही है कि चन्द्रशेखर द्वारा पुरस्कृत बंगाली पाठ और “बंगाली वाचना का समीक्षित पाठ” के नाम से रिचार्ड पिशेल के द्वारा सम्पादित जो पाठ है उन दोनों में जो अन्तर है वह भी अतीव ध्यानास्पद है।
यद्यपि डॉ० रिचार्ड पिशेल ने ऐसा प्रकट शब्दों में कहा है कि उनका समीक्षित पाठ चन्द्रशेखर की टीका पर ही सम्पूर्णतया आधारित है।
Candraśekhara's text is the basis of the present edition- In the Appendix I have added his version of the Prakrit passages, and his various readings as far as they could be ascertained from his commentary.
(Pischel's Preface to the First Edititon p- 10);
Kalidasa's Śakuntala, Ed- Richard Pischel,
Harward University Press, Second ed. 1922
लेकिन अब जब चन्द्रशेखर की टीका का प्रथम बार प्रकाशन हो रहा है तब मालूम होता है कि रिचार्ड पिशेल का पाठ चन्द्रशेखर की टीका में स्वीकृत पाठ के साथ सम्पूर्णतया मिलता जुलता नहीं है। वह तो बहुशः बंगाली पाण्डुलिपिओं पर आश्रित है। अर्थात् उपलब्ध बंगाली पाण्डुलिपियों के समय से अधिक पुराने समय की यह टीका होते हुए भी, (और उसमें बंगाल का साम्प्रदायिक पाठ प्रतिबिम्बित हो रहा है फिर भी) प्राकृत उक्तियों का संस्कृतच्छायानुवाद देने के लिए भी उन्होंने सर्वत्र चन्द्रशेखर की टीका का अनुगमन नहीं किया है। एवमेव, संस्कृत उक्तियों का पाठ भी चन्द्रशेखर के द्वारा जो स्वीकृत है वह भी सूक्ष्मेक्षिका से ध्यान में नहीं लिया गया है। इस सन्दर्भ में कुछ उदाहरण देखने से यह बात और भी स्पष्ट होगी।
(क) तृतीयाङ्क में दोनों सहेलियों की उक्ति है:- अइ अत्तगुणावमाणिणि, को णाम संतावणिव्वाव-इत्तिअं सारदीअं जोण्हं आदवत्तेण वारइस्यदि। इसका संस्कृतच्छायानुवाद इस तरह से किया गया है: अयि आत्मगुणावमानिनि, को नाम संतापनिर्वापयित्रीं शारदीयां ज्योत्स्नाम् आतपत्रेण वारयिष्यति।। (3-17 के नीचे), लेकिन चन्द्रशेखर ने उसका अनुवाद इन शब्दों से किया है: आत्मगुणावमानिनि, को नाम सन्तापनिर्वाणकारिणीं शारदीयां ज्योत्स्नाम् आतपत्रेण वारयिष्यति।। यहाँ निर्वापयित्रीम् के स्थान में निर्वाणकारिणीम् ऐसा अनुवाद है।
(ख) चतुर्थाङ्क में शकुन्तला के सुशोभन के लिए वनस्पति ने जो आभरण, लाक्षारसादि दिये हैं उसको देख कर प्रियंवदा बोलती है कि-कोडरसंभवा वि महुअरी पोक्खरमहुं जेव अहिलसदि। इसका संस्कृतच्छायानुवाद डॉ० रिचार्ड पिशेल ने “कोटरसम्भवापि
14 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
मधुकरी पुष्करमधु एव अभिलषति।" ऐसा दिया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने जो संस्कृतच्छायानुवाद दिया है उसमें "पुष्करमधु" के स्थान पर "पुष्परसं मधु" ऐसा पाठ है। अर्थात् चन्द्रशेखर के सामने जो प्राकृत उक्ति होगी वह डॉ० रिचार्ड द्वारा स्वीकृत पाठ से भिन्न होनी चाहिए।
(ग) षष्ठाङ्क के आरम्भ में, धीवरक की उक्ति है:-सहये किल ये वि णिन्दिदे ण हु शे कम्म विवव्यणीअके। पशुमालिं कलेदिं दालुणं अणुकम्पामिदुले वि शोणिके।।(6-1), इसका डॉ० रिचार्ड पिशेल ने संस्कृतच्छायानुवाद इस तरह दिया हैः सहजं किल यद्यपि निन्दितं न खलु तत् कर्म विवर्जनीयम्। पशुमारणं करोति दारुणमनुकम्पामृदुलोपि सौनिकः।। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने जो संस्कृतच्छायानुवाद किया है वह चतुर्थ चरण में बहुशः भिन्न है। जैसे कि-सहजं किल यदपि निन्दितं न खलु तत् कर्म विवर्जनीयम्। पशुमारणं करोति कारणात् षट्कर्मा विदुरो श्रोत्रियः।। यहाँ रिचार्ड पिशेल ने बंगाली पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए पाठ की ओर ही ध्यान दिया है, और टीकाकार ने किस पाठ का आदर किया है वह नहीं देखा है। वस्तुतः पाठनिर्धारण के लिए पाण्डुलिपिओं की संख्या को निर्णायक न मान कर, टीकाग्रन्थों में संचरित हुए पुराने जमाने के पाठ का ही समादर करना चाहिए। क्योंकि प्रथम सोपान पर पाठसम्पादक का लक्ष्य तो प्राचीन से प्राचीनतर पाठ को उजागर करना ही हो सकता है।। लगता है कि रिचार्ड पिशेल ने यह नहीं सोचा है कि सौनिक (पशुघातक) को अनुकम्पामृदुल कैसे कहा जा सकता है? अर्थात् किसी अज्ञात ब्राह्मणपक्षपाती व्यक्ति ने ही श्रोत्रिय शब्द को परिवर्तित करके यह सौनिक वाला पाठ प्रस्तुत किया होगा। मतलब की कवि कालिदास के हाथ से तो श्रोत्रिय को ही अनुकम्पामृदु (अथवा षट्कर्मा विदुरः) कहा गया होगा।। यहाँ विशेष रूप से एक ही बात ध्यानार्ह है कि रिचार्ड पिशेल ने, (और इस सन्दर्भ में डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने भी) टीकाकार चन्द्रशेखर के द्वारा दिये गये श्रोत्रिय जैसे प्राचीनतर पाठ की ओर पूर्णतया ध्यान नहीं दिया है।
(घ) षष्ठाङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला का चित्र मँगवाता है और उसको देखते हुए एक श्लोक का उच्चारण करता है:-
अस्यास्तुङ्गमिव स्तनद्वयमिदं, निम्नेव नाभिः स्थिता
दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तौ समायामपि।
अङ्गे च प्रतिभाति मार्दवमिदं स्निग्धप्रभावाच्चिरं
प्रेम्णा मन्मुखमीषद्रीक्षत इव स्मेरा च वक्तीव माम्।।
\hfill 6-16
यद्यपि टीकाकार चन्द्रशेखर ने उस श्लोक की टीका में लिखा है कि "पद्यमिदम् अनतिमधुरं दाक्षिणात्यपुस्तकेष्वेव दृश्यते"। (हमारे अनुमान से यह दाक्षिणात्य पाठ
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बंगाल के दक्षिण में आया हुआ उत्कल प्रदेश होगा, क्योंकि काटयवेमादि दाक्षिणात्यादि टीकाकारों ने इस श्लोक को उल्लिखित ही नहीं किया है।) इस लिए डॉ० रिचार्ड पिशेल ने उसको अपने समीक्षित पाठ में स्थान नहीं दिया है। किन्तु रिचार्ड पिशेल ने यहाँ विदूषक की जो उक्ति को मान्यता दी है वह ध्यातव्य है:-भो भावमधुरा रेखा। स्खलति इव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु। किं बहुना, सत्त्वानुपवेशशङ्कया आलपनकौतूहलं मे जनयति।। यहाँ विदूषक की दृष्टि चित्रित शकुन्तला की देहयष्टि के निम्न एवं उन्नतप्रदेश पर स्खलन कर रही है-इस प्रकार की अभिव्यक्ति का सम्बन्ध तो स्पष्ट रूप से उपर्युक्त श्लोक के (वर्ण्य विषय के) साथ ही है। अतः रिचार्ड पिशेल को यदि विदूषक की यह उक्ति मान्य है तो फिर उपर्युक्त श्लोक को भी रखना चाहिए था। दूसरी तरह से यह बात कही जाय तो, यह दाक्षिणात्य अर्थात् उत्कलीय परम्परा का श्लोक समीक्षित पाठ के रूप में ग्राह्य नहीं है। क्योंकि टीकाकार चन्द्रशेखर के अभिप्राय से वह अनतिमधुर श्लोक है। तो फिर इस श्लोक के साथ सम्बद्ध विदूषक की जो उक्ति (भी अनतिमधुर) थी उसको भी निकाल देना चाहिए था। समीक्षित पाठ में से विदूषक की उक्ति को हटाने की आवश्यकता का कारण न केवल उस उक्ति का अनौचित्य ही है, किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने भी विदूषक की इस उक्ति का संस्कृत च्छायानुवाद नहीं दिया है। मतलब कि चन्द्रशेखर के सामने विद्यमान जो भी बंगाली पाठपरम्परा होगी उसमें विदूषक की उक्ति होगी ही नहीं, जिसके कारण चन्द्रशेखर ने उसका संस्कृतच्छायानुवाद नहीं दिया है। यह एक ऐसा ठोस कारण है जिसकी वजह से विदूषक की पूर्वोक्त उक्ति प्रक्षिप्त होने का इशारा मिल जाता है।
(ङ) तृतीयाङ्क का एक अन्य सन्दर्भ भी द्रष्टव्य है: दुष्यन्त कहता है कि सुन्दरि, जो मधुकर होता है वह कमल की गन्ध मात्र से सन्तुष्ट रहता है (3-37)। तब शकुन्तला प्रश्न करती है कि-असंतोषे पुनः किं करोति। जिसको सुनते ही राजा “इदम् इदम्”, बोलता हुआ शकुन्तला के प्रति प्रेमचेष्टा शुरू करता है। यहाँ पर एक रंगसूचना है:- “इति व्यवसितो वक्त्र ढौकते”। डॉ० रिचार्ड पिशेल ने इसी स्वरूप में उक्त रंगसूचना को छपवाया है। लेकिन इस रंगसूचना पर चन्द्रशेखर ने जो टीका लिखी है उसको यदि हम देखें तो लगता है कि रिचार्ड पिशेलजी चन्द्रशेखर की बात को समझ ही नहीं पाये हैं। चन्द्रशेखर ने लिखा है कि शकुन्तला वक्त्रं ढौकते गृह्णाति। ......। शकुन्तला कत्री वक्त्रं ढौकते, पिधत्त इत्यर्थः। न तु चुम्बतीत्यर्थः।। अर्थात् इस रंगसूचना में दुष्यन्त को क्या करना है और शकुन्तला को क्या करना है उसकी भिन्न भिन्न दो सूचनायें रखी गयी हैं। और इस लिए रिचार्ड पिशेल को इस रंगसूचना में इति व्यवसितः के बाद एक अल्पविराम का चिह्न रखना अनिवार्य था, (जो उन्होंने नहीं
16 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
रखा है)। क्योंकि टीकाकार चन्द्रशेखर ने साफ लिखा है कि शकुन्तला के मुख पर दुष्यन्त चुम्बन करता है ऐसा अर्थ नहीं है। अन्यथा आगे चल कर दुष्यन्त जो बोलता है कि "(अस्या मुखं) कथमप्युन्नमितं, न चुम्बितं तत्" इस पङ्क्ति से विरोध आयेगा। अतः यहाँ तो ढौकते का अर्थ पिधत्ते, याने शकुन्तला (स्वयं) अपना मुख हाथों से ढकती है ऐसा ही करना चाहिए। और रंगसूचना में पाठसम्पादक को बीच में अल्पविराम का चिह्न जोड़ना चाहिए। इस दृष्टि से देखने पर बंगाली पाठ का समीक्षित पाठसम्पादन करने में टीकाकार चन्द्रशेखर की टीका का पूरा अनुगमन नहीं किया गया है यह बात सिद्ध होती है।।
सारभूत बात यही है कि किसी भी कृति के समीक्षित पाठसम्पादन में मूल कृति की पाण्डुलिपियों के साथ साथ, उन पर लिखी गयी टीकाओं का विनियोग भी प्राचीनतर पाठ को उजागर करने के लिये असाधारण महत्त्व रखता है। चन्द्रशेखर की टीका जो अद्यावधि अप्रकाशित रही थी, उसका बंगाली पाठपरम्परा का प्राचीनतर स्वरूप पुनः संप्राप्त करने के लिए एक सहायक प्रमाण के रूप में महत्त्व अनुपेक्ष्य था।
8. चन्द्रशेखर की टीका का विश्लेषण
चन्द्रशेखर ने अपनी सन्दर्भदीपिका टीका में जिन ग्रन्थों का नाम-निर्देश किया है वह इस प्रकार है:- 1. नाट्यलोचन के रचयिता त्रिलोचन मिश्र, 2. वामदेव, 3. चतुर्भुज मिश्र, 4. भर्तृहरि मिश्र, 5. अमर, 6. शंकर, 7. मेदिनी, 8. भरत, 9. भविष्यपुराण, 10. शाश्वत, 11. अद्भुतसागर, 12. विश्व, 13. यज्ञ नारायण दीक्षित (15 शती के अन्त में) प्रणीत साहित्यरत्नाकर, 14. अनन्तार्णव, 15. दर्पणकार, (विश्वनाथ द्वारा रचित साहित्यदर्पण), 16. त्रिकाण्डशेष, 17. हारावली, 18. अमरटीका, और 19. प्राकृतप्रकाश इत्यादि। इन सब के निर्देशों की गिनती की जाय तो 209 से अधिक है। जब कोई टीकाकार अपनी अभीष्ट कृति पर टीका लिखता है तब वह शब्दार्थ से लेकर वाक्यार्थ एवं काव्य-सौन्दर्य तक की सीमाओं को विशद करने की कोशिश करता है। ऐसे कार्य में यदि विविध ग्रन्थों के सन्दर्भ की दीपिका भी प्रस्तुत की जाय तो वैसी "सन्दर्भदीपिका" टीका अधिक श्रद्धेय सिद्ध होती है। चन्द्रशेखर ने अनेक स्थानों पर विविध कोषग्रन्थ के उद्धरण, भरतमुनि के विधिविधान, प्राकृतसूत्रों का प्रमाण, अलङ्कारों की पहचान प्रस्तुत करके एक अच्छे टीकाकार की भूमिका निभायी है।
चन्द्रशेखर ने उपर्युक्त जिन जिन ग्रन्थकारों का निर्देश किया है उनमें से एक, अपने पुरोगामी टीकाकार शङ्कर का अनेक स्थानों पर जो उल्लेख किया है वह ध्यानार्ह है। शंकर, जिसने अभिज्ञानशकुन्तल की मैथिली वाचना पर "रसचन्द्रिका" नामक टीका लिखी है, उसका चन्द्रशेखर ने करीब 85 बार नामशः उल्लेख किया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने शङ्कर की टीका से कुत्रचित् प्रेरणा प्राप्त करते हुए भी, अपनी अस्मिता को बनाये रखा है। जैसा
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पहले बताया गया है चन्द्रशेखर ने शङ्कर के मैथिल पाठ से अपना बंगाली पाठ भिन्न है इस बात को केन्द्र में रखा है। अनेक स्थानों पर उन्होंने शंकर के द्वारा स्वीकृत पाठभेद को उल्लिखित किया है या शङ्कर के द्वारा किये हुए शब्दार्थ से मतभेद भी प्रदर्शित किया है। एवमेव, अनेक स्थान पर उसके दिये हुए शब्दार्थ की कड़ी आलोचना भी की है। उदाहरण के लिए—परिग्रहबहुत्वेपि द्वे प्रतिष्ठे कुलस्य नः। समुद्ररसना चोर्वी सखी च युवयोरियम्।। (3-23) यहाँ पर शङ्कर ने समुद्र-शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि, “समुद्र एव रसना मेखला यस्याः सा समुद्रावच्छिन्ना उर्वी मही युवयोरियं सखी शकुन्तला। तत्पक्षे समुद्ररसना सच्छिद्रमेखला। यद्वा समुद्ररसना साङ्गुरीयकमेखला। यद्वा मुदं हर्षं, राति ददाति, मुद्रं हर्षदं यद् रसनं भाषणं, तेन सह वर्तते, समुद्ररसना प्रियभाषिणीत्यर्थः।।” (मिथिलासंस्करण, 1957, पृ. 218) यहाँ समुद्ररसना का अर्थ “प्रियभाषिणी (शकुन्तला)” करने के लिए निर्वचन का जिस तरह से आश्रयण किया गया है, वह पाण्डित्य-प्रदर्शन का उत्तम निदर्श है। और राघवभट्ट भी उसका अनुसरण करने को लालायित हो गये हैं, फिर भी चन्द्रशेखर की दृष्टि में तो वह अग्राह्य ही है। उन्होंने अपनी टीका में स्पष्ट शब्दों में लिख दिया है कि कुव्याख्या तूपेक्षिता।
इसमें, इन सब के साथ चन्द्रशेखर का मुख्य योगदान है प्राकृत उक्तियों का संस्कृतच्छायानुवाद। यहाँ एक स्पष्टता सविशेष करनी है कि शङ्कर ने नाटक की प्राकृत उक्तियों की व्याख्या की है, किन्तु चन्द्रशेखर ने ऐसी उक्तियों का सीधा संस्कृतच्छायानुवाद दिया है। इसी लिए इस नाटक की प्राकृत उक्तियों के पाठनर्धारण में यह टीका अधिक उपकारक सिद्ध होती है। द्वितीयाङ्क के आरम्भ में विदूषक की उक्ति है। यहाँ चन्द्रशेखर के सामने इस उक्ति के अभिनयन की दो विधायें होगी। अतः उनकी टीका में दो पाठान्तरों के साथ विवरण दिया जाता है। जैसे कि, हीमाणेहे-शब्दः प्राकृते खेदे। तदाह भरतः—हीमाणहे भये खेदे इति।। ही ही भोः इति च पाठः। ही ही भोः शब्दो विस्मये। यदाह भरतः—ही ही भो विस्मयार्थे तु प्रयुञ्जीत विदूषक इति।। विदूषक की उक्ति का आरम्भ दो तरह से होता है—यह बात चन्द्रशेखर ठीक तरह से जानते हैं, जिसके लिए भरत मुनि का ही वचन प्रमाण के रूप में विद्यमान है यह भी वे जानते हैं। डॉ० रिचार्ड पिशेल ने चन्द्रशेखर की प्राकृतभाषा विषयक ऐसी जानकारी को देख कर ही, उसकी टीका को अधिक प्रमाणभूत माना था।
शङ्कर काव्यार्थ-ग्रहण में अलंकार का निरतिशय महत्त्व स्वीकारते हैं, और अनेक जगहों पर विभिन्न अलङ्कारों का अभिज्ञान भी करवाते हैं। चन्द्रशेखर ने जो अनेक स्थानों पर शङ्कर का मत उल्लिखित किया है, इसका एक फायदा यह हुआ है कि शङ्कर की रसचन्द्रिका टीका का पाठ षष्ठांक के मध्य भाग 6/12 से लेकर सप्तमांक के आरम्भ तक कुछ भाग खण्डित हुआ है। तो लिपिकारों ने इतने खण्डित अंश के स्थान में चन्द्रशेखर की टीका का भाग उठाकर उनकी थीगड़ी लगा दी है! ऐसा करने का मुख्य कारण एक ही था
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कि चन्द्रशेखर ने अपनी टीका में आरम्भ से लेकर अन्त तक बार बार शंकर का मत उद्धृत किया है। अतः जहाँ पर भी शंकर की टीका खण्डित हुई है उसका कुछ कुछ अन्दाजा चन्द्रशेखर की टीका से मिल सकता था। यह बात रिचार्ड पिशेल (1876) ने लिखी थी कि शंकर की टीका का खण्डितांश चन्द्रशेखर की टीका से पूर्ण किया गया है, लेकिन मैथिली पाठ के सम्पादक श्री रमानाथ झा (1957) को इसकी जानकारी ही नहीं थी। इस लिए उन्होंने ऐसा लिखा है कि किसी लिपिकार ने शङ्कर की विस्तृत टीका का इतने भाग में संक्षेप कर दिया है।⁶ सम्भव है कि रमानाथ झा ने रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति ही नहीं देखी हो।
इनके अलावा चन्द्रशेखर ने नाट्यशास्त्रीय परिभाषाओं को विशद करने के लिए बहुत स्थानों पर भरत मुनि का नामोल्लेखपूर्वक उद्धरण दिये हैं। तथा नाट्यलोचन, कविकल्पलता, साहित्यदर्पणादि का भी विनियोग किया है। चन्द्रशेखर “अन्ये, केचिद्, गुरवः” जैसे शब्दों से किन का निर्देश करना चाहते हैं वह हम नहीं जान सकते हैं। उन्होंने विश्वनाथ के द्वारा अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क के अन्तिम श्लोक में “कथमपि उन्नमितं न चुम्बितं तत्” के स्थान पर “कथमपि उन्नमितं न चुम्बितं तु” जैसा पाठभेद स्वीकारा गया है, एवं पञ्चम अङ्क के पञ्चम श्लोक में जो नवीन पाठान्तर की उद्भावना की है उसका उल्लेख भी किया है। वे लिखते हैं कि—दर्पणकारेण तु नवीकृतपाठान्तरेण पद्यम् इदमुदाहृतम्। (यहाँ पर वे विश्वनाथ को अपने पिता के रूप में उल्लिखित नहीं करते हैं। टीका की पुष्पिका में तो उन्होंने अपने आप को विष्णु पण्डित का पुत्र कहा है।) एवमेव, गाहन्तां महिषाः (1- 10) श्लोक पर उन्होंने काव्यदोष के सन्दर्भ में जो चर्चा प्रस्तुत की है उसमें “प्राज्ञ” शब्द से महिमभट्ट के मत का निर्देश भी किया है।
अभिज्ञानशकुन्तल एक नाटक होने से उसमें दो चरित्रों के बीच में जो बातचीत होती है, जो संवाद होते हैं, उसमें नाना अव्ययों का विनिवेश बहुशः होता है। अतः इन अव्ययों का सन्दर्भगत अर्थ स्पष्ट करने की जिम्मेवारी टीकाकार की होती है। इस कार्य को शङ्कर ने तो किया ही था, लेकिन चन्द्रशेखर ने उसमें भी कुत्रचित् कुछ विशेष भी जोड़ा है, कुछ अलग भी अर्थ दिखलाये हैं। यह भी एक महनीय सेवा कही जा सकती है। एक उदाहरण देखना आवश्यक हैः प्रथमाङ्क में, न खलु न खलु० वाले (1-10) श्लोक में “क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं, क्व च निशितनिपाताः सारपुङ्खा शरास्ते।” इस पङ्क्ति में दो बार क्व निपात का विनिवेश किया गया है। यहाँ पर शङ्कर ने क्व-द्वय के प्रयोग का
- It is much more reasonable to belive that this protion is an abridgement from the original commentary by a scribe, who had, perhaps, no time to make a complete copy of the manuscript which he was transcribing. See: The Abhijñanaśakuntalam, with the commentaries of Śankara & Narahari, Ed. Ramanath Jha, Darbhanga, 1957, p. 27.
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समाधान देते हुए कहा है कि विस्मय और विषाद प्रदर्शित करने के लिए क्व की पुनरुक्ति दोषजनक नहीं मानी जाती है। लेकिन चन्द्रशेखर के मत में ऐसा व्याख्यान तो कुव्याख्यान है। अतः उसका स्वारस्य स्पष्ट करने के लिए चन्द्रशेखर ने अपने किसी गुरुजी का मत लिखा है। उसमें कहा है कि धनुर्धारी व्यक्ति के लिए दो पौरुष गिने जाते हैं। एक, दुर्भेद्य वस्तु का भेदन करना और दूसरा, दुर्मर व्यक्ति को मारना। लेकिन प्रकृत में तो पुष्प में ऐसा कोई दुर्भेद्यत्व नहीं है और हरिण में दुर्मरत्व नहीं है। इस तरह अत्यन्त असम्भवित बात के लिए क्व-द्वय का प्रयोग होता है। इस तरह से चन्द्रशेखर ने अन्यत्र भी अमर, त्रिकाण्डशेष, अमरटीका, विश्व, मेदिनी, शाश्वत, हारावली, कोष इत्यादि का विनियोग किया है तथा आवश्यकता होने पर अमुक शब्द का देशी भाषा में क्या अर्थ होता है वह भी लिखा है। (इन सभी सन्दर्भग्रन्थों की सूची को परिशिष्ट-2 में रखा गया है।)
चन्द्रशेखर के द्वारा प्रस्तुत किये गये करीब 15 पाठान्तरों में से कुछ पाठान्तर काश्मीरी वाचना के साथ संगत बैठते हैं। उदा. 1. प्रथमाङ्क में, नेदं विस्मरिष्यामि। 2.चतुर्थाङ्क में, कृतावमर्षाम् अनुमन्यमानः। 3. तृतीयाङ्क के अन्त भाग में, कण्वाश्रम की गौतमी की पहचान देते हुए उसे कण्व की “धर्मभगिनी कनीयसी” कहा है, जो काश्मीरी पाठ के अनुरूप है। इसके अलावा अन्य सभी पाठान्तर प्रायः बंगाली वाचना के साथ संगत होते हैं।
चन्द्रशेखर ने कुल मिला कर 225 श्लोकोंवाले अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ पर टीका लिखी है। उन्होंने जो पाठ स्वीकार कर टीका लिखी है, वह बंगाली वाचना का परम्परागत पाठ है। यद्यपि यह उल्लेखनीय है कि प्रेमचन्द, डमरूवल्लभ एवं कृष्णनाथ ने भूतकाल में बंगाली वाचना का जो (230 श्लोकोंवाला) एक प्रलम्ब पाठ प्रकाशित किया था उससे भिन्न पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है। इस तरह चन्द्रशेखर ने बंगाली वाचना का जो पाठ स्वीकारा है वही अधिक प्रामाणिक लगता है। चन्द्रशेखर ने प्राचीनतम पाण्डुलिपियों में संचरित बंगाल के साम्प्रदायिक पाठ को ही स्वीकारा है। कुछ श्लोकों का पाठ प्राचीन काल से पाण्डुलिपियों में संचरित होते हुए भी उसको प्रक्षिप्त भी बताया है। उदाहरण के रूप में-कठिनमपि० (1-20), तुम्हे .. महिलाः। (5-24), अ(त)स्याः तुङ्गमिव० (6-16) इत्यादि। इसके आधार पर कह सकते हैं कि बंगाली वाचना का जो पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है, वह अपेक्षाकृत अधिक श्रद्धेय है, और उसमें प्रक्षिप्तांश कम हैं।
बंगाली पाठ की मौलिकता के समर्थक कृतिनिष्ठ प्रमाण
0-0 महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का मूल पाठ कैसा होगा? यह प्रश्न निरतिशय विवादास्पद होते हुए भी विद्वानों के लिये अनुपेक्ष्य है। क्योंकि, किसी भी एक-कर्तृक काव्य के पाठ की मौलिकता जब तक सिद्ध नहीं होती है तब तक उसके काव्यशास्त्रीय गुण-दोष की चर्चा करना, या उसमें से किसी भी तरह का काव्यार्थ निकालना
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विवादास्पद एवं कदाचित् अन्यथासिद्ध हो सकता है। अतः काव्य की साहित्यशास्त्रीय समीक्षा करने से पहले उसके पाठ की आलोचना करना अनिवार्य है।
0-1 अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का पाठ मुख्य रूप से दो-लघु और बृहत्-पाठपरम्पराओं में प्रचलित हुआ है। किन्तु, इस नाटक की रचना एक ही कवि ने की है, अर्थात् यह नाटक एककर्तृक है तो उसका मूल पाठ भी एक ही स्वरूप का होना अपेक्षित है। दो तरह का अभिज्ञानश(शा)कुन्तल तो कालिदास ने नहीं लिखा होगा। अतः हमें यह ढूँढना ही चाहिये कि इस नाटक की दो तरह की पाठपरम्पराओं में से किसका पाठ मौलिक होने की सम्भावना ज्यादा है। तार्किक दृष्टि से सोचा जाय तो यहाँ दो तरह की सम्भावनायें दिखायी देती हैं। जैसे कि, 1. कालिदास-प्रणीत मूल पाठ लघु-आकार का, अर्थात् लघुपाठ होगा, और परवर्ती काल में उसी मूल पाठ में नाट्यप्रयोग के दौरान कुछ नये अंश जोड़े गये होंगे। इस तरह शाकुन्तल का बृहत् पाठ कालान्तर में तैयार हुआ होगा। अथवा 2. महाकवि के द्वारा नाटक का बृहत्पाठ ही पहले से लिखा गया होगा और कालान्तर में उसमें से कुछ अंश काट-छाट कर (रंगभूमि की आवश्यकतानुसार और सीमित समय में जिसकी प्रस्तुति हो सके ऐसा) संक्षिप्त (लघु) पाठ तैयार किया गया होगा। अतः यह कहना मुश्किल है कि महाकवि कालिदास ने ही अपने हाथ से लिखा हो ऐसा (मौलिक) पाठ इन दोनों में से कौन सी पाठपरम्परा में सुरक्षित रहा होगा? इस सन्दर्भ में, नाटक की काव्यशास्त्रीय दृष्टि से आलोचना करके विद्वानों ने दो पक्ष बना लिये हैं-देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित लघुपाठ ही अधिक व्यञ्जनापूर्ण है, इसलिए उसीको श्रद्धेय पाठ परम्परा मानना चाहिए। तथा बंगाली और मैथिली पाठ में स्थूल शृङ्गारिक दृश्यावली ज्यादा है,⁷ अतः उसमें मौलिक पाठ का होना संशयग्रस्त है। दूसरी ओर, अल्पसंख्यक विद्वान् ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि देवनागरी वाचना का संक्षिप्त पाठ तो कालान्तर में बनाया गया है।
बंगाली पाण्डुलिपिओं में संचरित हुआ पाठ ही मौलिक है ऐसा कहनेवालों में सर्वप्रथम कोलकाता के प्रॉफेसर डॉ० श्री दिलीपकुमार काञ्जीलाल (Kanjilal, A reconstruction of the Abhijñānaśakuntalam, 1980) का प्रयास अतीव ध्यानास्पद है। उन्होंने अनेकानेक प्रमाणों से यह स्थापित किया है कि बंगालीलिपि में संचरित हुआ पाठ ही सर्वाधिक श्रद्धेय है, एवं प्राचीनतम भी है। सम्माननीय विद्वान् डॉ० श्री काञ्जीलाल ने अपने मत के समर्थन में जो प्रमाण दिये हैं वे श्रीहर्ष की नाटिकायें एवं काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के उद्धरणादि रूप बाह्य प्रमाण हैं। अब यहाँ बंगाली पाठ की मौलिकता
- बङ्गीय पाठ में प्रथम मिलन में ही शकुन्तला अठखेलियाँ करती दिखायी गयी है, जो कालिदास की प्रवृत्ति से विरुद्ध है।। कालिदासः अपनी बात (भारतीय दृष्टि) डॉ० रेवाप्रसाद द्विवेदी, कालिदास संस्थान, वाराणसी, 2004, पृ० 54
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 21
के सविशेष समर्थक बन सके ऐसे कुछ आन्तरिक प्रमाण, जो सर्वथा कृतिनिष्ठ ही हैं, उसकी ओर सहृदयों का ध्यान आकृष्ट किया जाता है$^8$।
1-1 प्रो. श्री एस. के. बेलवलकर जी ने सब से पहले इस बात की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है कि देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित हुए अभिज्ञानशाकुन्तल के (तृतीयाङ्क के) पाठ में समयसम्बन्धी जो सूचना दी गयी है, उनमें अन्तर्निहित एक विसंगति खटकनेवाली है। जैसे कि-तृतीयाङ्क का आरम्भ मध्याह्न में होता है। नायक दुष्यन्त उग्र-आतपवाले मध्याह्न में शकुन्तला को ढूँढ़ने के लिए मालिनी नदी के आसपास लतावलयों में जाता है।$^9$ उसके बाद पुष्पशय्या पर लेटी हुई शकुन्तला रंगमंच पर आती है, उसके साथ दो सहेलियाँ भी है। यहाँ क्रमशः शकुन्तला की शरीरबाधा का कारण उन्मीलित होता है, शकुन्तला मदनलेख लिखती है और राजा प्रकट होकर शकुन्तला को अपने कुल की प्रतिष्ठा के रूप में बताता है। इसको सुन कर आश्वस्त हुई दोनों सहेलियाँ मृगबाल को उसकी माता के पास पहुँचाने का बहाना बनाकर (नायक-नायिका को एकान्त देने के लिए) वहाँ से चली जाती हैं। अब एकाकिनी शकुन्तला लतामण्डप से बाहर चली जाने को तत्पर होती है तो राजा उसे कहते हैं कि-"सुन्दरि, अपरिनिर्वाणो दिवसः। इयं च ते शरीरावस्था। उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनीदल-कल्पितस्तनावरणम् आतपे गमिष्यसि परिबाधा पेलवैरङ्गैः। (3-19) (इति बलादेनां निवर्तयति।)" यहाँ दुष्यन्त ने साफ बताया है कि अभी दिवस परिणत नहीं हुआ है। लतामण्डप से बाहर कड़ी धूप में तुम कैसे जाओगी? किन्तु, देवनागरी वाचना के पाठ में दुष्यन्त के इस वाक्य से सूचित होता है कि यह मध्याह्न का समय चल रहा है। उसके बाद नायक-नायिका के बीच केवल पाँच-छह संवाद ही होते हैं और तुरन्त नेपथ्य से कहा जाता है कि-चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी। हे चक्रवाकी, अपने प्रियसहचर से बिदा ले लो, रात्रि का आगमन हो गया है।। इस तरह से देवनागरी पाठ में, मध्याह्न में शुरू हुई एकान्त मिलन की घटना केवल पाँच-छह संवादों में समेट ली जाती है और तुरन्त रात्रि का आगमन होने की सूचना दी जाती है। सुज्ञ प्रेक्षक देख सकेगा कि मध्याह्न एवं रात्रि के बीच में कितना लम्बा अन्तराल पड़ा है और इस समयावधि में पाँच-छह संवाद से कहीं अधिक बातचीत एवं घटना घटित होना अपेक्षित है। लेकिन देवनागरी पाठ में ऐसा कुछ विस्तार है ही नहीं। अतः सिद्ध हो जाता है कि देवनागरी पाठ में अनेक संवादों की भारी कटौती की गयी है।
- डॉ० एस.के. बेलवलकरजी, पूना ने "निसर्ग-कन्या शकुन्तला" (कालिदास-ग्रन्थावली, अनु. सीताराम चतुर्वेदी, अलीगढ़, 1963) शीर्षक वाले आलेख में जो उदाहरण प्रस्तुत किये हैं वे आन्तरिक सम्भावना के बलवत्तर उदाहरण हैं।
- क्व नु खलु संस्थिते कर्मणि सदस्यै रनुज्ञातः श्रमक्लान्तमात्मानं विनोदयामि। (निःश्वस्य) किं न खलु मे प्रियादर्शनादृते शरणमन्यत्। यावदेना मन्त्रामयिष्यामि। (सूर्यम् अवलोक्य) इमामुग्रातपवेलां प्रायेण लतावलयवत्सु मालिनीतीरेषु ससखीजना शकुन्तला गमयति। तत्रैव गच्छामि। -अभिज्ञानशाकुन्तलम्, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, 2006, पृ. 87
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इसके प्रतिपक्ष में, बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में मध्याह्न, सायन्सन्ध्या¹⁰ और फिर रात्रि का सन्दर्भ स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है। इससे भी सूचित होता है कि बंगाली पाठ में मौलिकता की सुरक्षा हुई होगी। जिसके कारण देवनागरी अभिज्ञानशाकुन्तल के तृतीयाङ्क में जहाँ 24 श्लोक हैं, वहाँ बंगाली अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क में 41 श्लोकों का विस्तार है। सारतः कहा जाय तो तृतीयाङ्क में संक्षेप या प्रक्षेप का निर्णय समय-संगति को ध्यान में लेकर करना चाहिए, वही एक अकाट्य दृढ़ आन्तरिक प्रमाण है।
2-0 दूसरे प्रमाण के रूप में कवि की नाट्य-शैली को परखना चाहिए। जो नाट्य-शैली समग्र कृति में साद्यन्त व्याप्त है ऐसा दिखता है तो वही एक सबल आन्तरिक प्रमाण है। पाठालोचना में ऐसे ही प्रमाण को पुरस्कृत करते हुए समीक्षित पाठ की उच्चस्तरीय समीक्षा की जाती है। अभिज्ञानशकुन्तल नाटक के वस्तुग्रथन में "एक दृश्य (रूप) के सामने उसी प्रकार का एक दूसरा प्रतिदृश्य (प्रतिरूप)" खड़ा करने की नाट्य-शैली दिखायी दे रही है। जैसे कि, प्रथम अङ्क में शिकारी दुष्यन्त का प्रवेश होता है और "न हन्तव्यो, न हन्तव्यः" ऐसे शब्द सुनायी पड़ते हैं। तो सप्तम अङ्क में जब सिंहशावक को सतानेवाला सर्वदमन भरत का दृश्य शुरू होता है तो वहाँ पर "मा खलु, मा खलु चापलं कुरु" ऐसे शब्द नेपथ्य से आते हैं। उसी तरह से द्वितीयाङ्क और षष्ठांक की तुलना भी विचारणीय है। वहाँ पर विदूषक राजा के मृगया-व्यसन से क्षुधातुर, तृषातुर और श्रमातुर स्थिति में दयाजनक पीड़ा का अनुभव करता है। लेकिन उसी अङ्क के अन्त में वह राजा को आश्रम में रहने की अनुकूलता प्रदान करने में सहायक होता है और युवराज होकर रंगभूमि से बिदा होता है। इसी दृश्य के सामने षष्ठांक के प्रवेशक में, धीवर नगररक्षकों के हाथ से मारा-पीटा जा रहा है। निर्दोष मछेरा भी दयाजनक पीड़ा का अकारण अनुभव करता है। लेकिन वह भी राजा के लिए दुःषन्त-नामधेयांकित अंगूठी देता है, जो राजा को शकुन्तला की याद दिलाने में सहायक होती है। अब यह धीवर भी शूली से उतर कर हस्तिस्कंध पर आरोहित होने का संतोष लेकर रंगभूमि से बिदा लेता है। तृतीय अङ्क में विटपान्तरित दुष्यन्त शकुन्तला की मदनावस्था को सुनता है (शाकु. 3/8 के बाद) तब बोलता है "श्रुतं श्रोतव्यम्।" फिर वही दुष्यन्त पञ्चमाङ्क में शकुन्तला को ताना मारता सुनायी पड़ता है कि" श्रोतव्यम् इदानीं संवृत्तम्।" (शाकु. 5/22 के ऊपर)। उसी तरह से प्रथमाङ्क के भ्रमरबाधा प्रसङ्ग में, दुष्यन्त भ्रमर के प्रतिस्पर्धी के रूप में "वयं तत्त्वान्वेषान् मधुकर हतास्त्वं खलु कृती" (शाकु. 1/20) कहता है। वही दुष्यन्त षष्ठाङ्क में, चित्रफलक में भ्रमरबाधा प्रसङ्ग का फिर से निरूपण करता है। तब भ्रमर को कहता है कि "एषा कुसुमनिषण्णा तृषतापि सती भवन्तमनुरक्ता। प्रतिपालयति मधुकरी न खलु मधु विना त्वया पिबति। (शाकु. 6/19)" यहाँ वह भ्रमर को उपदेष्टा के रूप में दिखाया गया है। इस तरह से पूरे नाटक में, आदि से
- त्वं दूरमपि गच्छन्ती हृदयं न जहासि मे। दिनावसानच्छायेव पुरोमूलं वनस्पतेः।। 3-29
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लेकर अन्त तक, एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप खड़ा करने की योजना से नाट्यकार्य प्रवर्तित किया गया है। इस प्रकार की नाट्य-शैली को आन्तरिक प्रमाण के रूप में आधार बना कर सोचा जाय तो तृतीयाङ्क का पाठ, जो देवनागरी पाठपरम्परा में लघु-आकार का है, और बंगाली पाठपरम्परा में बृहदाकार का है, इन दोनों में से कहाँ पर मौलिकता होगी, इस प्रश्न का समाधान मिल जाता है।
2-1 बृहदाकार की बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क का पाठ लेकर उसकी तुलना षष्ठाङ्क के पाठ की साथ करनी होगी। इससे इन दो अङ्कों में भी रूप-प्रतिरूप की एक लाक्षणिक योजना अन्तर्निहित है। षष्ठांक में, दुष्यन्त ने चित्रफलक में दो सहेलियों के साथ में रही शकुन्तला का चित्र बना लिया है। तब विदूषक पूछता है कि-भोः, अपरं किमत्र लिखितव्यम्। (अब इसमें और क्या चित्रित करना है?) इसके जवाब में दुष्यन्त ने प्रेमाविष्ट होकर एक श्लोक प्रस्तुत किया है जो शाकुन्तल की सभी वाचनाओं में सुरक्षित रहा है:
कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी,
पादास्तामभितो निषण्णचमरा गौरीगुरोः पावनाः।
शाखालम्बितवल्कलस्य च तरोर्निमातुमिच्छाम्यधः,
शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम्।।
6/17
अब सोचना यह है कि धीवरप्रसङ्ग के बाद, दुष्यन्त को जब शकुन्तला का स्मरण पूर्ण रूप से हो गया है तब विरहातुर बना दुष्यन्त पूर्वानुभूत (प्रथम एवम् तृतीय अङ्क के) कौन कौन से प्रसङ्गों को चुन चुन कर चित्राङ्कित करना चाहता है (राघवभट्ट, 2006)¹¹। तो उपर्युक्त श्लोक में जो जो कहा गया है उसका ध्यान से परीक्षण करने की आवश्यकता है:
- दुष्यन्त कण्वाश्रम के पास बहती हुई मालिनी नदी को याद कर रहा है। जिसकी सिकता में बैठे हुए हंस-मिथुन को वह चित्रित करना चाहता है।
- मालिनी की पार्श्वभूमि में स्थित पार्वती के पिता अर्थात् हिमालय को वह चित्रित करना चाहता है जिसकी निश्रा में चामरों / हरिणों के यूथ बैठे हो।
- वहाँ एक वृक्ष की शाखाओं पर ऋषिमूनिओं के अथवा शकुन्तला के वल्कल सुखाने के लिये टाँगे गये हों और उस वृक्ष की छाया में, नीचे दो मृग (जिसमें एक मृग हो
- कार्येति। अनेन पद्येनाश्रमस्थं पूर्वानुभूतं तदानींतनम् उद्दीपनं विभावगणं स्मरति। -अभिज्ञानशाकुन्तलम् (राघवभट्टस्य टीकया सहितम्), सं. नारायण राम आचार्य, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली, 2006 (पृ. 212)
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और दूसरी मृगी हो) खड़े हों-ऐसा वह चित्रित करना चाहता है। यहाँ मालिनी, हंस, हिमालय, हरिण और वल्कल-वस्त्र इत्यादि का उल्लेख तो (प्रथम अङ्क के कण्वाश्रम के) पूर्वदृष्ट स्थल का ही स्मरण है ऐसा तुरन्त समझ में आता है।
- किन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है कि मृग के शृङ्ग पर अपना वाम-नेत्र खुजलाती हुई (कण्डूयमाना) मृगी चित्रित करने की भावना दुष्यन्त के मन में कैसे / कहाँ से पैदा हुई होगी?
यहाँ चतुर्थ बिन्दु में जो प्रश्न उपस्थित किया गया है उसका उत्तर देवनागरी वाचना के तृतीयाङ्क के संक्षिप्त पाठ में से मिलता ही नहीं है। उसका उत्तर तो केवल बंगाली वाचना के बृहत्पाठ को देखने पर ही मिलता है। बंगाली वाचनावाले अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क में कहा गया है कि, शकुन्तला के कान में लगाये उत्पलपुष्प की परागरज (परिमल) पवन के कारण उसकी आँख में गिरे हैं, अतः उसकी दृष्टि कलुषित हुई है (पिशेल, 1922 (द्वितीयावृत्ति)¹²। इस प्रसङ्ग में दुष्यन्त ने वहाँ कहा था कि मैं मेरे वदन- मारुत से तुम्हारी दृष्टि को स्वच्छ कर देने को तैयार हूँ।¹³ तृतीयांक के इसी प्रसङ्ग को लक्षित करते हुए महाकवि कालिदास ने, षष्ठाङ्क में दुष्यन्त से कृष्णमृग के शृङ्ग पर अपना वामनेत्र खुजलाती (कण्डूयमाना) मृगी का चित्र आकारित करने की इच्छा व्यक्त करवायी है। अर्थात् बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में शकुन्तला के जो कलुषित नेत्र को परिमार्जित कर देने का प्रसंग आता है उसका प्रतिदृश्य षष्ठाङ्क में खड़ा किया गया है। किन्तु देवनागरी वाचना के तृतीयांक में वह नेत्रकलुषित होने का प्रसंग हटाया गया है, अतः उस वाचना के षष्ठांक में “कण्डूयमानाम् मृगीम्” का निर्देश होते हुए भी उस चाहत का बीज कहाँ है यह प्रेक्षक नहीं जान सकता है।
2-2 यह भी स्मरणीय है कि इस नाटक में सर्वत्र हरिण को शकुन्तला का प्रतीक बनाया गया है। प्रथमाङ्क में आश्रममृग को नहीं मारने की शर्त पर उसको चक्रवर्ती पुत्र होने का आशीर्वाद मिला है। जिसका गर्भितार्थ यह है कि शिकारी बन कर तो दुष्यन्त को हरिणी-स्वरूपा शकुन्तला नहीं मिलनेवाली है। हरिण हो कर ही हरिणी को प्राप्त किया जा सकता है। पञ्चमाङ्क के प्रत्याख्यान-प्रसंग में उसने भले ही ताना मारते हुए बोल दिया था कि “द्वावप्यत्रारण्यकौ। सर्वः सगन्ध्विषु विश्वसति।” लेकिन अनजान में भी बोला गया एक परम सत्य था। अब धीवर से अङ्गूठी मिल जाने पर उसे समझ में आ गया है कि हरिणी-स्वरूपा शकुन्तला को प्राप्त करने के लिए उसको भरोसेमन्द हरिण होकर ही
- राजा- सुन्दरि, कर्णोत्पलसंनिकर्षाद् ईक्षणसादृश्यमूढोऽस्मि। (इति मुखमारुतेन चक्षुः सेवते) पृ. 40
- राजा -(सस्मितम्) यदि मन्यसे अहमेनाम् वदनमारुतेन विशदां करिष्ये। अभिज्ञानशाकुन्तलम्। सं. रिचार्ड पिशेल, हार्वर्ड युनि. प्रेस, पृ. 40
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शकुन्तला के सामने खड़े रहना है। कण्डूयमानां मृगीम्-को चित्रित करने की चाहत का यह राज है। बंगाली वाचना के तृतीयांक में कर्णोत्पलररेणु से कलुषित हुई शकुन्तला की दृष्टि परिमार्जित कर देने का जो पूर्वप्रसंग है उसी का प्रतिदृश्य षष्ठांक के “कार्या सैकतलीनहंसमिथुना....।” वाले श्लोक में निरूपित हुआ है। इस तरह देवनागरी एवं बंगाली वाचना के षष्ठाङ्क के कण्डूयमानाम् मृगीम्-का चित्र बनाने की चाहत का पूर्व रूप बंगाली वाचना वाले (तृतीयाङ्क के) पाठ में ही उपलब्ध होता है, देवनागरी वाचना में से नहीं। क्योंकि देवनागरी वाचना में से तो कर्णोत्पलरेणु से शकुन्तला की दृष्टि कलुषित होने पर उसको परिमार्जित कर देने का प्रसंग हटाया गया है। अतः, बंगाली वाचना के बृहत्पाठ को प्रक्षिप्त न कह कर, उसे मौलिक मानने को हम बाध्य हो जाते हैं।
2-3 उपर्युक्त सन्दर्भ ऐसे हैं जिसमें सभी वाचनाओं में समान रूप से षष्ठाङ्क में आये हुए श्लोक को आधार बनाकर बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के प्रलम्ब पाठ की मौलिकता का समर्थन किया गया है। इसी अनुसन्धान में एक दूसरा प्रमाण भी प्रस्तुत किया जाता है। देवनागरी, दाक्षिणात्य, काश्मीरी, मैथिली एवं बंगाली सभी वाचनाओं$^{14}$ के तृतीयाङ्क के अन्त भाग में समान रूप से एक श्लोक (देवनागरी का 3 / 23) ऐसा दिखाया जाता है जिस में आये हुए एक शब्द का समर्थन केवल बंगाली वाचना का (तृतीयाङ्क का बृहत्) पाठ ही कर सकता है। अब ऐसे आन्तरिक प्रमाण के रूप में सिद्ध होनेवाले श्लोक की चर्चा की जा रही है:-देवनागरी (इत्यादि) पाँचों वाचनाओं के शाकुन्तल में, तृतीयाङ्क के अन्त में, गौतमी के साथ शकुन्तला चली जाती है। तत्पश्चात् दुष्यन्त प्रियापरिभुक्त लतावलय में कुछ क्षणों के लिये खड़ा रहता है। वह यहाँ एक श्लोक बोलता है:
तस्याः पुष्पमयी शरीरलुलिता शय्या शिलायामियं,
क्लान्तो मन्मथलेख एष नलिनीपत्रे नखैरर्पितः।
हस्ताद् भ्रष्टम् इदं बिसाभरणम् इत्यासज्यमानेक्षणो,
निर्गन्तुं सहसा न वेतसगृहाच्छक्नोमि शून्यादपि॥
\hfill 3/23
(देवनागरी वाचना के) इस श्लोक में 1. शकुन्तला की पुष्पमयी शय्या, 2. उसका नलिनीपत्र पर लिखा हुआ मन्मथलेख, तथा 3. उसके हाथ से निकला हुआ कोई एक बिसाभरण (वलय)-इन तीन चीजों का स्पष्ट निर्देश है। लेकिन, देवनागरी, दाक्षिणात्य एवं काश्मीरी$^{15}$ वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में कहीं पर भी शकुन्तला को दुष्यन्त द्वारा पहनाये हुए बिसाभरण (कमलतन्तु का वलय) का प्रसंग नहीं है। ऐसे प्रसंग का उल्लेख
- देवनागरी, दाक्षिणात्य, काश्मीरी, मैथिली एवं बंगाली-इन पाँचो वाचनाओं में।
- जो साहित्य अकादेमी, दिल्ली से डॉ० ए.के. बेलवलकरजी द्वारा संपादित शाकुन्तल है उसमें यह अंश नहीं है।
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तो एकमात्र बंगाली (एवं मैथिली) वाचना में ही प्राप्त होता है। बंगाली वाचना का निम्नोद्धृत अंश पठनीय है:-
राजा—सम्प्रति प्रियाशून्ये किमस्मिन् करोमि। (अग्रतोऽवलोक्य) हन्त, व्याहतं गमनम्। मणिबन्धनगलितम् इदं संक्रान्तोशीरपरिमलं तस्याः। हृदयस्य निगडमिव मे मृणालवलयं स्थितं पुरतः।। (3 / 31), (सबहुमानम् आदत्ते)
शकुन्तला—(हस्तं विलोक्य) अम्मो, दोब्बल्यसिढिलदाए परिब्भट्ठं पि मुणालवलअं मए ण परिण्णादं। (अहो, दौर्बल्यशिथिलतया परिभ्रष्टमपि मृणालवलयं मया न परिज्ञातम्।)
राजा—(मृणालवलयमुरसि निक्षिप्य) अहो स्पर्शः। अनेन लीलाभरणेन ते प्रिये विहाय कान्तं भुजमत्र तिष्ठता। जनः समाश्वासित एष दुःखभागचेतनेनापि सता, न तु त्वया।।
(अभिज्ञानशकुन्तलम् 3 / 32, रिचार्ड पिशेल की बंगाली वाचनावाली आवृत्ति, पृ. 38).
दुष्यन्त की यह उक्ति सुनने के बाद शकुन्तला फिर से लतामण्डप में उस वलय को वापस ले लेने के निमित्त से प्रवेश करती है। यहाँ शकुन्तला ने जो लीलाभरण के रूप में हाथ में एक मृणालवलय पहना था उसका स्पष्ट शब्दों में उल्लेख है। इस प्रसङ्ग में (शकुन्तला के शब्दों में) जो “वलय” (और दुष्यन्त के शब्दों में जो) “लीलाभरण” का निर्देश है, उसीको देवनागरी वाचना के पूर्वोक्त (शाकु. 3 / 23) श्लोक के “बिसाभरणम्” शब्द से रखा गया है। एवमेव, देवनागरी (इत्यादि) वाचना के तृतीयाङ्क के आरम्भ में ही कहा गया है कि शकुन्तला के हाथ में पहना हुआ मृणालवलय शुरू से ही “प्रशिथिल” था। अतः उस वलय के गिर जाने का प्रसंग आकारित होने की सम्भावना एवं अपेक्षा है ही। लेकिन शकुन्तला के हाथ से मृणालवलय गिरने का प्रसंग केवल बंगाली और मैथिली वाचना के पाठ में तथा कश्मीर की शारदा पाण्डुलिपियों में ही सुरक्षित रहा है। यह तीसरा आन्तरिक प्रमाण है जिसके द्वारा बंगाली आदि के प्रलम्ब पाठ की मौलिकता सिद्ध होती है।
बंगाली वाचना के शकुन्तल नाटक में तृतीयाङ्क में कुल मिला कर 41 या 42 श्लोकों का समुदाय है। उसके सामने देवनागरी वाचना और दाक्षिणात्य वाचनावाले शाकुन्तल नाटक के तृतीय अङ्क में केवल 23 या 24 श्लोक प्राप्त होते हैं। अतः यदि किसी अज्ञात रंगकर्मी ने बंगाली वाचना के बृहत् पाठ में काट-छाँट करके, देवनागरी वाचना का संक्षिप्त पाठ बनाया होगा तो उसका कोई न कोई सबूत देवनागरी वाचना के पाठ में ही अनजान में भी रहा होगा—अब ऐसा अनुमान करने को हमारा मन उद्यत होता है। उस अनुमान को दृढीभूत करनेवाला यह (3 / 23) श्लोक (संक्षिप्त की गयी) देवनागरी वाचना में सुरक्षित
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रह गया है, जो हमारे लिये एक अकाट्य आन्तरिक प्रमाण है। सारभूत बात यही है कि 1. पुष्पमयी शय्या और 2. मन्मथलेख के साथ 3. जो बिसाभरण का निर्देश देवनागरी वाचना के पाठ में है वह कहाँ से आया इसका उत्तर केवल बंगाली आदि बृहत्पाठवली वाचनाओं में ही है।
3-1 आन्तरिक सम्भावना का चतुर्थ स्थानः-देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनावाले (लघु) पाठ में गान्धर्व-विवाह नामक तृतीयाङ्क का आलेखन संयमित एवं व्यंजनापूर्ण होते हुए भी उसमें एक स्थान ऐसा है कि जो प्रथम दृष्टि में ही अनुचित लगता है:-“चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी”। ऐसा नेपथ्य से कहा जाता है। इस को सुनते ही शकुन्तला दुष्यन्त को सावधान करती है कि मेरे शरीरवृत्तान्त को जानने के लिये गौतमी आ रही है। तुम वृक्ष के पीछे छुप कर रहो। फिर देवनागरी पाठ में एक रंगसूचना है:-“ततः प्रविशति पात्रहस्ता तापसी, सख्यौ च”। दोनों सखियाँ “इत इत आर्या गौतमी” बोलती हुई गौतमी का प्रवेश करवाती हैं। बाद में वह पूछती है कि क्या अब तेरे शरीर का संताप कुछ कम हुआ है। लो, इस शान्तिदर्भोंदक से तेरी बाधायें हट जायेंगी इत्यादि। फिर तीनों पात्र (गौतमी, अनसूया और प्रियंवदा) शकुन्तला को ले कर रंगभूमि से निकल जाती हैं। यहाँ प्रश्न होता है कि जिन दोनों सखियों ने नायक-नायिका को रतिक्रीडा के अनुकूल विश्रब्ध स्थान में एकान्त देने के लिये, मृगबाल को अपनी माता के साथ संयोजन करवाने का बहाना बनाकर, अभी अभी कुछ ही क्षण पहले लतावलय से बिदा ली थी, क्या वही दोनों सखियाँ आर्या गौतमी को रास्ता दिखाती हुई वहाँ उपस्थित हो जाती हैं? यह तो सर्वथा अनुचित ही है। यद्यपि यह बात अलग है कि किसी भी विद्वान् ने इस अनौचित्य की ओर अंगुली नहीं उठायी है। लेकिन यह अनौचित्य ध्यातव्य जरूर है।
अब इसी सन्दर्भ को लेकर बंगाली एवं मैथिली वाचना के पाठ का परीक्षण किया जाय तो वहाँ उपर्युक्त अनौचित्य नहीं है। जैसा पहले कहा गया है-बंगाली पाठ में “अनिर्वाणो दिवसः” से लेकर “वत्से, परिणतो दिवसः”-के बीच में नायक-नायिका का जो विस्तृत साहचर्य दिखाया गया है उसमें जिस क्षण में गौतमी का प्रवेश होता है, तब वह अकेली होती है। शान्त्युदक प्रसारित करते हुए वह देखती है कि अस्वस्थ शकुन्तला को देवताओं के सहारे अकेली छोड़ कर प्रियंवदा-अनसूया वहाँ से चली गयी हैं। तब शकुन्तला को कहना पड़ता है कि वे दोनों अभी अभी मालिनी नदी पर गयी हैं (पिशेल, 1922 (द्वितीयावृत्ति)¹⁶। यहाँ दोनों सखियों के साथ में गौतमी उपस्थित नहीं होती है। अर्थात् यहाँ जो पाठ दिखायी देता है वह पूर्वापर सन्दर्भ में बिल्कुल सुसंगत और औचित्यपूर्ण है। अतः बंगाली लिपि में लिखित अभिज्ञानशकुन्तल की पाण्डुलिपियों में जो बृहत्पाठ-परम्परा
- (प्रविश्य पात्रहस्ता गौतमी) जाते इदम् शान्त्युदकम्। (दृष्ट्वा) अस्वस्था इह देवतासहायिनी तिष्ठसि। शकुन्तला-इदानीमेव प्रियंवदानसूये मालिनीम् अवतीर्णे। रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति, (पृ. 41)
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संचरित हुई है, वही मौलिकता के नजदीक हो सकती है ऐसी सम्भावना दृढतर हो कर सामने आती है।
4-1 आन्तरिक सम्भावना का पञ्चम स्थानः-अभिज्ञानश(शा)कुन्तल की सभी वाचनाओं के षष्ठाङ्क में विरही दुष्यन्त के मुख से अन्तःपुर में बार बार गोत्रस्खलन होने से वह शरमिन्दा हो जाता है ऐसा निर्देश है।
दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचिताम् अन्तःपुरेभ्यो यदा,
गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम्॥
(शाकु. 6/5)
अब गान्धर्व-विवाह को वर्णित करनेवाले (देवनागरी वाचना के) तृतीयाङ्क में दुष्यन्त-शकुन्तला का जो मिलन है वह तो कुछ दो-पाँच संवादों का ही वर्णित किया है। किन्तु बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में, शकुन्तला ने दुष्यन्त को “आर्यपुत्र” जैसे शब्द से सम्बोधन किया है और नायक दुष्यन्त ने शकुन्तला को “जीवितेश्वरी” शब्द से उल्लिखित किया है। ऐसे परस्पराश्लिष्ट / परस्पराश्रित दाम्पत्य का निरूपण होने के बाद यदि गोत्रस्खलन का उल्लेख किया जाय तो वह ज्यादा प्रीतिकर सिद्ध हो सकता है।
5-1 देवनागरी वाचना के षष्ठाङ्क में वर्णित प्रसङ्गों का बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में प्रदर्शित प्रसङ्गों के साथ एक तरह का आन्तर सम्बन्ध दिखायी देता है। इसी बात का समर्थन करनेवाला षष्ठाङ्क का एक अन्य सन्दर्भ भी यहाँ उल्लेखनीय हैः देवनागरी (इत्यादि सभी) वाचनाओं में, विरही दुष्यन्त के सामने पत्रारूढ पौरकार्य प्रस्तुत किया जाता है। जिस में एक समुद्रव्यवहारी सार्थवाह धनमित्र अनपत्य मर गया है-ऐसी बात कही जाती है। यहाँ पर दुष्यन्त की उक्ति स्मरणीय हैः “अनपत्यश्च किल तपस्वी। राजगामी तस्यार्थसंचय इति एतद् अमात्येन लिखितम्। कष्टं खल्वनपत्यता। बहुधनत्वाद् बहुपत्नीकेन तत्रभवता भवितव्यम्। विचार्यताम् यदि काचिद् आपन्नसत्त्वा तस्य भार्यासु स्यात्”। महाकवि कालिदास को यहाँ दुष्यन्त को शकुन्तला की आपन्नसत्त्वावस्था का स्मरण दिला कर पश्चात्ताप में डालना तो अभिप्रेत होगा ही, लेकिन उनको अपनी अनपत्यता का भी स्मरण देना अभीष्ट होगा। क्योंकि इस नाटक के आरम्भ में दुष्यन्त को चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति होगी ऐसे आशीर्वचन दिये गये हैं, और वही है इस नाटक का अन्तिम लक्ष्य (द्विवेदी, कालिदास ग्रन्थावली (भाग-2)¹⁷।
इसी लिये षष्ठाङ्क में, धनमित्र के प्रसङ्ग से राजा दुष्यन्त की अनपत्यता का स्मरण ध्वनित करके कवि ने इस नाटक के चरम लक्ष्य को प्रेक्षकों के सामने रखा है। यहाँ एक
- इदमेव प्रयोजनमेतस्य नाटकोत्तमस्येत्यभिनवगुप्तो नाट्यशास्त्रविवृतावभिनवभारत्यां 19-22 कारिकायां घनश्यामश्च। अत एव सार्थक्यं षष्ठसप्तमाङ्कयोः। कालिदास-ग्रन्थावली (द्वितीयो भागः), अनु रेवाप्रसाद द्विवेदी, कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन, 2008, पृ. 318
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 29
ध्यानास्पद बिन्दु यह है कि नाटक के गन्तव्य को महाकवि ने प्रत्येक अङ्क में किसी न किसी स्वरूप से निर्दिष्ट भी किया है। जैसे कि प्रथमाङ्क में ‘सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रम् अवाप्नुहि’ शब्दों से वैखानस के आशीर्वचन दिये जाते हैं और सप्तमाङ्क में चक्रवर्ती राजा के लक्षणों से युक्त सर्वदमन भरत की प्राप्ति दिखायी गयी है। तृतीयाङ्क में नायक-नायिका का गान्धर्व-विवाह होता है और चतुर्थाङ्क में कण्वमुनि कहते हैं कि दौष्यन्ति पुत्र को राज्य की धुरा सौंप कर इस आश्रम में फिर से वापस आना। पञ्चमाङ्क के अन्त में, शकुन्तला-प्रत्याख्यान प्रसङ्ग में राजपुरोहित कहता है कि–त्वं साधुभिरुद्दिष्टः प्रथममेव चक्रवर्तिनं पुत्रम् जनयिष्यसि इति। (शाकु. 5 / 29 के बाद), और षष्ठाङ्क में सार्थवाह धनमित्र के पूर्वोक्त प्रसङ्ग के द्वारा दुष्यन्त की अनपत्यता व्यञ्जित की जाती है। किन्तु देवनागरी वाचना और दाक्षिणात्य वाचनावाले शाकुन्तल के द्वितीयाङ्क में कहीं पर भी पुत्रप्राप्ति रूप नाट्यकार्य का किसी भी तरह से निर्देश नहीं है। राजमाता ने जो उपवास किये थे उसका कोई उद्देश्य वहाँ नहीं कहा गया है। यहाँ पर देवनागरी और दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार ‘प्रवृत्तपारण’ या ‘निर्वृत्तपारण’ उपवास का ही निर्देश है।$^{18}$ केवल बंगाली, मैथिली और काश्मीरी वाचना के शकुन्तल में ही “पुत्रपिण्डपालन”, “पुत्रपिण्डपर्युपासन”, एवं “पुत्रपिण्डाराधन” जैसे पाठभेदवाले शब्दों से पुत्र-प्राप्ति रूप लक्ष्य का निर्देश मिलता है। इन पाठभेदों का तुलनात्मक अध्ययन करने से भी यह सिद्ध होगा कि देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचना का पाठ संक्षिप्त करने के साथ साथ परिवर्तित भी किया गया है। बंगाली वाचना के पुत्रपिण्डपालन-वाले पाठ में नाटक के चरम लक्ष्य का निर्देश सुरक्षित है, परन्तु वह निर्देश देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना से गायब हो गया है। इस तरह बंगाली वाचना के पाठ की मौलिकता की सम्भावना उपर्युक्त एक छोटे से पाठभेद से भी दृढतर सिद्ध होती है।
6-1 संस्कृत नाट्य-साहित्य में भास, कालिदास, शूद्रक, कुन्दमालाकारादि अनेक कवियों ने प्रेमोद्भव के एक बीजभूत कारण के रूप में अनुक्रोश नामक गुण को पुरस्कृत किया है। यद्यपि संस्कृत-कोशकारों नें इस शब्द का दया, अनुकम्पा, घृणा, सहानुभूति जैसे अर्थों का परिगणन किया है, और टीकाकार चन्द्रशेखर ने उसका अर्थ “कृपा” किया है। किन्तु उसका सही अर्थ तो “परदुःखदुःखिता” ही होता है।$^{19}$ दूसरों के दुःख को देख कर, उस दुःखीजन को साहाय्य करने को जो तुरन्त उद्यत होता है वह व्यक्ति सानुक्रोश है-ऐसा कहा जाता है। ऐसी सानुक्रोशता को देख कर कुसुम-सुकुमारचित्तवाली नारियों के हृदय में प्रेम की भावना सद्यः प्रकट होती है। अतः महाकवि कालिदास जब अपनी इस नाट्यकृति में अनुक्रोश शब्द का प्रयोग करते हैं तो उसका भी परीक्षण करके देवनागरी शाकुन्तल के पाठ की आलोचना की जा सकती है:
- राघवभट्ट की टीका में - देव्याज्ञापयति - आगामिनि चतुर्थदिवसे प्रवृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति। तथा काटयवेम की टीका में-देव्याज्ञापयति-आगामिनि चतुर्थदिवसे निर्वृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति। ऐसे पाठान्तरों को स्वीकार किया गया है।
- एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रार्थनावर्तिनो मे, सौहार्दाद् वा विधुर इति वा मय्यनुक्रोशबुद्ध्या। मेघदूतम्-55
30 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
देवनागरी वाचनावाले अभिज्ञानशाकुन्तल के सप्तमाङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला के पाँव पड़ता है (और 7 / 24 श्लोक बोलता है।) यहाँ शकुन्तला कहती है कि-उत्तिष्ठत्वार्यपुत्रः। नूनं मे सुचरितप्रतिबन्धकं पुराकृतं तेषु दिवसेषु परिणाममुखम् आसीद्, येन सानुक्रोशोऽप्यार्यपुत्रो मयि विरसः संवृत्तः। यहाँ शकुन्तला ने कहा है कि दुष्यन्त एक सानुक्रोश व्यक्ति है, लेकिन मेरे सुचरित को रोकनेवाले गत जन्म के कोई कर्म उस समय फल देने के लिये तत्पर हो गये थे, जिसके कारण आर्यपुत्र सानुक्रोश होते हुए भी मेरे प्रति विरस हो गये थे। यहाँ दुष्यन्त के लिए प्रयुक्त सानुक्रोश शब्द, जो समग्र संस्कृतसाहित्य में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शब्द है (Vasantkumar, 2002)$^{20}$, उसका औचित्य कैसे सिद्ध किया जा सकता है, यह परीक्षणीय है।
शकुन्तला की उपर्युक्त उक्ति को सुन कर यह प्रश्न किया जा सकता है कि “दुष्यन्त एक सानुक्रोश व्यक्ति है” ऐसा अनुभव शकुन्तला को कब हुआ होगा? दुष्यन्त और शकुन्तला का साहचर्य तो केवल प्रथम एवं तृतीय, इन दो अङ्कों में ही वर्णित हुआ है। 1. प्रथमाङ्क के भ्रमरबाधा प्रसङ्ग में दुष्यन्त शकुन्तला को भ्रमर के त्रास से छुड़ाने के लिये जब सहसा प्रस्तुत होता है एवं वृक्षसेचन के लिये दो घट पानी के ऋण में से मुक्त करवाने के लिये जब वह अपनी राजमुद्रा निकाल कर देता है। 2. देवनागरी वाचना के तृतीयाङ्क में नायक-नायिका का साहचर्य / सहवास परिसीमित क्षणों में पूरा होता है। अतः इस अल्पकालिक मिलन में शकुन्तला को किसी बाधा से छुड़ाने का मौका दुष्यन्त को मिला हो ऐसा कोई प्रसंग वर्णित नहीं है। इस लिये सप्तमाङ्क में जब दुष्यन्त के लिये सानुक्रोश शब्द का प्रयोग होता है तब वह निराधार लगता है। किन्तु बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ को यदि लेते हैं तो वहाँ एक निश्चित प्रसङ्ग है जिसमें दुष्यन्त ने शकुन्तला को प्रत्यक्ष रूप से बाधामुक्त किया है। शकुन्तला ने अपने कानों में जो उत्पलपुष्प आरोपित किया था, उसकी रेणु से नेत्र जब कलुषित होता है तब दुष्यन्त ने अपने वदनमारुत से उसका प्रमार्जन किया था। और शकुन्तला ने भी दुष्यन्त को अनुकम्पा प्रदर्शित करनेवाला कहा है।$^{21}$ इस तरह बंगाली वाचना के पाठ को यदि हम ध्यान में ले कर सप्तमाङ्क के सानुक्रोश शब्द के प्रयोग का औचित्य सोचते हैं तो वह सुसंगत और साधार लगता है। परन्तु देवनागरी वाचना के संक्षिप्त पाठ के सन्दर्भ में इस महत्त्वपूर्ण शब्द के प्रयोग का औचित्य जमता नहीं है।
- करुणा जो होती है वह ईश्वर की होती है और जो सहानुभूति होती है वह साधुपुरुष की होती है। इस करुणा और सहानुभूति के बीच में अनुक्रोश आता है। तथा अनुक्रोशत्व के कारण प्रेमोद्भव होता है-ऐसा संस्कृत कवियों ने बार बार दिखाया है।
- शकुन्तला - न तावत् एवम् प्रेक्षे। पवनोत्कम्पिना कर्णोत्पलररेणुना कलुषीकृता मे दृष्टिः। राजा- यदि मन्यसे अहमेनां वदनमारुतेन विशदां करिष्ये। शकुन्तला - ततो अनुकम्पिता भवेयम्। (रिचार्ड पिशेल आवृत्ति) पृ. 40
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उपसंहारः- पाठालोचना में इदं प्रथमतया पाण्डुलिपियों का साक्ष्य ही महत्त्व रखता है। उपलब्ध पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठों का तुलनात्मक अध्ययन करके, वंशवृक्षपद्धति से विभिन्न वाचनाओं में से कौन सी वाचना पूर्वज है या वंशज है, अर्थात् प्राचीन या प्राचीनतर है, उसका निर्णय किया जाता है। तदनन्तर, कौन से पाठ को बहुसंख्य पाण्डुलिपिओं का समर्थन मिलता है, अथवा प्राप्त की गयी अनेकानेक पाण्डुलिपिओं में से जो प्राचीनतम पाण्डुलिपि होगी उनमें कौन सा पाठ सुरक्षित रहा है, उसकी विचारणा आधुनिक पाठसम्पादक करते हैं। ऐसे दृष्टिकोण से जो समीक्षित पाठसम्पादन किया जाता है उसमें वस्तुनिष्ठता जरूर होती है। क्योंकि यहाँ पर जैसा भी निर्णय किया जाता है वह उपलब्ध पाण्डुलिपिओं (की संख्या या प्राचीनता) पर निर्भर रहता है। परन्तु जब अनेकविध पाठान्तरों में से कौन सा पाठान्तर अधिक काव्यत्व या नाट्यक्षमता से परिपूर्ण हो सकता है, उसको देखकर, अर्थात् "गुणोपसंहार न्याय" (Eclectic Principles) से समीक्षित पाठसम्पादन तैयार किया जाता है, तो उसमें आत्मलक्षिता प्रविष्ट होती ही है। परिणाम स्वरूप ऐसा समीक्षित पाठसम्पादन सर्वसम्मत नहीं होता है। तथा जिस वंशवृक्षपद्धति से निर्धारित किये समीक्षित पाठसम्पादन को वस्तुनिष्ठ कहा गया है उसमें पाठालोचना के तीन सोपान ही कार्यान्वित किये गये होते हैं। अतः वहाँ चतुर्थ सोपान पर उच्चतर पाठसमीक्षा का कार्य अवशिष्ट रहता है। यहाँ वंशवृक्षपद्धति से जिस वाचना को प्राचीनतर या अधिक श्रद्धेय मान कर, उसके आधार पर पाठसम्पादन किया जाता है उसका पुनःपरीक्षण किया जाता है। ऐसे पुनःपरीक्षण में बाह्य साक्ष्य एवं कृतिनिष्ठ आन्तरिक सम्भावना को सर्वोच्च मानदण्ड के रूप में स्वीकारा जाता है। प्रस्तुत आलेख में, बंगाली वाचना के बृहत् पाठ की मौलिकता को कृति के ही अन्तःसाक्ष्य से कैसे समर्थन मिल रहा है उसकी चर्चा की गयी है। किन्तु यहाँ ऐसा कहने का आशय यह भी नहीं है कि बंगाली वाचना के पाठ को ही साद्यन्त स्वरूप में मौलिक मान लिया जाय। क्योंकि डॉ० रिचार्ड पिशेल के द्वारा निर्धारित किये गये बंगाली वाचना के समीक्षित पाठ की भी व्यापक रूप से उच्चतर समीक्षा करना अनिवार्य है। (जिसको अनुगामी पृष्ठों में प्रस्तुत किया गया है।) बंगाली वाचना के पाठ में मौलिकता झलक रही है ऐसा सिद्ध होने का सही मतलब तो यह है कि अभिज्ञानशकुन्तल का बृहत्पाठ संचरित करनेवाली जो तीन वाचनायें हैं, 1. बंगाली, 2. मैथिली एवं 3. काश्मीरी, इन तीनों में मौलिकता छुपी हुई है। कालिदास के अभिज्ञानशकुन्तल का मूल पाठ उजागर करने के लिए उपर्युक्त त्रिविध वाचनाओं में संचरित हुए बृहत्पाठ का आलोडन करके ही अभिज्ञानशकुन्तल के कविप्रणीत मूल पाठ को निश्चित करना चाहिए।
Bibliography
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32 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
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राघवभट्ट. (2006), अभिज्ञानशाकुन्तल, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान,. नव देहली
अभिज्ञानश(शा)कुन्तलम् की बंगाली एवं देवनागरी वाचनाओं में प्रक्षेप एवं संक्षेप
0-1, भूमिका—यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक की सर्वोत्तमता को लेकर कोई विवाद ही नहीं उठा है! पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ इस नाटक का पाठ इयत्ता में द्विविध है। अतः उनमें से कौन सा शाकुन्तल मंचन के योग्य है, ऐसा प्रश्न होना चाहिए था, तदनन्तर इनमें से किसकी सर्वोत्तमता मानी जाय ऐसा विवाद भी उठना अपेक्षित था। किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा कुछ हुआ नहीं। यहाँ तो विगत 100-150 वर्षों में अभिज्ञानशाकुन्तल के प्रचलित पाठों की मौलिकता को लेकर संशय या विप्रतिपत्ति दिखानेवाले विद्वान् दो-चार की संख्या में परिसीमित हैं! जबकि हकीकत यह है कि इस नाटक के शीर्षक से लेकर, अन्तिम भरतवाक्य पर्यन्त जितने भी गद्य-पद्य संवाद हैं वे सभी पाठभेद की समस्या से ग्रस्त हैं। अतः स्वाभाविक रूप से ही शाकुन्तल के मौलिक पाठ की गवेषणा करने के लिये गणमान्य विद्वानों के द्वारा बार बार चर्चा-विचारणा होनी आवश्यक थी और आज भी वह अनिवार्य है। अभिज्ञानशाकुन्तल की पाठालोचना करनेवाले विरल विद्वानों में दो मत हैं:-(1) प्रथम, शाकुन्तल के जिस पाठ पर राघवभट्ट ने “अर्थद्योतनिका” टीका लिखी है, वह देवनागरी वाचना का पाठ ही मौलिक हो सकता है। (2) द्वितीय, बंगाली वाचना का पाठ, जिस पर चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने सन्दर्भदीपिका टीका लिखी है, वह प्राचीनतर भी है और अधिक श्रद्धेय एवं कदाचित् मौलिक भी है। अतः कम से कम, उपर्युक्त टीकाकारों के द्वारा स्वीकृत इन दोनों वाचनाओं के पाठ की परीक्षा तो करनी चाहिए। क्योंकि किसी भी कृति की पाठालोचना किये बिना यदि उसकी साहित्यिक आलोचना की जाती है तो वह आज नहीं तो कल गलत सिद्ध होने की पूरी सम्भावना है।