भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 262 में से

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पृष्ठ 28

14 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

मधुकरी पुष्करमधु एव अभिलषति।" ऐसा दिया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने जो संस्कृतच्छायानुवाद दिया है उसमें "पुष्करमधु" के स्थान पर "पुष्परसं मधु" ऐसा पाठ है। अर्थात् चन्द्रशेखर के सामने जो प्राकृत उक्ति होगी वह डॉ० रिचार्ड द्वारा स्वीकृत पाठ से भिन्न होनी चाहिए।

(ग) षष्ठाङ्क के आरम्भ में, धीवरक की उक्ति है:-सहये किल ये वि णिन्दिदे ण हु शे कम्म विवव्यणीअके। पशुमालिं कलेदिं दालुणं अणुकम्पामिदुले वि शोणिके।।(6-1), इसका डॉ० रिचार्ड पिशेल ने संस्कृतच्छायानुवाद इस तरह दिया हैः सहजं किल यद्यपि निन्दितं न खलु तत् कर्म विवर्जनीयम्। पशुमारणं करोति दारुणमनुकम्पामृदुलोपि सौनिकः।। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने जो संस्कृतच्छायानुवाद किया है वह चतुर्थ चरण में बहुशः भिन्न है। जैसे कि-सहजं किल यदपि निन्दितं न खलु तत् कर्म विवर्जनीयम्। पशुमारणं करोति कारणात् षट्कर्मा विदुरो श्रोत्रियः।। यहाँ रिचार्ड पिशेल ने बंगाली पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए पाठ की ओर ही ध्यान दिया है, और टीकाकार ने किस पाठ का आदर किया है वह नहीं देखा है। वस्तुतः पाठनिर्धारण के लिए पाण्डुलिपिओं की संख्या को निर्णायक न मान कर, टीकाग्रन्थों में संचरित हुए पुराने जमाने के पाठ का ही समादर करना चाहिए। क्योंकि प्रथम सोपान पर पाठसम्पादक का लक्ष्य तो प्राचीन से प्राचीनतर पाठ को उजागर करना ही हो सकता है।। लगता है कि रिचार्ड पिशेल ने यह नहीं सोचा है कि सौनिक (पशुघातक) को अनुकम्पामृदुल कैसे कहा जा सकता है? अर्थात् किसी अज्ञात ब्राह्मणपक्षपाती व्यक्ति ने ही श्रोत्रिय शब्द को परिवर्तित करके यह सौनिक वाला पाठ प्रस्तुत किया होगा। मतलब की कवि कालिदास के हाथ से तो श्रोत्रिय को ही अनुकम्पामृदु (अथवा षट्कर्मा विदुरः) कहा गया होगा।। यहाँ विशेष रूप से एक ही बात ध्यानार्ह है कि रिचार्ड पिशेल ने, (और इस सन्दर्भ में डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने भी) टीकाकार चन्द्रशेखर के द्वारा दिये गये श्रोत्रिय जैसे प्राचीनतर पाठ की ओर पूर्णतया ध्यान नहीं दिया है।

(घ) षष्ठाङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला का चित्र मँगवाता है और उसको देखते हुए एक श्लोक का उच्चारण करता है:-

अस्यास्तुङ्गमिव स्तनद्वयमिदं, निम्नेव नाभिः स्थिता
दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तौ समायामपि।
अङ्गे च प्रतिभाति मार्दवमिदं स्निग्धप्रभावाच्चिरं
प्रेम्णा मन्मुखमीषद्रीक्षत इव स्मेरा च वक्तीव माम्।।
\hfill 6-16

यद्यपि टीकाकार चन्द्रशेखर ने उस श्लोक की टीका में लिखा है कि "पद्यमिदम् अनतिमधुरं दाक्षिणात्यपुस्तकेष्वेव दृश्यते"। (हमारे अनुमान से यह दाक्षिणात्य पाठ