भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 262 में से

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अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 15

बंगाल के दक्षिण में आया हुआ उत्कल प्रदेश होगा, क्योंकि काटयवेमादि दाक्षिणात्यादि टीकाकारों ने इस श्लोक को उल्लिखित ही नहीं किया है।) इस लिए डॉ० रिचार्ड पिशेल ने उसको अपने समीक्षित पाठ में स्थान नहीं दिया है। किन्तु रिचार्ड पिशेल ने यहाँ विदूषक की जो उक्ति को मान्यता दी है वह ध्यातव्य है:-भो भावमधुरा रेखा। स्खलति इव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु। किं बहुना, सत्त्वानुपवेशशङ्कया आलपनकौतूहलं मे जनयति।। यहाँ विदूषक की दृष्टि चित्रित शकुन्तला की देहयष्टि के निम्न एवं उन्नतप्रदेश पर स्खलन कर रही है-इस प्रकार की अभिव्यक्ति का सम्बन्ध तो स्पष्ट रूप से उपर्युक्त श्लोक के (वर्ण्य विषय के) साथ ही है। अतः रिचार्ड पिशेल को यदि विदूषक की यह उक्ति मान्य है तो फिर उपर्युक्त श्लोक को भी रखना चाहिए था। दूसरी तरह से यह बात कही जाय तो, यह दाक्षिणात्य अर्थात् उत्कलीय परम्परा का श्लोक समीक्षित पाठ के रूप में ग्राह्य नहीं है। क्योंकि टीकाकार चन्द्रशेखर के अभिप्राय से वह अनतिमधुर श्लोक है। तो फिर इस श्लोक के साथ सम्बद्ध विदूषक की जो उक्ति (भी अनतिमधुर) थी उसको भी निकाल देना चाहिए था। समीक्षित पाठ में से विदूषक की उक्ति को हटाने की आवश्यकता का कारण न केवल उस उक्ति का अनौचित्य ही है, किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने भी विदूषक की इस उक्ति का संस्कृत च्छायानुवाद नहीं दिया है। मतलब कि चन्द्रशेखर के सामने विद्यमान जो भी बंगाली पाठपरम्परा होगी उसमें विदूषक की उक्ति होगी ही नहीं, जिसके कारण चन्द्रशेखर ने उसका संस्कृतच्छायानुवाद नहीं दिया है। यह एक ऐसा ठोस कारण है जिसकी वजह से विदूषक की पूर्वोक्त उक्ति प्रक्षिप्त होने का इशारा मिल जाता है।

(ङ) तृतीयाङ्क का एक अन्य सन्दर्भ भी द्रष्टव्य है: दुष्यन्त कहता है कि सुन्दरि, जो मधुकर होता है वह कमल की गन्ध मात्र से सन्तुष्ट रहता है (3-37)। तब शकुन्तला प्रश्न करती है कि-असंतोषे पुनः किं करोति। जिसको सुनते ही राजा “इदम् इदम्”, बोलता हुआ शकुन्तला के प्रति प्रेमचेष्टा शुरू करता है। यहाँ पर एक रंगसूचना है:- “इति व्यवसितो वक्त्र ढौकते”। डॉ० रिचार्ड पिशेल ने इसी स्वरूप में उक्त रंगसूचना को छपवाया है। लेकिन इस रंगसूचना पर चन्द्रशेखर ने जो टीका लिखी है उसको यदि हम देखें तो लगता है कि रिचार्ड पिशेलजी चन्द्रशेखर की बात को समझ ही नहीं पाये हैं। चन्द्रशेखर ने लिखा है कि शकुन्तला वक्त्रं ढौकते गृह्णाति। ......। शकुन्तला कत्री वक्त्रं ढौकते, पिधत्त इत्यर्थः। न तु चुम्बतीत्यर्थः।। अर्थात् इस रंगसूचना में दुष्यन्त को क्या करना है और शकुन्तला को क्या करना है उसकी भिन्न भिन्न दो सूचनायें रखी गयी हैं। और इस लिए रिचार्ड पिशेल को इस रंगसूचना में इति व्यवसितः के बाद एक अल्पविराम का चिह्न रखना अनिवार्य था, (जो उन्होंने नहीं

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