भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 262 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

16 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

रखा है)। क्योंकि टीकाकार चन्द्रशेखर ने साफ लिखा है कि शकुन्तला के मुख पर दुष्यन्त चुम्बन करता है ऐसा अर्थ नहीं है। अन्यथा आगे चल कर दुष्यन्त जो बोलता है कि "(अस्या मुखं) कथमप्युन्नमितं, न चुम्बितं तत्" इस पङ्क्ति से विरोध आयेगा। अतः यहाँ तो ढौकते का अर्थ पिधत्ते, याने शकुन्तला (स्वयं) अपना मुख हाथों से ढकती है ऐसा ही करना चाहिए। और रंगसूचना में पाठसम्पादक को बीच में अल्पविराम का चिह्न जोड़ना चाहिए। इस दृष्टि से देखने पर बंगाली पाठ का समीक्षित पाठसम्पादन करने में टीकाकार चन्द्रशेखर की टीका का पूरा अनुगमन नहीं किया गया है यह बात सिद्ध होती है।।

सारभूत बात यही है कि किसी भी कृति के समीक्षित पाठसम्पादन में मूल कृति की पाण्डुलिपियों के साथ साथ, उन पर लिखी गयी टीकाओं का विनियोग भी प्राचीनतर पाठ को उजागर करने के लिये असाधारण महत्त्व रखता है। चन्द्रशेखर की टीका जो अद्यावधि अप्रकाशित रही थी, उसका बंगाली पाठपरम्परा का प्राचीनतर स्वरूप पुनः संप्राप्त करने के लिए एक सहायक प्रमाण के रूप में महत्त्व अनुपेक्ष्य था।

8. चन्द्रशेखर की टीका का विश्लेषण

चन्द्रशेखर ने अपनी सन्दर्भदीपिका टीका में जिन ग्रन्थों का नाम-निर्देश किया है वह इस प्रकार है:- 1. नाट्यलोचन के रचयिता त्रिलोचन मिश्र, 2. वामदेव, 3. चतुर्भुज मिश्र, 4. भर्तृहरि मिश्र, 5. अमर, 6. शंकर, 7. मेदिनी, 8. भरत, 9. भविष्यपुराण, 10. शाश्वत, 11. अद्भुतसागर, 12. विश्व, 13. यज्ञ नारायण दीक्षित (15 शती के अन्त में) प्रणीत साहित्यरत्नाकर, 14. अनन्तार्णव, 15. दर्पणकार, (विश्वनाथ द्वारा रचित साहित्यदर्पण), 16. त्रिकाण्डशेष, 17. हारावली, 18. अमरटीका, और 19. प्राकृतप्रकाश इत्यादि। इन सब के निर्देशों की गिनती की जाय तो 209 से अधिक है। जब कोई टीकाकार अपनी अभीष्ट कृति पर टीका लिखता है तब वह शब्दार्थ से लेकर वाक्यार्थ एवं काव्य-सौन्दर्य तक की सीमाओं को विशद करने की कोशिश करता है। ऐसे कार्य में यदि विविध ग्रन्थों के सन्दर्भ की दीपिका भी प्रस्तुत की जाय तो वैसी "सन्दर्भदीपिका" टीका अधिक श्रद्धेय सिद्ध होती है। चन्द्रशेखर ने अनेक स्थानों पर विविध कोषग्रन्थ के उद्धरण, भरतमुनि के विधिविधान, प्राकृतसूत्रों का प्रमाण, अलङ्कारों की पहचान प्रस्तुत करके एक अच्छे टीकाकार की भूमिका निभायी है।

चन्द्रशेखर ने उपर्युक्त जिन जिन ग्रन्थकारों का निर्देश किया है उनमें से एक, अपने पुरोगामी टीकाकार शङ्कर का अनेक स्थानों पर जो उल्लेख किया है वह ध्यानार्ह है। शंकर, जिसने अभिज्ञानशकुन्तल की मैथिली वाचना पर "रसचन्द्रिका" नामक टीका लिखी है, उसका चन्द्रशेखर ने करीब 85 बार नामशः उल्लेख किया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने शङ्कर की टीका से कुत्रचित् प्रेरणा प्राप्त करते हुए भी, अपनी अस्मिता को बनाये रखा है। जैसा

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 30, कुल 262 में से · BharatKosha