भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

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अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 17

पहले बताया गया है चन्द्रशेखर ने शङ्कर के मैथिल पाठ से अपना बंगाली पाठ भिन्न है इस बात को केन्द्र में रखा है। अनेक स्थानों पर उन्होंने शंकर के द्वारा स्वीकृत पाठभेद को उल्लिखित किया है या शङ्कर के द्वारा किये हुए शब्दार्थ से मतभेद भी प्रदर्शित किया है। एवमेव, अनेक स्थान पर उसके दिये हुए शब्दार्थ की कड़ी आलोचना भी की है। उदाहरण के लिए—परिग्रहबहुत्वेपि द्वे प्रतिष्ठे कुलस्य नः। समुद्ररसना चोर्वी सखी च युवयोरियम्।। (3-23) यहाँ पर शङ्कर ने समुद्र-शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि, “समुद्र एव रसना मेखला यस्याः सा समुद्रावच्छिन्ना उर्वी मही युवयोरियं सखी शकुन्तला। तत्पक्षे समुद्ररसना सच्छिद्रमेखला। यद्वा समुद्ररसना साङ्गुरीयकमेखला। यद्वा मुदं हर्षं, राति ददाति, मुद्रं हर्षदं यद् रसनं भाषणं, तेन सह वर्तते, समुद्ररसना प्रियभाषिणीत्यर्थः।।” (मिथिलासंस्करण, 1957, पृ. 218) यहाँ समुद्ररसना का अर्थ “प्रियभाषिणी (शकुन्तला)” करने के लिए निर्वचन का जिस तरह से आश्रयण किया गया है, वह पाण्डित्य-प्रदर्शन का उत्तम निदर्श है। और राघवभट्ट भी उसका अनुसरण करने को लालायित हो गये हैं, फिर भी चन्द्रशेखर की दृष्टि में तो वह अग्राह्य ही है। उन्होंने अपनी टीका में स्पष्ट शब्दों में लिख दिया है कि कुव्याख्या तूपेक्षिता।

इसमें, इन सब के साथ चन्द्रशेखर का मुख्य योगदान है प्राकृत उक्तियों का संस्कृतच्छायानुवाद। यहाँ एक स्पष्टता सविशेष करनी है कि शङ्कर ने नाटक की प्राकृत उक्तियों की व्याख्या की है, किन्तु चन्द्रशेखर ने ऐसी उक्तियों का सीधा संस्कृतच्छायानुवाद दिया है। इसी लिए इस नाटक की प्राकृत उक्तियों के पाठनर्धारण में यह टीका अधिक उपकारक सिद्ध होती है। द्वितीयाङ्क के आरम्भ में विदूषक की उक्ति है। यहाँ चन्द्रशेखर के सामने इस उक्ति के अभिनयन की दो विधायें होगी। अतः उनकी टीका में दो पाठान्तरों के साथ विवरण दिया जाता है। जैसे कि, हीमाणेहे-शब्दः प्राकृते खेदे। तदाह भरतः—हीमाणहे भये खेदे इति।। ही ही भोः इति च पाठः। ही ही भोः शब्दो विस्मये। यदाह भरतः—ही ही भो विस्मयार्थे तु प्रयुञ्जीत विदूषक इति।। विदूषक की उक्ति का आरम्भ दो तरह से होता है—यह बात चन्द्रशेखर ठीक तरह से जानते हैं, जिसके लिए भरत मुनि का ही वचन प्रमाण के रूप में विद्यमान है यह भी वे जानते हैं। डॉ० रिचार्ड पिशेल ने चन्द्रशेखर की प्राकृतभाषा विषयक ऐसी जानकारी को देख कर ही, उसकी टीका को अधिक प्रमाणभूत माना था।

शङ्कर काव्यार्थ-ग्रहण में अलंकार का निरतिशय महत्त्व स्वीकारते हैं, और अनेक जगहों पर विभिन्न अलङ्कारों का अभिज्ञान भी करवाते हैं। चन्द्रशेखर ने जो अनेक स्थानों पर शङ्कर का मत उल्लिखित किया है, इसका एक फायदा यह हुआ है कि शङ्कर की रसचन्द्रिका टीका का पाठ षष्ठांक के मध्य भाग 6/12 से लेकर सप्तमांक के आरम्भ तक कुछ भाग खण्डित हुआ है। तो लिपिकारों ने इतने खण्डित अंश के स्थान में चन्द्रशेखर की टीका का भाग उठाकर उनकी थीगड़ी लगा दी है! ऐसा करने का मुख्य कारण एक ही था