भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 262 में से

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18चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

कि चन्द्रशेखर ने अपनी टीका में आरम्भ से लेकर अन्त तक बार बार शंकर का मत उद्धृत किया है। अतः जहाँ पर भी शंकर की टीका खण्डित हुई है उसका कुछ कुछ अन्दाजा चन्द्रशेखर की टीका से मिल सकता था। यह बात रिचार्ड पिशेल (1876) ने लिखी थी कि शंकर की टीका का खण्डितांश चन्द्रशेखर की टीका से पूर्ण किया गया है, लेकिन मैथिली पाठ के सम्पादक श्री रमानाथ झा (1957) को इसकी जानकारी ही नहीं थी। इस लिए उन्होंने ऐसा लिखा है कि किसी लिपिकार ने शङ्कर की विस्तृत टीका का इतने भाग में संक्षेप कर दिया है।⁶ सम्भव है कि रमानाथ झा ने रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति ही नहीं देखी हो।

इनके अलावा चन्द्रशेखर ने नाट्यशास्त्रीय परिभाषाओं को विशद करने के लिए बहुत स्थानों पर भरत मुनि का नामोल्लेखपूर्वक उद्धरण दिये हैं। तथा नाट्यलोचन, कविकल्पलता, साहित्यदर्पणादि का भी विनियोग किया है। चन्द्रशेखर “अन्ये, केचिद्, गुरवः” जैसे शब्दों से किन का निर्देश करना चाहते हैं वह हम नहीं जान सकते हैं। उन्होंने विश्वनाथ के द्वारा अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क के अन्तिम श्लोक में “कथमपि उन्नमितं न चुम्बितं तत्” के स्थान पर “कथमपि उन्नमितं न चुम्बितं तु” जैसा पाठभेद स्वीकारा गया है, एवं पञ्चम अङ्क के पञ्चम श्लोक में जो नवीन पाठान्तर की उद्भावना की है उसका उल्लेख भी किया है। वे लिखते हैं कि—दर्पणकारेण तु नवीकृतपाठान्तरेण पद्यम् इदमुदाहृतम्। (यहाँ पर वे विश्वनाथ को अपने पिता के रूप में उल्लिखित नहीं करते हैं। टीका की पुष्पिका में तो उन्होंने अपने आप को विष्णु पण्डित का पुत्र कहा है।) एवमेव, गाहन्तां महिषाः (1- 10) श्लोक पर उन्होंने काव्यदोष के सन्दर्भ में जो चर्चा प्रस्तुत की है उसमें “प्राज्ञ” शब्द से महिमभट्ट के मत का निर्देश भी किया है।

अभिज्ञानशकुन्तल एक नाटक होने से उसमें दो चरित्रों के बीच में जो बातचीत होती है, जो संवाद होते हैं, उसमें नाना अव्ययों का विनिवेश बहुशः होता है। अतः इन अव्ययों का सन्दर्भगत अर्थ स्पष्ट करने की जिम्मेवारी टीकाकार की होती है। इस कार्य को शङ्कर ने तो किया ही था, लेकिन चन्द्रशेखर ने उसमें भी कुत्रचित् कुछ विशेष भी जोड़ा है, कुछ अलग भी अर्थ दिखलाये हैं। यह भी एक महनीय सेवा कही जा सकती है। एक उदाहरण देखना आवश्यक हैः प्रथमाङ्क में, न खलु न खलु० वाले (1-10) श्लोक में “क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं, क्व च निशितनिपाताः सारपुङ्खा शरास्ते।” इस पङ्क्ति में दो बार क्व निपात का विनिवेश किया गया है। यहाँ पर शङ्कर ने क्व-द्वय के प्रयोग का


  1. It is much more reasonable to belive that this protion is an abridgement from the original commentary by a scribe, who had, perhaps, no time to make a complete copy of the manuscript which he was transcribing. See: The Abhijñanaśakuntalam, with the commentaries of Śankara & Narahari, Ed. Ramanath Jha, Darbhanga, 1957, p. 27.