भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ
18चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

कि चन्द्रशेखर ने अपनी टीका में आरम्भ से लेकर अन्त तक बार बार शंकर का मत उद्धृत किया है। अतः जहाँ पर भी शंकर की टीका खण्डित हुई है उसका कुछ कुछ अन्दाजा चन्द्रशेखर की टीका से मिल सकता था। यह बात रिचार्ड पिशेल (1876) ने लिखी थी कि शंकर की टीका का खण्डितांश चन्द्रशेखर की टीका से पूर्ण किया गया है, लेकिन मैथिली पाठ के सम्पादक श्री रमानाथ झा (1957) को इसकी जानकारी ही नहीं थी। इस लिए उन्होंने ऐसा लिखा है कि किसी लिपिकार ने शङ्कर की विस्तृत टीका का इतने भाग में संक्षेप कर दिया है।⁶ सम्भव है कि रमानाथ झा ने रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति ही नहीं देखी हो।

इनके अलावा चन्द्रशेखर ने नाट्यशास्त्रीय परिभाषाओं को विशद करने के लिए बहुत स्थानों पर भरत मुनि का नामोल्लेखपूर्वक उद्धरण दिये हैं। तथा नाट्यलोचन, कविकल्पलता, साहित्यदर्पणादि का भी विनियोग किया है। चन्द्रशेखर “अन्ये, केचिद्, गुरवः” जैसे शब्दों से किन का निर्देश करना चाहते हैं वह हम नहीं जान सकते हैं। उन्होंने विश्वनाथ के द्वारा अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क के अन्तिम श्लोक में “कथमपि उन्नमितं न चुम्बितं तत्” के स्थान पर “कथमपि उन्नमितं न चुम्बितं तु” जैसा पाठभेद स्वीकारा गया है, एवं पञ्चम अङ्क के पञ्चम श्लोक में जो नवीन पाठान्तर की उद्भावना की है उसका उल्लेख भी किया है। वे लिखते हैं कि—दर्पणकारेण तु नवीकृतपाठान्तरेण पद्यम् इदमुदाहृतम्। (यहाँ पर वे विश्वनाथ को अपने पिता के रूप में उल्लिखित नहीं करते हैं। टीका की पुष्पिका में तो उन्होंने अपने आप को विष्णु पण्डित का पुत्र कहा है।) एवमेव, गाहन्तां महिषाः (1- 10) श्लोक पर उन्होंने काव्यदोष के सन्दर्भ में जो चर्चा प्रस्तुत की है उसमें “प्राज्ञ” शब्द से महिमभट्ट के मत का निर्देश भी किया है।

अभिज्ञानशकुन्तल एक नाटक होने से उसमें दो चरित्रों के बीच में जो बातचीत होती है, जो संवाद होते हैं, उसमें नाना अव्ययों का विनिवेश बहुशः होता है। अतः इन अव्ययों का सन्दर्भगत अर्थ स्पष्ट करने की जिम्मेवारी टीकाकार की होती है। इस कार्य को शङ्कर ने तो किया ही था, लेकिन चन्द्रशेखर ने उसमें भी कुत्रचित् कुछ विशेष भी जोड़ा है, कुछ अलग भी अर्थ दिखलाये हैं। यह भी एक महनीय सेवा कही जा सकती है। एक उदाहरण देखना आवश्यक हैः प्रथमाङ्क में, न खलु न खलु० वाले (1-10) श्लोक में “क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं, क्व च निशितनिपाताः सारपुङ्खा शरास्ते।” इस पङ्क्ति में दो बार क्व निपात का विनिवेश किया गया है। यहाँ पर शङ्कर ने क्व-द्वय के प्रयोग का


  1. It is much more reasonable to belive that this protion is an abridgement from the original commentary by a scribe, who had, perhaps, no time to make a complete copy of the manuscript which he was transcribing. See: The Abhijñanaśakuntalam, with the commentaries of Śankara & Narahari, Ed. Ramanath Jha, Darbhanga, 1957, p. 27.

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 19

समाधान देते हुए कहा है कि विस्मय और विषाद प्रदर्शित करने के लिए क्व की पुनरुक्ति दोषजनक नहीं मानी जाती है। लेकिन चन्द्रशेखर के मत में ऐसा व्याख्यान तो कुव्याख्यान है। अतः उसका स्वारस्य स्पष्ट करने के लिए चन्द्रशेखर ने अपने किसी गुरुजी का मत लिखा है। उसमें कहा है कि धनुर्धारी व्यक्ति के लिए दो पौरुष गिने जाते हैं। एक, दुर्भेद्य वस्तु का भेदन करना और दूसरा, दुर्मर व्यक्ति को मारना। लेकिन प्रकृत में तो पुष्प में ऐसा कोई दुर्भेद्यत्व नहीं है और हरिण में दुर्मरत्व नहीं है। इस तरह अत्यन्त असम्भवित बात के लिए क्व-द्वय का प्रयोग होता है। इस तरह से चन्द्रशेखर ने अन्यत्र भी अमर, त्रिकाण्डशेष, अमरटीका, विश्व, मेदिनी, शाश्वत, हारावली, कोष इत्यादि का विनियोग किया है तथा आवश्यकता होने पर अमुक शब्द का देशी भाषा में क्या अर्थ होता है वह भी लिखा है। (इन सभी सन्दर्भग्रन्थों की सूची को परिशिष्ट-2 में रखा गया है।)

चन्द्रशेखर के द्वारा प्रस्तुत किये गये करीब 15 पाठान्तरों में से कुछ पाठान्तर काश्मीरी वाचना के साथ संगत बैठते हैं। उदा. 1. प्रथमाङ्क में, नेदं विस्मरिष्यामि। 2.चतुर्थाङ्क में, कृतावमर्षाम् अनुमन्यमानः। 3. तृतीयाङ्क के अन्त भाग में, कण्वाश्रम की गौतमी की पहचान देते हुए उसे कण्व की “धर्मभगिनी कनीयसी” कहा है, जो काश्मीरी पाठ के अनुरूप है। इसके अलावा अन्य सभी पाठान्तर प्रायः बंगाली वाचना के साथ संगत होते हैं।

चन्द्रशेखर ने कुल मिला कर 225 श्लोकोंवाले अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ पर टीका लिखी है। उन्होंने जो पाठ स्वीकार कर टीका लिखी है, वह बंगाली वाचना का परम्परागत पाठ है। यद्यपि यह उल्लेखनीय है कि प्रेमचन्द, डमरूवल्लभ एवं कृष्णनाथ ने भूतकाल में बंगाली वाचना का जो (230 श्लोकोंवाला) एक प्रलम्ब पाठ प्रकाशित किया था उससे भिन्न पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है। इस तरह चन्द्रशेखर ने बंगाली वाचना का जो पाठ स्वीकारा है वही अधिक प्रामाणिक लगता है। चन्द्रशेखर ने प्राचीनतम पाण्डुलिपियों में संचरित बंगाल के साम्प्रदायिक पाठ को ही स्वीकारा है। कुछ श्लोकों का पाठ प्राचीन काल से पाण्डुलिपियों में संचरित होते हुए भी उसको प्रक्षिप्त भी बताया है। उदाहरण के रूप में-कठिनमपि० (1-20), तुम्हे .. महिलाः। (5-24), अ(त)स्याः तुङ्गमिव० (6-16) इत्यादि। इसके आधार पर कह सकते हैं कि बंगाली वाचना का जो पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है, वह अपेक्षाकृत अधिक श्रद्धेय है, और उसमें प्रक्षिप्तांश कम हैं।

बंगाली पाठ की मौलिकता के समर्थक कृतिनिष्ठ प्रमाण

0-0 महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का मूल पाठ कैसा होगा? यह प्रश्न निरतिशय विवादास्पद होते हुए भी विद्वानों के लिये अनुपेक्ष्य है। क्योंकि, किसी भी एक-कर्तृक काव्य के पाठ की मौलिकता जब तक सिद्ध नहीं होती है तब तक उसके काव्यशास्त्रीय गुण-दोष की चर्चा करना, या उसमें से किसी भी तरह का काव्यार्थ निकालना

20 | चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्


विवादास्पद एवं कदाचित् अन्यथासिद्ध हो सकता है। अतः काव्य की साहित्यशास्त्रीय समीक्षा करने से पहले उसके पाठ की आलोचना करना अनिवार्य है।

0-1 अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का पाठ मुख्य रूप से दो-लघु और बृहत्-पाठपरम्पराओं में प्रचलित हुआ है। किन्तु, इस नाटक की रचना एक ही कवि ने की है, अर्थात् यह नाटक एककर्तृक है तो उसका मूल पाठ भी एक ही स्वरूप का होना अपेक्षित है। दो तरह का अभिज्ञानश(शा)कुन्तल तो कालिदास ने नहीं लिखा होगा। अतः हमें यह ढूँढना ही चाहिये कि इस नाटक की दो तरह की पाठपरम्पराओं में से किसका पाठ मौलिक होने की सम्भावना ज्यादा है। तार्किक दृष्टि से सोचा जाय तो यहाँ दो तरह की सम्भावनायें दिखायी देती हैं। जैसे कि, 1. कालिदास-प्रणीत मूल पाठ लघु-आकार का, अर्थात् लघुपाठ होगा, और परवर्ती काल में उसी मूल पाठ में नाट्यप्रयोग के दौरान कुछ नये अंश जोड़े गये होंगे। इस तरह शाकुन्तल का बृहत् पाठ कालान्तर में तैयार हुआ होगा। अथवा 2. महाकवि के द्वारा नाटक का बृहत्पाठ ही पहले से लिखा गया होगा और कालान्तर में उसमें से कुछ अंश काट-छाट कर (रंगभूमि की आवश्यकतानुसार और सीमित समय में जिसकी प्रस्तुति हो सके ऐसा) संक्षिप्त (लघु) पाठ तैयार किया गया होगा। अतः यह कहना मुश्किल है कि महाकवि कालिदास ने ही अपने हाथ से लिखा हो ऐसा (मौलिक) पाठ इन दोनों में से कौन सी पाठपरम्परा में सुरक्षित रहा होगा? इस सन्दर्भ में, नाटक की काव्यशास्त्रीय दृष्टि से आलोचना करके विद्वानों ने दो पक्ष बना लिये हैं-देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित लघुपाठ ही अधिक व्यञ्जनापूर्ण है, इसलिए उसीको श्रद्धेय पाठ परम्परा मानना चाहिए। तथा बंगाली और मैथिली पाठ में स्थूल शृङ्गारिक दृश्यावली ज्यादा है,⁷ अतः उसमें मौलिक पाठ का होना संशयग्रस्त है। दूसरी ओर, अल्पसंख्यक विद्वान् ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि देवनागरी वाचना का संक्षिप्त पाठ तो कालान्तर में बनाया गया है।

बंगाली पाण्डुलिपिओं में संचरित हुआ पाठ ही मौलिक है ऐसा कहनेवालों में सर्वप्रथम कोलकाता के प्रॉफेसर डॉ० श्री दिलीपकुमार काञ्जीलाल (Kanjilal, A reconstruction of the Abhijñānaśakuntalam, 1980) का प्रयास अतीव ध्यानास्पद है। उन्होंने अनेकानेक प्रमाणों से यह स्थापित किया है कि बंगालीलिपि में संचरित हुआ पाठ ही सर्वाधिक श्रद्धेय है, एवं प्राचीनतम भी है। सम्माननीय विद्वान् डॉ० श्री काञ्जीलाल ने अपने मत के समर्थन में जो प्रमाण दिये हैं वे श्रीहर्ष की नाटिकायें एवं काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के उद्धरणादि रूप बाह्य प्रमाण हैं। अब यहाँ बंगाली पाठ की मौलिकता


  1. बङ्गीय पाठ में प्रथम मिलन में ही शकुन्तला अठखेलियाँ करती दिखायी गयी है, जो कालिदास की प्रवृत्ति से विरुद्ध है।। कालिदासः अपनी बात (भारतीय दृष्टि) डॉ० रेवाप्रसाद द्विवेदी, कालिदास संस्थान, वाराणसी, 2004, पृ० 54

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 21

के सविशेष समर्थक बन सके ऐसे कुछ आन्तरिक प्रमाण, जो सर्वथा कृतिनिष्ठ ही हैं, उसकी ओर सहृदयों का ध्यान आकृष्ट किया जाता है$^8$।

1-1 प्रो. श्री एस. के. बेलवलकर जी ने सब से पहले इस बात की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है कि देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित हुए अभिज्ञानशाकुन्तल के (तृतीयाङ्क के) पाठ में समयसम्बन्धी जो सूचना दी गयी है, उनमें अन्तर्निहित एक विसंगति खटकनेवाली है। जैसे कि-तृतीयाङ्क का आरम्भ मध्याह्न में होता है। नायक दुष्यन्त उग्र-आतपवाले मध्याह्न में शकुन्तला को ढूँढ़ने के लिए मालिनी नदी के आसपास लतावलयों में जाता है।$^9$ उसके बाद पुष्पशय्या पर लेटी हुई शकुन्तला रंगमंच पर आती है, उसके साथ दो सहेलियाँ भी है। यहाँ क्रमशः शकुन्तला की शरीरबाधा का कारण उन्मीलित होता है, शकुन्तला मदनलेख लिखती है और राजा प्रकट होकर शकुन्तला को अपने कुल की प्रतिष्ठा के रूप में बताता है। इसको सुन कर आश्वस्त हुई दोनों सहेलियाँ मृगबाल को उसकी माता के पास पहुँचाने का बहाना बनाकर (नायक-नायिका को एकान्त देने के लिए) वहाँ से चली जाती हैं। अब एकाकिनी शकुन्तला लतामण्डप से बाहर चली जाने को तत्पर होती है तो राजा उसे कहते हैं कि-"सुन्दरि, अपरिनिर्वाणो दिवसः। इयं च ते शरीरावस्था। उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनीदल-कल्पितस्तनावरणम् आतपे गमिष्यसि परिबाधा पेलवैरङ्गैः। (3-19) (इति बलादेनां निवर्तयति।)" यहाँ दुष्यन्त ने साफ बताया है कि अभी दिवस परिणत नहीं हुआ है। लतामण्डप से बाहर कड़ी धूप में तुम कैसे जाओगी? किन्तु, देवनागरी वाचना के पाठ में दुष्यन्त के इस वाक्य से सूचित होता है कि यह मध्याह्न का समय चल रहा है। उसके बाद नायक-नायिका के बीच केवल पाँच-छह संवाद ही होते हैं और तुरन्त नेपथ्य से कहा जाता है कि-चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी। हे चक्रवाकी, अपने प्रियसहचर से बिदा ले लो, रात्रि का आगमन हो गया है।। इस तरह से देवनागरी पाठ में, मध्याह्न में शुरू हुई एकान्त मिलन की घटना केवल पाँच-छह संवादों में समेट ली जाती है और तुरन्त रात्रि का आगमन होने की सूचना दी जाती है। सुज्ञ प्रेक्षक देख सकेगा कि मध्याह्न एवं रात्रि के बीच में कितना लम्बा अन्तराल पड़ा है और इस समयावधि में पाँच-छह संवाद से कहीं अधिक बातचीत एवं घटना घटित होना अपेक्षित है। लेकिन देवनागरी पाठ में ऐसा कुछ विस्तार है ही नहीं। अतः सिद्ध हो जाता है कि देवनागरी पाठ में अनेक संवादों की भारी कटौती की गयी है।


  1. डॉ० एस.के. बेलवलकरजी, पूना ने "निसर्ग-कन्या शकुन्तला" (कालिदास-ग्रन्थावली, अनु. सीताराम चतुर्वेदी, अलीगढ़, 1963) शीर्षक वाले आलेख में जो उदाहरण प्रस्तुत किये हैं वे आन्तरिक सम्भावना के बलवत्तर उदाहरण हैं।
  2. क्व नु खलु संस्थिते कर्मणि सदस्यै रनुज्ञातः श्रमक्लान्तमात्मानं विनोदयामि। (निःश्वस्य) किं न खलु मे प्रियादर्शनादृते शरणमन्यत्। यावदेना मन्त्रामयिष्यामि। (सूर्यम् अवलोक्य) इमामुग्रातपवेलां प्रायेण लतावलयवत्सु मालिनीतीरेषु ससखीजना शकुन्तला गमयति। तत्रैव गच्छामि। -अभिज्ञानशाकुन्तलम्, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, 2006, पृ. 87

22
चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

इसके प्रतिपक्ष में, बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में मध्याह्न, सायन्सन्ध्या¹⁰ और फिर रात्रि का सन्दर्भ स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है। इससे भी सूचित होता है कि बंगाली पाठ में मौलिकता की सुरक्षा हुई होगी। जिसके कारण देवनागरी अभिज्ञानशाकुन्तल के तृतीयाङ्क में जहाँ 24 श्लोक हैं, वहाँ बंगाली अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क में 41 श्लोकों का विस्तार है। सारतः कहा जाय तो तृतीयाङ्क में संक्षेप या प्रक्षेप का निर्णय समय-संगति को ध्यान में लेकर करना चाहिए, वही एक अकाट्य दृढ़ आन्तरिक प्रमाण है।

2-0 दूसरे प्रमाण के रूप में कवि की नाट्य-शैली को परखना चाहिए। जो नाट्य-शैली समग्र कृति में साद्यन्त व्याप्त है ऐसा दिखता है तो वही एक सबल आन्तरिक प्रमाण है। पाठालोचना में ऐसे ही प्रमाण को पुरस्कृत करते हुए समीक्षित पाठ की उच्चस्तरीय समीक्षा की जाती है। अभिज्ञानशकुन्तल नाटक के वस्तुग्रथन में "एक दृश्य (रूप) के सामने उसी प्रकार का एक दूसरा प्रतिदृश्य (प्रतिरूप)" खड़ा करने की नाट्य-शैली दिखायी दे रही है। जैसे कि, प्रथम अङ्क में शिकारी दुष्यन्त का प्रवेश होता है और "न हन्तव्यो, न हन्तव्यः" ऐसे शब्द सुनायी पड़ते हैं। तो सप्तम अङ्क में जब सिंहशावक को सतानेवाला सर्वदमन भरत का दृश्य शुरू होता है तो वहाँ पर "मा खलु, मा खलु चापलं कुरु" ऐसे शब्द नेपथ्य से आते हैं। उसी तरह से द्वितीयाङ्क और षष्ठांक की तुलना भी विचारणीय है। वहाँ पर विदूषक राजा के मृगया-व्यसन से क्षुधातुर, तृषातुर और श्रमातुर स्थिति में दयाजनक पीड़ा का अनुभव करता है। लेकिन उसी अङ्क के अन्त में वह राजा को आश्रम में रहने की अनुकूलता प्रदान करने में सहायक होता है और युवराज होकर रंगभूमि से बिदा होता है। इसी दृश्य के सामने षष्ठांक के प्रवेशक में, धीवर नगररक्षकों के हाथ से मारा-पीटा जा रहा है। निर्दोष मछेरा भी दयाजनक पीड़ा का अकारण अनुभव करता है। लेकिन वह भी राजा के लिए दुःषन्त-नामधेयांकित अंगूठी देता है, जो राजा को शकुन्तला की याद दिलाने में सहायक होती है। अब यह धीवर भी शूली से उतर कर हस्तिस्कंध पर आरोहित होने का संतोष लेकर रंगभूमि से बिदा लेता है। तृतीय अङ्क में विटपान्तरित दुष्यन्त शकुन्तला की मदनावस्था को सुनता है (शाकु. 3/8 के बाद) तब बोलता है "श्रुतं श्रोतव्यम्।" फिर वही दुष्यन्त पञ्चमाङ्क में शकुन्तला को ताना मारता सुनायी पड़ता है कि" श्रोतव्यम् इदानीं संवृत्तम्।" (शाकु. 5/22 के ऊपर)। उसी तरह से प्रथमाङ्क के भ्रमरबाधा प्रसङ्ग में, दुष्यन्त भ्रमर के प्रतिस्पर्धी के रूप में "वयं तत्त्वान्वेषान् मधुकर हतास्त्वं खलु कृती" (शाकु. 1/20) कहता है। वही दुष्यन्त षष्ठाङ्क में, चित्रफलक में भ्रमरबाधा प्रसङ्ग का फिर से निरूपण करता है। तब भ्रमर को कहता है कि "एषा कुसुमनिषण्णा तृषतापि सती भवन्तमनुरक्ता। प्रतिपालयति मधुकरी न खलु मधु विना त्वया पिबति। (शाकु. 6/19)" यहाँ वह भ्रमर को उपदेष्टा के रूप में दिखाया गया है। इस तरह से पूरे नाटक में, आदि से


  1. त्वं दूरमपि गच्छन्ती हृदयं न जहासि मे। दिनावसानच्छायेव पुरोमूलं वनस्पतेः।। 3-29

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 23

लेकर अन्त तक, एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप खड़ा करने की योजना से नाट्यकार्य प्रवर्तित किया गया है। इस प्रकार की नाट्य-शैली को आन्तरिक प्रमाण के रूप में आधार बना कर सोचा जाय तो तृतीयाङ्क का पाठ, जो देवनागरी पाठपरम्परा में लघु-आकार का है, और बंगाली पाठपरम्परा में बृहदाकार का है, इन दोनों में से कहाँ पर मौलिकता होगी, इस प्रश्न का समाधान मिल जाता है।

2-1 बृहदाकार की बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क का पाठ लेकर उसकी तुलना षष्ठाङ्क के पाठ की साथ करनी होगी। इससे इन दो अङ्कों में भी रूप-प्रतिरूप की एक लाक्षणिक योजना अन्तर्निहित है। षष्ठांक में, दुष्यन्त ने चित्रफलक में दो सहेलियों के साथ में रही शकुन्तला का चित्र बना लिया है। तब विदूषक पूछता है कि-भोः, अपरं किमत्र लिखितव्यम्। (अब इसमें और क्या चित्रित करना है?) इसके जवाब में दुष्यन्त ने प्रेमाविष्ट होकर एक श्लोक प्रस्तुत किया है जो शाकुन्तल की सभी वाचनाओं में सुरक्षित रहा है:

कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी,
पादास्तामभितो निषण्णचमरा गौरीगुरोः पावनाः।
शाखालम्बितवल्कलस्य च तरोर्निमातुमिच्छाम्यधः,
शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम्।।
6/17

अब सोचना यह है कि धीवरप्रसङ्ग के बाद, दुष्यन्त को जब शकुन्तला का स्मरण पूर्ण रूप से हो गया है तब विरहातुर बना दुष्यन्त पूर्वानुभूत (प्रथम एवम् तृतीय अङ्क के) कौन कौन से प्रसङ्गों को चुन चुन कर चित्राङ्कित करना चाहता है (राघवभट्ट, 2006)¹¹। तो उपर्युक्त श्लोक में जो जो कहा गया है उसका ध्यान से परीक्षण करने की आवश्यकता है:

  1. दुष्यन्त कण्वाश्रम के पास बहती हुई मालिनी नदी को याद कर रहा है। जिसकी सिकता में बैठे हुए हंस-मिथुन को वह चित्रित करना चाहता है।
  2. मालिनी की पार्श्वभूमि में स्थित पार्वती के पिता अर्थात् हिमालय को वह चित्रित करना चाहता है जिसकी निश्रा में चामरों / हरिणों के यूथ बैठे हो।
  3. वहाँ एक वृक्ष की शाखाओं पर ऋषिमूनिओं के अथवा शकुन्तला के वल्कल सुखाने के लिये टाँगे गये हों और उस वृक्ष की छाया में, नीचे दो मृग (जिसमें एक मृग हो

  1. कार्येति। अनेन पद्येनाश्रमस्थं पूर्वानुभूतं तदानींतनम् उद्दीपनं विभावगणं स्मरति। -अभिज्ञानशाकुन्तलम् (राघवभट्टस्य टीकया सहितम्), सं. नारायण राम आचार्य, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली, 2006 (पृ. 212)

24 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

और दूसरी मृगी हो) खड़े हों-ऐसा वह चित्रित करना चाहता है। यहाँ मालिनी, हंस, हिमालय, हरिण और वल्कल-वस्त्र इत्यादि का उल्लेख तो (प्रथम अङ्क के कण्वाश्रम के) पूर्वदृष्ट स्थल का ही स्मरण है ऐसा तुरन्त समझ में आता है।

  1. किन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है कि मृग के शृङ्ग पर अपना वाम-नेत्र खुजलाती हुई (कण्डूयमाना) मृगी चित्रित करने की भावना दुष्यन्त के मन में कैसे / कहाँ से पैदा हुई होगी?

यहाँ चतुर्थ बिन्दु में जो प्रश्न उपस्थित किया गया है उसका उत्तर देवनागरी वाचना के तृतीयाङ्क के संक्षिप्त पाठ में से मिलता ही नहीं है। उसका उत्तर तो केवल बंगाली वाचना के बृहत्पाठ को देखने पर ही मिलता है। बंगाली वाचनावाले अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क में कहा गया है कि, शकुन्तला के कान में लगाये उत्पलपुष्प की परागरज (परिमल) पवन के कारण उसकी आँख में गिरे हैं, अतः उसकी दृष्टि कलुषित हुई है (पिशेल, 1922 (द्वितीयावृत्ति)¹²। इस प्रसङ्ग में दुष्यन्त ने वहाँ कहा था कि मैं मेरे वदन- मारुत से तुम्हारी दृष्टि को स्वच्छ कर देने को तैयार हूँ।¹³ तृतीयांक के इसी प्रसङ्ग को लक्षित करते हुए महाकवि कालिदास ने, षष्ठाङ्क में दुष्यन्त से कृष्णमृग के शृङ्ग पर अपना वामनेत्र खुजलाती (कण्डूयमाना) मृगी का चित्र आकारित करने की इच्छा व्यक्त करवायी है। अर्थात् बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में शकुन्तला के जो कलुषित नेत्र को परिमार्जित कर देने का प्रसंग आता है उसका प्रतिदृश्य षष्ठाङ्क में खड़ा किया गया है। किन्तु देवनागरी वाचना के तृतीयांक में वह नेत्रकलुषित होने का प्रसंग हटाया गया है, अतः उस वाचना के षष्ठांक में “कण्डूयमानाम् मृगीम्” का निर्देश होते हुए भी उस चाहत का बीज कहाँ है यह प्रेक्षक नहीं जान सकता है।

2-2 यह भी स्मरणीय है कि इस नाटक में सर्वत्र हरिण को शकुन्तला का प्रतीक बनाया गया है। प्रथमाङ्क में आश्रममृग को नहीं मारने की शर्त पर उसको चक्रवर्ती पुत्र होने का आशीर्वाद मिला है। जिसका गर्भितार्थ यह है कि शिकारी बन कर तो दुष्यन्त को हरिणी-स्वरूपा शकुन्तला नहीं मिलनेवाली है। हरिण हो कर ही हरिणी को प्राप्त किया जा सकता है। पञ्चमाङ्क के प्रत्याख्यान-प्रसंग में उसने भले ही ताना मारते हुए बोल दिया था कि “द्वावप्यत्रारण्यकौ। सर्वः सगन्ध्विषु विश्वसति।” लेकिन अनजान में भी बोला गया एक परम सत्य था। अब धीवर से अङ्गूठी मिल जाने पर उसे समझ में आ गया है कि हरिणी-स्वरूपा शकुन्तला को प्राप्त करने के लिए उसको भरोसेमन्द हरिण होकर ही


  1. राजा- सुन्दरि, कर्णोत्पलसंनिकर्षाद् ईक्षणसादृश्यमूढोऽस्मि। (इति मुखमारुतेन चक्षुः सेवते) पृ. 40
  2. राजा -(सस्मितम्) यदि मन्यसे अहमेनाम् वदनमारुतेन विशदां करिष्ये। अभिज्ञानशाकुन्तलम्। सं. रिचार्ड पिशेल, हार्वर्ड युनि. प्रेस, पृ. 40

अभिज्ञानशकुन्तलम्
प्रस्तावना
25

शकुन्तला के सामने खड़े रहना है। कण्डूयमानां मृगीम्-को चित्रित करने की चाहत का यह राज है। बंगाली वाचना के तृतीयांक में कर्णोत्पलररेणु से कलुषित हुई शकुन्तला की दृष्टि परिमार्जित कर देने का जो पूर्वप्रसंग है उसी का प्रतिदृश्य षष्ठांक के “कार्या सैकतलीनहंसमिथुना....।” वाले श्लोक में निरूपित हुआ है। इस तरह देवनागरी एवं बंगाली वाचना के षष्ठाङ्क के कण्डूयमानाम् मृगीम्-का चित्र बनाने की चाहत का पूर्व रूप बंगाली वाचना वाले (तृतीयाङ्क के) पाठ में ही उपलब्ध होता है, देवनागरी वाचना में से नहीं। क्योंकि देवनागरी वाचना में से तो कर्णोत्पलरेणु से शकुन्तला की दृष्टि कलुषित होने पर उसको परिमार्जित कर देने का प्रसंग हटाया गया है। अतः, बंगाली वाचना के बृहत्पाठ को प्रक्षिप्त न कह कर, उसे मौलिक मानने को हम बाध्य हो जाते हैं।

2-3 उपर्युक्त सन्दर्भ ऐसे हैं जिसमें सभी वाचनाओं में समान रूप से षष्ठाङ्क में आये हुए श्लोक को आधार बनाकर बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के प्रलम्ब पाठ की मौलिकता का समर्थन किया गया है। इसी अनुसन्धान में एक दूसरा प्रमाण भी प्रस्तुत किया जाता है। देवनागरी, दाक्षिणात्य, काश्मीरी, मैथिली एवं बंगाली सभी वाचनाओं$^{14}$ के तृतीयाङ्क के अन्त भाग में समान रूप से एक श्लोक (देवनागरी का 3 / 23) ऐसा दिखाया जाता है जिस में आये हुए एक शब्द का समर्थन केवल बंगाली वाचना का (तृतीयाङ्क का बृहत्) पाठ ही कर सकता है। अब ऐसे आन्तरिक प्रमाण के रूप में सिद्ध होनेवाले श्लोक की चर्चा की जा रही है:-देवनागरी (इत्यादि) पाँचों वाचनाओं के शाकुन्तल में, तृतीयाङ्क के अन्त में, गौतमी के साथ शकुन्तला चली जाती है। तत्पश्चात् दुष्यन्त प्रियापरिभुक्त लतावलय में कुछ क्षणों के लिये खड़ा रहता है। वह यहाँ एक श्लोक बोलता है:

तस्याः पुष्पमयी शरीरलुलिता शय्या शिलायामियं,
क्लान्तो मन्मथलेख एष नलिनीपत्रे नखैरर्पितः।
हस्ताद् भ्रष्टम् इदं बिसाभरणम् इत्यासज्यमानेक्षणो,
निर्गन्तुं सहसा न वेतसगृहाच्छक्नोमि शून्यादपि॥
\hfill 3/23

(देवनागरी वाचना के) इस श्लोक में 1. शकुन्तला की पुष्पमयी शय्या, 2. उसका नलिनीपत्र पर लिखा हुआ मन्मथलेख, तथा 3. उसके हाथ से निकला हुआ कोई एक बिसाभरण (वलय)-इन तीन चीजों का स्पष्ट निर्देश है। लेकिन, देवनागरी, दाक्षिणात्य एवं काश्मीरी$^{15}$ वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में कहीं पर भी शकुन्तला को दुष्यन्त द्वारा पहनाये हुए बिसाभरण (कमलतन्तु का वलय) का प्रसंग नहीं है। ऐसे प्रसंग का उल्लेख


  1. देवनागरी, दाक्षिणात्य, काश्मीरी, मैथिली एवं बंगाली-इन पाँचो वाचनाओं में।
  2. जो साहित्य अकादेमी, दिल्ली से डॉ० ए.के. बेलवलकरजी द्वारा संपादित शाकुन्तल है उसमें यह अंश नहीं है।

26 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

तो एकमात्र बंगाली (एवं मैथिली) वाचना में ही प्राप्त होता है। बंगाली वाचना का निम्नोद्धृत अंश पठनीय है:-

राजा—सम्प्रति प्रियाशून्ये किमस्मिन् करोमि। (अग्रतोऽवलोक्य) हन्त, व्याहतं गमनम्। मणिबन्धनगलितम् इदं संक्रान्तोशीरपरिमलं तस्याः। हृदयस्य निगडमिव मे मृणालवलयं स्थितं पुरतः।। (3 / 31), (सबहुमानम् आदत्ते)

शकुन्तला—(हस्तं विलोक्य) अम्मो, दोब्बल्यसिढिलदाए परिब्भट्ठं पि मुणालवलअं मए ण परिण्णादं। (अहो, दौर्बल्यशिथिलतया परिभ्रष्टमपि मृणालवलयं मया न परिज्ञातम्।)

राजा—(मृणालवलयमुरसि निक्षिप्य) अहो स्पर्शः। अनेन लीलाभरणेन ते प्रिये विहाय कान्तं भुजमत्र तिष्ठता। जनः समाश्वासित एष दुःखभागचेतनेनापि सता, न तु त्वया।।

(अभिज्ञानशकुन्तलम् 3 / 32, रिचार्ड पिशेल की बंगाली वाचनावाली आवृत्ति, पृ. 38).

दुष्यन्त की यह उक्ति सुनने के बाद शकुन्तला फिर से लतामण्डप में उस वलय को वापस ले लेने के निमित्त से प्रवेश करती है। यहाँ शकुन्तला ने जो लीलाभरण के रूप में हाथ में एक मृणालवलय पहना था उसका स्पष्ट शब्दों में उल्लेख है। इस प्रसङ्ग में (शकुन्तला के शब्दों में) जो “वलय” (और दुष्यन्त के शब्दों में जो) “लीलाभरण” का निर्देश है, उसीको देवनागरी वाचना के पूर्वोक्त (शाकु. 3 / 23) श्लोक के “बिसाभरणम्” शब्द से रखा गया है। एवमेव, देवनागरी (इत्यादि) वाचना के तृतीयाङ्क के आरम्भ में ही कहा गया है कि शकुन्तला के हाथ में पहना हुआ मृणालवलय शुरू से ही “प्रशिथिल” था। अतः उस वलय के गिर जाने का प्रसंग आकारित होने की सम्भावना एवं अपेक्षा है ही। लेकिन शकुन्तला के हाथ से मृणालवलय गिरने का प्रसंग केवल बंगाली और मैथिली वाचना के पाठ में तथा कश्मीर की शारदा पाण्डुलिपियों में ही सुरक्षित रहा है। यह तीसरा आन्तरिक प्रमाण है जिसके द्वारा बंगाली आदि के प्रलम्ब पाठ की मौलिकता सिद्ध होती है।

बंगाली वाचना के शकुन्तल नाटक में तृतीयाङ्क में कुल मिला कर 41 या 42 श्लोकों का समुदाय है। उसके सामने देवनागरी वाचना और दाक्षिणात्य वाचनावाले शाकुन्तल नाटक के तृतीय अङ्क में केवल 23 या 24 श्लोक प्राप्त होते हैं। अतः यदि किसी अज्ञात रंगकर्मी ने बंगाली वाचना के बृहत् पाठ में काट-छाँट करके, देवनागरी वाचना का संक्षिप्त पाठ बनाया होगा तो उसका कोई न कोई सबूत देवनागरी वाचना के पाठ में ही अनजान में भी रहा होगा—अब ऐसा अनुमान करने को हमारा मन उद्यत होता है। उस अनुमान को दृढीभूत करनेवाला यह (3 / 23) श्लोक (संक्षिप्त की गयी) देवनागरी वाचना में सुरक्षित

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 27

रह गया है, जो हमारे लिये एक अकाट्य आन्तरिक प्रमाण है। सारभूत बात यही है कि 1. पुष्पमयी शय्या और 2. मन्मथलेख के साथ 3. जो बिसाभरण का निर्देश देवनागरी वाचना के पाठ में है वह कहाँ से आया इसका उत्तर केवल बंगाली आदि बृहत्पाठवली वाचनाओं में ही है।

3-1 आन्तरिक सम्भावना का चतुर्थ स्थानः-देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनावाले (लघु) पाठ में गान्धर्व-विवाह नामक तृतीयाङ्क का आलेखन संयमित एवं व्यंजनापूर्ण होते हुए भी उसमें एक स्थान ऐसा है कि जो प्रथम दृष्टि में ही अनुचित लगता है:-“चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी”। ऐसा नेपथ्य से कहा जाता है। इस को सुनते ही शकुन्तला दुष्यन्त को सावधान करती है कि मेरे शरीरवृत्तान्त को जानने के लिये गौतमी आ रही है। तुम वृक्ष के पीछे छुप कर रहो। फिर देवनागरी पाठ में एक रंगसूचना है:-“ततः प्रविशति पात्रहस्ता तापसी, सख्यौ च”। दोनों सखियाँ “इत इत आर्या गौतमी” बोलती हुई गौतमी का प्रवेश करवाती हैं। बाद में वह पूछती है कि क्या अब तेरे शरीर का संताप कुछ कम हुआ है। लो, इस शान्तिदर्भोंदक से तेरी बाधायें हट जायेंगी इत्यादि। फिर तीनों पात्र (गौतमी, अनसूया और प्रियंवदा) शकुन्तला को ले कर रंगभूमि से निकल जाती हैं। यहाँ प्रश्न होता है कि जिन दोनों सखियों ने नायक-नायिका को रतिक्रीडा के अनुकूल विश्रब्ध स्थान में एकान्त देने के लिये, मृगबाल को अपनी माता के साथ संयोजन करवाने का बहाना बनाकर, अभी अभी कुछ ही क्षण पहले लतावलय से बिदा ली थी, क्या वही दोनों सखियाँ आर्या गौतमी को रास्ता दिखाती हुई वहाँ उपस्थित हो जाती हैं? यह तो सर्वथा अनुचित ही है। यद्यपि यह बात अलग है कि किसी भी विद्वान् ने इस अनौचित्य की ओर अंगुली नहीं उठायी है। लेकिन यह अनौचित्य ध्यातव्य जरूर है।

अब इसी सन्दर्भ को लेकर बंगाली एवं मैथिली वाचना के पाठ का परीक्षण किया जाय तो वहाँ उपर्युक्त अनौचित्य नहीं है। जैसा पहले कहा गया है-बंगाली पाठ में “अनिर्वाणो दिवसः” से लेकर “वत्से, परिणतो दिवसः”-के बीच में नायक-नायिका का जो विस्तृत साहचर्य दिखाया गया है उसमें जिस क्षण में गौतमी का प्रवेश होता है, तब वह अकेली होती है। शान्त्युदक प्रसारित करते हुए वह देखती है कि अस्वस्थ शकुन्तला को देवताओं के सहारे अकेली छोड़ कर प्रियंवदा-अनसूया वहाँ से चली गयी हैं। तब शकुन्तला को कहना पड़ता है कि वे दोनों अभी अभी मालिनी नदी पर गयी हैं (पिशेल, 1922 (द्वितीयावृत्ति)¹⁶। यहाँ दोनों सखियों के साथ में गौतमी उपस्थित नहीं होती है। अर्थात् यहाँ जो पाठ दिखायी देता है वह पूर्वापर सन्दर्भ में बिल्कुल सुसंगत और औचित्यपूर्ण है। अतः बंगाली लिपि में लिखित अभिज्ञानशकुन्तल की पाण्डुलिपियों में जो बृहत्पाठ-परम्परा


  1. (प्रविश्य पात्रहस्ता गौतमी) जाते इदम् शान्त्युदकम्। (दृष्ट्वा) अस्वस्था इह देवतासहायिनी तिष्ठसि। शकुन्तला-इदानीमेव प्रियंवदानसूये मालिनीम् अवतीर्णे। रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति, (पृ. 41)

28 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

संचरित हुई है, वही मौलिकता के नजदीक हो सकती है ऐसी सम्भावना दृढतर हो कर सामने आती है।

4-1 आन्तरिक सम्भावना का पञ्चम स्थानः-अभिज्ञानश(शा)कुन्तल की सभी वाचनाओं के षष्ठाङ्क में विरही दुष्यन्त के मुख से अन्तःपुर में बार बार गोत्रस्खलन होने से वह शरमिन्दा हो जाता है ऐसा निर्देश है।

दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचिताम् अन्तःपुरेभ्यो यदा,
गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम्॥
(शाकु. 6/5)

अब गान्धर्व-विवाह को वर्णित करनेवाले (देवनागरी वाचना के) तृतीयाङ्क में दुष्यन्त-शकुन्तला का जो मिलन है वह तो कुछ दो-पाँच संवादों का ही वर्णित किया है। किन्तु बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में, शकुन्तला ने दुष्यन्त को “आर्यपुत्र” जैसे शब्द से सम्बोधन किया है और नायक दुष्यन्त ने शकुन्तला को “जीवितेश्वरी” शब्द से उल्लिखित किया है। ऐसे परस्पराश्लिष्ट / परस्पराश्रित दाम्पत्य का निरूपण होने के बाद यदि गोत्रस्खलन का उल्लेख किया जाय तो वह ज्यादा प्रीतिकर सिद्ध हो सकता है।

5-1 देवनागरी वाचना के षष्ठाङ्क में वर्णित प्रसङ्गों का बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ में प्रदर्शित प्रसङ्गों के साथ एक तरह का आन्तर सम्बन्ध दिखायी देता है। इसी बात का समर्थन करनेवाला षष्ठाङ्क का एक अन्य सन्दर्भ भी यहाँ उल्लेखनीय हैः देवनागरी (इत्यादि सभी) वाचनाओं में, विरही दुष्यन्त के सामने पत्रारूढ पौरकार्य प्रस्तुत किया जाता है। जिस में एक समुद्रव्यवहारी सार्थवाह धनमित्र अनपत्य मर गया है-ऐसी बात कही जाती है। यहाँ पर दुष्यन्त की उक्ति स्मरणीय हैः “अनपत्यश्च किल तपस्वी। राजगामी तस्यार्थसंचय इति एतद् अमात्येन लिखितम्। कष्टं खल्वनपत्यता। बहुधनत्वाद् बहुपत्नीकेन तत्रभवता भवितव्यम्। विचार्यताम् यदि काचिद् आपन्नसत्त्वा तस्य भार्यासु स्यात्”। महाकवि कालिदास को यहाँ दुष्यन्त को शकुन्तला की आपन्नसत्त्वावस्था का स्मरण दिला कर पश्चात्ताप में डालना तो अभिप्रेत होगा ही, लेकिन उनको अपनी अनपत्यता का भी स्मरण देना अभीष्ट होगा। क्योंकि इस नाटक के आरम्भ में दुष्यन्त को चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति होगी ऐसे आशीर्वचन दिये गये हैं, और वही है इस नाटक का अन्तिम लक्ष्य (द्विवेदी, कालिदास ग्रन्थावली (भाग-2)¹⁷।

इसी लिये षष्ठाङ्क में, धनमित्र के प्रसङ्ग से राजा दुष्यन्त की अनपत्यता का स्मरण ध्वनित करके कवि ने इस नाटक के चरम लक्ष्य को प्रेक्षकों के सामने रखा है। यहाँ एक


  1. इदमेव प्रयोजनमेतस्य नाटकोत्तमस्येत्यभिनवगुप्तो नाट्यशास्त्रविवृतावभिनवभारत्यां 19-22 कारिकायां घनश्यामश्च। अत एव सार्थक्यं षष्ठसप्तमाङ्कयोः। कालिदास-ग्रन्थावली (द्वितीयो भागः), अनु रेवाप्रसाद द्विवेदी, कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन, 2008, पृ. 318

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 29

ध्यानास्पद बिन्दु यह है कि नाटक के गन्तव्य को महाकवि ने प्रत्येक अङ्क में किसी न किसी स्वरूप से निर्दिष्ट भी किया है। जैसे कि प्रथमाङ्क में ‘सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रम् अवाप्नुहि’ शब्दों से वैखानस के आशीर्वचन दिये जाते हैं और सप्तमाङ्क में चक्रवर्ती राजा के लक्षणों से युक्त सर्वदमन भरत की प्राप्ति दिखायी गयी है। तृतीयाङ्क में नायक-नायिका का गान्धर्व-विवाह होता है और चतुर्थाङ्क में कण्वमुनि कहते हैं कि दौष्यन्ति पुत्र को राज्य की धुरा सौंप कर इस आश्रम में फिर से वापस आना। पञ्चमाङ्क के अन्त में, शकुन्तला-प्रत्याख्यान प्रसङ्ग में राजपुरोहित कहता है कि–त्वं साधुभिरुद्दिष्टः प्रथममेव चक्रवर्तिनं पुत्रम् जनयिष्यसि इति। (शाकु. 5 / 29 के बाद), और षष्ठाङ्क में सार्थवाह धनमित्र के पूर्वोक्त प्रसङ्ग के द्वारा दुष्यन्त की अनपत्यता व्यञ्जित की जाती है। किन्तु देवनागरी वाचना और दाक्षिणात्य वाचनावाले शाकुन्तल के द्वितीयाङ्क में कहीं पर भी पुत्रप्राप्ति रूप नाट्यकार्य का किसी भी तरह से निर्देश नहीं है। राजमाता ने जो उपवास किये थे उसका कोई उद्देश्य वहाँ नहीं कहा गया है। यहाँ पर देवनागरी और दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार ‘प्रवृत्तपारण’ या ‘निर्वृत्तपारण’ उपवास का ही निर्देश है।$^{18}$ केवल बंगाली, मैथिली और काश्मीरी वाचना के शकुन्तल में ही “पुत्रपिण्डपालन”, “पुत्रपिण्डपर्युपासन”, एवं “पुत्रपिण्डाराधन” जैसे पाठभेदवाले शब्दों से पुत्र-प्राप्ति रूप लक्ष्य का निर्देश मिलता है। इन पाठभेदों का तुलनात्मक अध्ययन करने से भी यह सिद्ध होगा कि देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचना का पाठ संक्षिप्त करने के साथ साथ परिवर्तित भी किया गया है। बंगाली वाचना के पुत्रपिण्डपालन-वाले पाठ में नाटक के चरम लक्ष्य का निर्देश सुरक्षित है, परन्तु वह निर्देश देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना से गायब हो गया है। इस तरह बंगाली वाचना के पाठ की मौलिकता की सम्भावना उपर्युक्त एक छोटे से पाठभेद से भी दृढतर सिद्ध होती है।

6-1 संस्कृत नाट्य-साहित्य में भास, कालिदास, शूद्रक, कुन्दमालाकारादि अनेक कवियों ने प्रेमोद्भव के एक बीजभूत कारण के रूप में अनुक्रोश नामक गुण को पुरस्कृत किया है। यद्यपि संस्कृत-कोशकारों नें इस शब्द का दया, अनुकम्पा, घृणा, सहानुभूति जैसे अर्थों का परिगणन किया है, और टीकाकार चन्द्रशेखर ने उसका अर्थ “कृपा” किया है। किन्तु उसका सही अर्थ तो “परदुःखदुःखिता” ही होता है।$^{19}$ दूसरों के दुःख को देख कर, उस दुःखीजन को साहाय्य करने को जो तुरन्त उद्यत होता है वह व्यक्ति सानुक्रोश है-ऐसा कहा जाता है। ऐसी सानुक्रोशता को देख कर कुसुम-सुकुमारचित्तवाली नारियों के हृदय में प्रेम की भावना सद्यः प्रकट होती है। अतः महाकवि कालिदास जब अपनी इस नाट्यकृति में अनुक्रोश शब्द का प्रयोग करते हैं तो उसका भी परीक्षण करके देवनागरी शाकुन्तल के पाठ की आलोचना की जा सकती है:


  1. राघवभट्ट की टीका में - देव्याज्ञापयति - आगामिनि चतुर्थदिवसे प्रवृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति। तथा काटयवेम की टीका में-देव्याज्ञापयति-आगामिनि चतुर्थदिवसे निर्वृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति। ऐसे पाठान्तरों को स्वीकार किया गया है।
  2. एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रार्थनावर्तिनो मे, सौहार्दाद् वा विधुर इति वा मय्यनुक्रोशबुद्ध्या। मेघदूतम्-55

30 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

देवनागरी वाचनावाले अभिज्ञानशाकुन्तल के सप्तमाङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला के पाँव पड़ता है (और 7 / 24 श्लोक बोलता है।) यहाँ शकुन्तला कहती है कि-उत्तिष्ठत्वार्यपुत्रः। नूनं मे सुचरितप्रतिबन्धकं पुराकृतं तेषु दिवसेषु परिणाममुखम् आसीद्, येन सानुक्रोशोऽप्यार्यपुत्रो मयि विरसः संवृत्तः। यहाँ शकुन्तला ने कहा है कि दुष्यन्त एक सानुक्रोश व्यक्ति है, लेकिन मेरे सुचरित को रोकनेवाले गत जन्म के कोई कर्म उस समय फल देने के लिये तत्पर हो गये थे, जिसके कारण आर्यपुत्र सानुक्रोश होते हुए भी मेरे प्रति विरस हो गये थे। यहाँ दुष्यन्त के लिए प्रयुक्त सानुक्रोश शब्द, जो समग्र संस्कृतसाहित्य में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शब्द है (Vasantkumar, 2002)$^{20}$, उसका औचित्य कैसे सिद्ध किया जा सकता है, यह परीक्षणीय है।

शकुन्तला की उपर्युक्त उक्ति को सुन कर यह प्रश्न किया जा सकता है कि “दुष्यन्त एक सानुक्रोश व्यक्ति है” ऐसा अनुभव शकुन्तला को कब हुआ होगा? दुष्यन्त और शकुन्तला का साहचर्य तो केवल प्रथम एवं तृतीय, इन दो अङ्कों में ही वर्णित हुआ है। 1. प्रथमाङ्क के भ्रमरबाधा प्रसङ्ग में दुष्यन्त शकुन्तला को भ्रमर के त्रास से छुड़ाने के लिये जब सहसा प्रस्तुत होता है एवं वृक्षसेचन के लिये दो घट पानी के ऋण में से मुक्त करवाने के लिये जब वह अपनी राजमुद्रा निकाल कर देता है। 2. देवनागरी वाचना के तृतीयाङ्क में नायक-नायिका का साहचर्य / सहवास परिसीमित क्षणों में पूरा होता है। अतः इस अल्पकालिक मिलन में शकुन्तला को किसी बाधा से छुड़ाने का मौका दुष्यन्त को मिला हो ऐसा कोई प्रसंग वर्णित नहीं है। इस लिये सप्तमाङ्क में जब दुष्यन्त के लिये सानुक्रोश शब्द का प्रयोग होता है तब वह निराधार लगता है। किन्तु बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ को यदि लेते हैं तो वहाँ एक निश्चित प्रसङ्ग है जिसमें दुष्यन्त ने शकुन्तला को प्रत्यक्ष रूप से बाधामुक्त किया है। शकुन्तला ने अपने कानों में जो उत्पलपुष्प आरोपित किया था, उसकी रेणु से नेत्र जब कलुषित होता है तब दुष्यन्त ने अपने वदनमारुत से उसका प्रमार्जन किया था। और शकुन्तला ने भी दुष्यन्त को अनुकम्पा प्रदर्शित करनेवाला कहा है।$^{21}$ इस तरह बंगाली वाचना के पाठ को यदि हम ध्यान में ले कर सप्तमाङ्क के सानुक्रोश शब्द के प्रयोग का औचित्य सोचते हैं तो वह सुसंगत और साधार लगता है। परन्तु देवनागरी वाचना के संक्षिप्त पाठ के सन्दर्भ में इस महत्त्वपूर्ण शब्द के प्रयोग का औचित्य जमता नहीं है।


  1. करुणा जो होती है वह ईश्वर की होती है और जो सहानुभूति होती है वह साधुपुरुष की होती है। इस करुणा और सहानुभूति के बीच में अनुक्रोश आता है। तथा अनुक्रोशत्व के कारण प्रेमोद्भव होता है-ऐसा संस्कृत कवियों ने बार बार दिखाया है।
  2. शकुन्तला - न तावत् एवम् प्रेक्षे। पवनोत्कम्पिना कर्णोत्पलररेणुना कलुषीकृता मे दृष्टिः। राजा- यदि मन्यसे अहमेनां वदनमारुतेन विशदां करिष्ये। शकुन्तला - ततो अनुकम्पिता भवेयम्। (रिचार्ड पिशेल आवृत्ति) पृ. 40
अभिज्ञानशकुन्तलम्प्रस्तावना31

उपसंहारः- पाठालोचना में इदं प्रथमतया पाण्डुलिपियों का साक्ष्य ही महत्त्व रखता है। उपलब्ध पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठों का तुलनात्मक अध्ययन करके, वंशवृक्षपद्धति से विभिन्न वाचनाओं में से कौन सी वाचना पूर्वज है या वंशज है, अर्थात् प्राचीन या प्राचीनतर है, उसका निर्णय किया जाता है। तदनन्तर, कौन से पाठ को बहुसंख्य पाण्डुलिपिओं का समर्थन मिलता है, अथवा प्राप्त की गयी अनेकानेक पाण्डुलिपिओं में से जो प्राचीनतम पाण्डुलिपि होगी उनमें कौन सा पाठ सुरक्षित रहा है, उसकी विचारणा आधुनिक पाठसम्पादक करते हैं। ऐसे दृष्टिकोण से जो समीक्षित पाठसम्पादन किया जाता है उसमें वस्तुनिष्ठता जरूर होती है। क्योंकि यहाँ पर जैसा भी निर्णय किया जाता है वह उपलब्ध पाण्डुलिपिओं (की संख्या या प्राचीनता) पर निर्भर रहता है। परन्तु जब अनेकविध पाठान्तरों में से कौन सा पाठान्तर अधिक काव्यत्व या नाट्यक्षमता से परिपूर्ण हो सकता है, उसको देखकर, अर्थात् "गुणोपसंहार न्याय" (Eclectic Principles) से समीक्षित पाठसम्पादन तैयार किया जाता है, तो उसमें आत्मलक्षिता प्रविष्ट होती ही है। परिणाम स्वरूप ऐसा समीक्षित पाठसम्पादन सर्वसम्मत नहीं होता है। तथा जिस वंशवृक्षपद्धति से निर्धारित किये समीक्षित पाठसम्पादन को वस्तुनिष्ठ कहा गया है उसमें पाठालोचना के तीन सोपान ही कार्यान्वित किये गये होते हैं। अतः वहाँ चतुर्थ सोपान पर उच्चतर पाठसमीक्षा का कार्य अवशिष्ट रहता है। यहाँ वंशवृक्षपद्धति से जिस वाचना को प्राचीनतर या अधिक श्रद्धेय मान कर, उसके आधार पर पाठसम्पादन किया जाता है उसका पुनःपरीक्षण किया जाता है। ऐसे पुनःपरीक्षण में बाह्य साक्ष्य एवं कृतिनिष्ठ आन्तरिक सम्भावना को सर्वोच्च मानदण्ड के रूप में स्वीकारा जाता है। प्रस्तुत आलेख में, बंगाली वाचना के बृहत् पाठ की मौलिकता को कृति के ही अन्तःसाक्ष्य से कैसे समर्थन मिल रहा है उसकी चर्चा की गयी है। किन्तु यहाँ ऐसा कहने का आशय यह भी नहीं है कि बंगाली वाचना के पाठ को ही साद्यन्त स्वरूप में मौलिक मान लिया जाय। क्योंकि डॉ० रिचार्ड पिशेल के द्वारा निर्धारित किये गये बंगाली वाचना के समीक्षित पाठ की भी व्यापक रूप से उच्चतर समीक्षा करना अनिवार्य है। (जिसको अनुगामी पृष्ठों में प्रस्तुत किया गया है।) बंगाली वाचना के पाठ में मौलिकता झलक रही है ऐसा सिद्ध होने का सही मतलब तो यह है कि अभिज्ञानशकुन्तल का बृहत्पाठ संचरित करनेवाली जो तीन वाचनायें हैं, 1. बंगाली, 2. मैथिली एवं 3. काश्मीरी, इन तीनों में मौलिकता छुपी हुई है। कालिदास के अभिज्ञानशकुन्तल का मूल पाठ उजागर करने के लिए उपर्युक्त त्रिविध वाचनाओं में संचरित हुए बृहत्पाठ का आलोडन करके ही अभिज्ञानशकुन्तल के कविप्रणीत मूल पाठ को निश्चित करना चाहिए।

Bibliography

Kanjilal, D.K. (1980). A Reconstruction of the Abhijnana-śakuntalam,
Calcutta: Sanskrit College.
Vasantkumar, B. (2002)-Anukroshatva–a rare element of humanity,

32 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

as depicted in Sanskrit literature. Sambodhi, L.D. Institute of Indology, Ahmedabad, 133-139.
काटयवेम. (1982). अभिज्ञानशाकुन्तलम् हैदराबाद: आन्ध्रप्रदेश संस्कृत अकादेमी.
चतुर्वेदी सीताराम (1963), कालिदास-ग्रन्थावली (हिन्दी अनुवाद के साथ), अलीगढ़,
एस. के. बेलवलकर, निसर्ग कन्या शकुन्तला-शोध आलेख (च. परिशिष्ट में).
द्विवेदी, रेवाप्रसाद (2004), कालिदास-अपनी बात। (भारतीय दृष्टि), वाराणसी: कालिदास संस्थान,.
द्विवेदी, रेवाप्रसाद (2009). कालिदास ग्रन्थावली (भाग-2), उज्जैन: कालिदास संस्कृति संस्थान.
पिशेल, रिचार्ड (1922 (द्वितीयावृत्ति), अभिज्ञानशकुन्तलम्। (बंगाली वाचना) केम्ब्रीज: हार्वर्ड युनिवसिर्टी प्रेस,.
राघवभट्ट. (2006), अभिज्ञानशाकुन्तल, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान,. नव देहली

अभिज्ञानश(शा)कुन्तलम् की बंगाली एवं देवनागरी वाचनाओं में प्रक्षेप एवं संक्षेप

0-1, भूमिका—यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक की सर्वोत्तमता को लेकर कोई विवाद ही नहीं उठा है! पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ इस नाटक का पाठ इयत्ता में द्विविध है। अतः उनमें से कौन सा शाकुन्तल मंचन के योग्य है, ऐसा प्रश्न होना चाहिए था, तदनन्तर इनमें से किसकी सर्वोत्तमता मानी जाय ऐसा विवाद भी उठना अपेक्षित था। किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा कुछ हुआ नहीं। यहाँ तो विगत 100-150 वर्षों में अभिज्ञानशाकुन्तल के प्रचलित पाठों की मौलिकता को लेकर संशय या विप्रतिपत्ति दिखानेवाले विद्वान् दो-चार की संख्या में परिसीमित हैं! जबकि हकीकत यह है कि इस नाटक के शीर्षक से लेकर, अन्तिम भरतवाक्य पर्यन्त जितने भी गद्य-पद्य संवाद हैं वे सभी पाठभेद की समस्या से ग्रस्त हैं। अतः स्वाभाविक रूप से ही शाकुन्तल के मौलिक पाठ की गवेषणा करने के लिये गणमान्य विद्वानों के द्वारा बार बार चर्चा-विचारणा होनी आवश्यक थी और आज भी वह अनिवार्य है। अभिज्ञानशाकुन्तल की पाठालोचना करनेवाले विरल विद्वानों में दो मत हैं:-(1) प्रथम, शाकुन्तल के जिस पाठ पर राघवभट्ट ने “अर्थद्योतनिका” टीका लिखी है, वह देवनागरी वाचना का पाठ ही मौलिक हो सकता है। (2) द्वितीय, बंगाली वाचना का पाठ, जिस पर चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने सन्दर्भदीपिका टीका लिखी है, वह प्राचीनतर भी है और अधिक श्रद्धेय एवं कदाचित् मौलिक भी है। अतः कम से कम, उपर्युक्त टीकाकारों के द्वारा स्वीकृत इन दोनों वाचनाओं के पाठ की परीक्षा तो करनी चाहिए। क्योंकि किसी भी कृति की पाठालोचना किये बिना यदि उसकी साहित्यिक आलोचना की जाती है तो वह आज नहीं तो कल गलत सिद्ध होने की पूरी सम्भावना है।

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 33

0-2 पाठालोचना की दिशा में विद्वानों के द्वारा अद्यावधि जो शोधकार्य हुआ है उससे इतनी जानकारी मिलती है कि पाण्डुलिपियों में प्रवहमान अभिज्ञानशाकुन्तल का पाठ इयत्ता में द्विविध है। एक को बृहत्पाठ कहते हैं, तथा दूसरे को लघुपाठ कहते हैं। प्रथम याने बृहत्पाठ परम्परा के “अभिज्ञानशकुन्तल” में तीन वाचनायें दृष्टिगोचर हो रही हैं:-(1) काश्मीरी वाचना, (2) मैथिली वाचना, एवं (3) बंगाली वाचना। दूसरी, लघुपाठ परम्परा के “अभिज्ञानशकुन्तल” की दो वाचनायें प्रसिद्ध हैं:-(4) देवनागरी वाचना एवं (5) दाक्षिणात्य वाचना।। विद्वानों के परिश्रम से अभी तक इतना सप्रमाण सिद्ध हुआ है कि देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं की अपेक्षा बंगाली वाचना में संचरित हुआ जो पाठ है वह प्राचीनतर है, एवं बृहत्तर भी है।

बंगाली वाचना के अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ का समीक्षित पाठ-सम्पादन करनेवाले विद्वान् दो हैं:-(1) डॉ० रिचार्ड पिशेल, (Pischel, 1876; (Seond edition-1922), तथा (2) डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल, (काञ्जीलाल, 1980)। इन दोनों सुज्ञ विद्वानों ने बंगाली वाचना पर लिखी गयी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की टीका का विनियोग अवश्य किया है, तथा रिचार्ड पिशेल ने तो इस नाट्यकृति के प्राकृत-संवादों के पाठ की शुद्धि करने के लिये चन्द्रशेखर की टीका का ही अधिक से अधिक सहारा लिया है। किन्तु दोनों में से किसी विद्वान् ने इस नाटक के अधिकृत-समीक्षित-पाठ को प्रकाशित करने के साथ साथ चन्द्रशेखर की “सन्दर्भदीपिका” टीका का अधिकृत पाठ प्रकाशित नहीं किया है। टीकाकार चन्द्रशेखर की टीका से समर्थित होनेवाले पाठ को अधिक श्रद्धेय मान कर, उसके आधार पर अभिज्ञानशकुन्तल का समीक्षित पाठ निर्धारित करने के पश्चात् भी यह प्रश्न तो रहता ही है कि इस टीकाकार के द्वारा समादृत पाठ में प्रक्षेप्यादि के दूषण हैं या नहीं हैं। क्योंकि अनेकानेक बंगाली पाण्डुलिपियों का आलोडन करके अभिज्ञानशकुन्तल का जो पाठ “अधिकृत” या “समीक्षित” पाठ के रूप में रिचार्ड पिशेल एवं श्रीदिलीपकुमार काञ्जीलाल ने प्रस्तुत किया है उसकी आन्तरिक सम्भावना के मानदण्ड से यदि परीक्षा की जाय तो तुरन्त मालूम होगा कि इन दोनों महाशयों द्वारा तैयार किया हुआ बंगाली वाचना का समीक्षित पाठ भी अनेक स्थानों पर प्रक्षेप एवं संक्षेप से भरा पड़ा है। मतलब कि इन दोनों विद्वानों ने जो समीक्षित पाठ निर्धारित किया है वह केवल निम्न स्तरीय पाठालोचना का परिणाम है और उस पाठ की उच्च स्तरीय पाठालोचना करने का कार्य अभी तक शायद पूर्ण रूप से नहीं हुआ है। यदि बंगाली वाचना में प्रवहमान पाठ प्राचीनतर एवं मौलिकता²² के नजदीक है, ऐसा सिद्ध हो रहा है तो उस पाठ की उच्च स्तरीय पाठालोचना कर मौलिकता की ओर अधिक निकटता हासिल करने का प्रयास करना ही चाहिए।


  1. इस सन्दर्भ में द्रष्टव्य है मेरा शोध-आलेख:-अभिज्ञानशाकुन्तल, बंगाली वाचना की मौलिकता के समर्थक नवीन प्रमाण, संस्कृत-विमर्श (नव शृङ्खला, वॉ. 4) राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नयी दिल्ली, 2010, पृ. 147-160

34 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

इसी तरह से श्री पी. एन. पाटणकर जी ( 1902 ई. स. में) ने भी देवनागरी पाण्डुलिपियों की निम्न स्तरीय पाठालोचना की है। किन्तु उनके निर्धारित किये देवनागरी के “शुद्धतर” पाठ्यांश (Patankar, 1902) में भी विचारसातत्य खण्डित होता है या नहीं, अथवा अमुक पाठ्यांश कवि की निरूपणशैली से विपरीत है या नहीं, या देवनागरी पाठ के नाम पर बंगाली वाचना का कुछ पाठ्यांश स्वीकृत कर लिया गया है या नहीं, ऐसा कोई विचार ही नहीं किया गया है।²³ अतः वे भी देवनागरी वाचना के पाठ में जो संक्षेपीकरण का खेल खेला गया है उसे देख नहीं पाये हैं। देवनागरी पाठपरम्परा का इतिहास बहुत लम्बा होने से शाकुन्तल की देवनागरी पाण्डुलिपियों में भी बहुविधता है। डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने बताया है कि देवनागरी वाचना के भी त्रिविध पाठ प्रसारित हुए हैं:-(1) प्राचीन देवनागरी, (2) मिश्रदेवनागरी एवं (3) संक्षिप्त की गयी देवनागरी पाण्डुलिपियाँ। (संक्षिप्त की गयी देवनागरी का पाठ यानि राघवभट्ट ने जिस पाठ पर टीका लिखी है वह।) सारभूत बात यही है कि सौ डेढ़ सौ साल के इतिहास में अलग अलग प्रान्तों के अनेकविध शाकुन्तल एवं उनकी विविध टीकाओं का प्रकाशन होता रहा है। लेकिन इस नाट्यकृति के पाठ की पाठालोचना करने का कार्य दो-तीन विद्वानों²⁴ से अधिक किसी ने भी नहीं किया है, और वह भी आंशिक रूप में ही हुआ है। प्रस्तुत आलेख में, बंगाली वाचना की तुलना में देवनागरी वाचना में जहाँ संक्षेपीकरण हुआ है, एवं मौलिकता के नजदीक होते हुए भी बंगाली वाचना के पाठ में जहाँ प्रक्षिप्तांश दिखते हैं उसकी उच्चतर समीक्षा की जाती है।।

0-3 पाठालोचना का चतुर्थ सोपान है: उच्चतर समीक्षा। उसमें पाण्डुलिपियों के साक्ष्य से ऊपर उठना है। तथा टीकाकारों के द्वारा जो पाठ मान्य किया गया है ऐसे (सहायक सामग्री रूप) टीका-ग्रन्थों के प्रमाणों को भी छोड़ देना है। पाठालोचना के इस अन्तिम सोपान पर, समीक्षित पाठ के रूप में निर्धारित किये गये पाठ में प्रत्येक वाक्य की परीक्षा करनी होती है। जैसे कि पूर्वापर सन्दर्भ में विचार-सातत्य बना रहता है कि नहीं? एवमेव, प्रत्येक विचार की सुसंगतता एवं औचित्य है या नहीं? नाट्यकृति के जिस श्लोक में या गद्य-वाक्य में विचार-सातत्य खण्डित होता है, अथवा पुनरुक्ति होती है-तो उस पाठ की मौलिकता संशयग्रस्त बनती है। जिस संवाद में प्रसंगानुसारी नाट्यगत औचित्य प्रतीत नहीं होता है तो वह पाठ्यांश प्रक्षेप या संक्षेप का परिणाम हो सकता है क्योंकि अतीत में मंचन के दौरान सूत्रधारों ने अपनी अपनी रुचि-अरुचि या प्रतिभा के अनुसार नाट्यकार के द्वारा


  1. श्री पाटणकर जी ने कृति का शीर्षक “अभिज्ञानशकुन्तलम्” मान्य किया है। वस्तुतः ऐसा शीर्षक बंगाली, मैथिली और काश्मीरी पाण्डुलिपियों में प्रवर्तमान है। और देवनागरी तथा दाक्षिणात्य पाण्डुलिपियों में “अभिज्ञानशाकुन्तलम्” है।
  2. प्रोफे. बलवन्तराय ठाकोर (गुजरात), डॉ० एस.के. बेलवरकर (पुणे) और शारदरंजन राय (कोलकाता)।

अभिज्ञानशकुन्तलम्        प्रस्तावना        35

लिखे गये पाठ्यांश में प्रायः परिवर्तन एवं परिवर्धन किया ही है। नाटक एक अभिनेय-काव्य होने के कारण स्थल-काल की एवं रंगमंच की मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए सूत्रधारों के लिए नाट्यकार के मूल पाठ में परिवर्तन करना आवश्यक भी हो जाता है। अतः पाण्डुलिपियों में संचरित हुए नाट्यकृतियों के पाठ को हम सर्वथा मौलिक नहीं मान सकते हैं। ऐसे पाठों की आन्तरिक सम्भावना की दृष्टि से परीक्षा करने की नितान्त आवश्यकता रहती है। यह बात कालिदास जैसे नाट्यकार के लिए, तथा अभिज्ञान-शाकुन्तल जैसे सर्वश्रेष्ठ नाटक के लिए तो बिलकुल सही है क्योंकि उसकी लोकप्रियता आजन्म सिद्ध होने के कारण इसका मंचन पौनःपुन्येन होता ही रहा है। नाट्यकृति के परम्परागत पाठ में आन्तरिक सम्भावना बहुविध दृष्टि से देखी जा सकती है: जैसे कि (1) कृति के पाठ में विचार विषयक पूर्वापर संगति, (2) नाटकीयता की दृष्टि से संवादों में अपेक्षित आनुक्रमिकता, (3) कवि की निरूपण शैली, (4) कृति के मूलस्रोत रूप जो सामग्री हो उसका विश्लेषण एवं मूलस्रोत का परिमार्जन का हेतु, (5) कृति के लक्ष्य की सिद्धि, अर्थात् उपक्रमोपसंहार की संगति इत्यादि।

0-4 यहाँ बंगाली एवं देवनागरी वाचनाओं के अमुक निश्चित पाठभेदों की ही चर्चा की जा रही है जिसमें विशेष रूप से श्लोकात्मक संवादों की समीक्षा करना अभीष्ट है। यहाँ शब्दपर्यन्त ही सीमित रहनेवाले पाठभेदों की, या रंगसूचना देनेवाले वाक्यों में दिख रहे पाठभेद, या पात्रसृष्टि के नाम-सम्बद्ध पाठभेद, या प्रयोगवैविध्य को जन्म देनेवाले पाठभेदों की चर्चा नहीं की जायेगी। एवमेव, अलग अलग वाचनाओं में दृश्यमान प्राकृत-उक्तियों की प्राकृतभाषा की अनेकरूपता भी चर्चित नहीं की जायेगी।<sup>25</sup> यहाँ तो प्राधान्येन कुछ गद्य संवाद एवं श्लोकों में दिख रहे पाठभेद (जो प्रक्षेप एवं संक्षेप का परिणाम हो सकता है) की चर्चा की जा रही है।

1-1-0 बंगाली वाचना का पाठ प्राचीनतर है, इसी लिए वही पूर्ण रूप से मौलिक भी है ऐसा मान लेना मुश्किल है। तथा देवनागरी वाचना के पक्षधर कतिपय विद्वानों ने जैसे उस (बंगाली) वाचना का पाठ बृहत्पाठ होने मात्र से उसे पूर्ण रूप से प्रक्षेपों से भरा मान लिया है और उसकी नितान्त उपेक्षा की है, वह भी न्यायिक नहीं है। एवमेव, देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं के पाठ में ही संयमपूर्ण एवं व्यञ्जनासभर शृङ्गार निरूपित हुआ है, अतः वही मौलिक हो सकता है-ऐसा दावा करना भी सही नहीं है। निष्पक्ष बात तो वही हो सकती है कि दोनों तरह की वाचनाओं की तुलनात्मक दृष्टि से समीक्षा की जाय, तथा उभयत्र प्रक्षेप-संक्षेपादि के उदाहरण लेकर मूल पाठ के निर्धारण का विवेक उजागर किया जाय।


  1. इस सन्दर्भ में मेरा शोध-आलेख द्रष्टव्य है:-"शाकुन्तल की प्राकृतविवृत्ति एवं प्राकृतछायाएँ", संबोधि (वॉ 35) एल.डी. इन्स्टीट्यूट ऑफ इन्डोलॉजी, अहमदाबाद, 2013

36 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

1-1-1 बंगाली पाठ में प्रथम अङ्क के आरम्भ में ही तापस की उक्ति के रूप में जिसका प्रक्षेप हुआ है वह श्लोक निम्नोक्त है। मृगयाविहारी राजा दुष्यन्त को वह कहता है कि, भो भो राजन्, आश्रममृगः खल्वयम्।

न खलु न खलु बाणः संनिपात्योऽयमस्मिन्
मृदुनि मृगशरीरे पुष्पराशाविवाग्निः।
क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं
क्व च निशितनिपाताः सा​रपुङ्खाः शरास्ते।।

<p align="right">1-10</p>

यह श्लोक, निम्न स्तरीय पाठालोचना के अनुसार बंगाली और मैथिली पाठपरम्पराओं में संचरित होकर हम तक आया है और देवनागरी तथा दाक्षिणात्य में भी यह श्लोक सुरक्षित रहा है अतः उसे मौलिक मानने में कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु काश्मीरी वाचना में यह श्लोक दिखता नहीं है तथा देवनागरी वाचना के प्रमुख टीकाकार राघव भट्ट ने इस श्लोक पर टीका नहीं लिखी है, इसलिए यह सोचना अनिवार्य बनता है कि यह श्लोक मौलिक होगा या प्रक्षिप्त? बहुसङ्ख्य पाण्डुलिपियों में होना या अन्यान्य टीकाकारों के द्वारा व्याख्यात होना यही एक अन्तिम निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकता है। उच्च स्तरीय आलोचना में पाण्डुलिपियाँ एवं टीकाओं के आधार को छोड़ कर कुछ कृतिनिष्ठ साधक-बाधक प्रमाणों पर विचार करना चाहिए। यहाँ नेपथ्योक्ति से एक बार कहा गया है कि भो भो राजन्, आश्रममृगोऽयं न हन्तव्यो न हन्तव्यः। उसके बाद रंगमंच पर सारथि राजा को कहता है कि आपके बाण और कृष्णमृग के बीच में तपस्वी लोग आकर खड़े हैं। तब राजा ने रथ को रोकने की सूचना दी और तपस्वी रंगमंच पर आकर वही नेपथ्योक्ति दोबारा बोलते हैं। यह पुनरुक्ति तो आवश्यक थी कि प्रेक्षकों को मालूम हो जाय कि नेपथ्य में से बोलनेवाले कौन थे। लेकिन वह तापस “न खलु न खलु०” वाला श्लोक बोलकर तीसरी बार भी वही आज्ञा दे कि इस मृग को न मारा जाय, तो वह नाटक में संमान्य नहीं है। इस तापस को मृग के मृदु शरीर की गुजारिश करने की, दया की याचना करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि" यह आश्रम का मृग है" इतना ही पर्याप्त है, उसमें ही आज्ञा सुनिश्चित थी। फिर भी जो कहना था वह तो “तदाशु कृतसंधानम्०” इस अनुगामी श्लोक से कहनेवाला ही है कि राजा के शस्त्र आर्त्त-परित्राण के लिए हैं, अनागस को मारने के लिए नहीं हैं। इस अधिक महत्त्वपूर्ण बात को कहने में कोई पुनरुक्ति नहीं है, किन्तु “न खलु न खलु०” वाले श्लोक में तो नितान्त पुनरुक्ति है, जो नाटक में असह्य होती है। अतः वह श्लोक प्रक्षिप्त ही होगा, और अब काश्मीरी में इस श्लोक का न होना एवं राघवभट्ट के द्वारा व्याख्यात नहीं होना सूचक सिद्ध होता है। उसमें काव्यत्व एवं गेयता होने से उसका संरक्षण होता रहा है, तथा पुष्पराशौ के स्थान में तूलराशौ, और सारपुङ्खा के स्थान में वज्रसाराः जैसे पाठभेद भी प्रविष्ट होते रहे हैं।

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 37

1-1-2 बंगाली वाचनानुसारी प्रथमाङ्क के पाठ्यांश में दूसरा प्रक्षेप ऐसा है: दुष्यन्त को चक्रवर्ती पुत्र होने का आशीर्वाद दिया जाता है, उसके बाद तापसों की उक्ति है:- “राजन् समिदाहरणाय प्रस्थितावावाम्। एष चास्मद्गुरोः कण्वस्य साधिदैवत इव शकुन्तलानुमालिनीतीरम् आश्रमो दृश्यते। न चेदन्यकार्यातिपातः प्रविश्यात्र गृह्यताम् अतिथिसत्कारः।” यहाँ तापसों के द्वारा, मालिनी नदी के तट पर हमारे गुरु कण्व का आश्रम है-इतनी सूचना देना पर्याप्त था। फिर भी कहा जाता है कि “साधिदैवत इव शकुन्तलया” अर्थात् जिस आश्रम में शकुन्तला मानों अधिदेवता के रूप में विराजमान है, उसमें आप अतिथिसत्कार ग्रहण करने हेतु प्रवेश कीजिये। इस वाक्य में गर्भित रूप से कहा ही गया है कि इस आश्रम में आज शकुन्तला ही मुख्य अधिष्ठात्री के रूप में नियुक्त है।$^{26}$ मतलब कि आश्रम में कण्व मुनि की अनुपस्थिति है, यह बात बिना पूछे तापसों ने सामने से बता दी है। अतः इतना सुनने के बाद राजा जब पूछता है कि अथ संनिहितस्तत्र कुलपतिः। तब प्रश्न होता है कि क्या राजा ने “साधिदैवत इव शकुन्तलया” इन शब्दों को सुना ही नहीं था। राजा ने यदि इन शब्दों को सुना होता तो वह कदापि “अथ संनिहितस्तत्र कुलपतिः” ऐसा नहीं पूछता। इससे सिद्ध होता है कि उपर्युक्त संवाद में “साधिदैवत इव शकुन्तलया” इतने शब्द प्रक्षिप्त हो सकते हैं। देवनागरी, दाक्षिणात्य एवं काश्मीरी शारदा पाण्डुलिपियों में इन शब्दों का समावेश नहीं है। ये केवल बंगाली और मैथिली वाचना में ही प्रविष्ट हुए हैं।

1-1-3 बंगाली वाचना के पाठ में वाक्यात्मक प्रक्षेप का द्वितीय स्थानः तीनों सखियाँ आश्रम के वृक्षों को जब जलसिञ्चन कर रही हैं तब एक “माधवीलता” का निर्देश आता है। यहाँ विचारणीय बिन्दु यह है कि कण्वाश्रम में स्थित जिन वृक्षों एवं लताओं का निर्देश है, उसमें माधवीलता का समावेश होता है या नहीं तथा शकुन्तला का नवमालिका के प्रति विशेष पक्षपात था, क्या उसी तरह से इस माधवीलता के साथ भी था? बंगाली वाचना से यह पाठ्यांश द्रष्टव्य हैः

अनसूया—हला सउन्तले, इअं तादकण्णेण तुमं विअ सहत्थसंवड्ढिदा माहवीलदा। इमं विसुमरिदा सि। (सखि शकुन्तले, इयम् तातकण्वेन त्वमिव स्वहस्तसंवर्धिता माधवीलता। इमां विस्मृतासि।)

शकुन्तला—तदो अत्ताणं पि विसुमरिस्सं। (लतामुपेत्यावलोक्य च सहर्षम्) अच्छरीअं अच्छरीअं। पिअंवदे, पिअं दे णिवेदेमि। (ततः आत्मानमपि विस्मरिष्यामि। आश्चर्यम्..... आश्चर्यम्.... प्रियंवदे, प्रियं ते निवेदयामि।)


  1. टीकाकार शेकर ने लिखा है कि-किंभूतम्, शकुन्तलया कण्वकुमारिकया साधिदैवतमिव सर्वत्राश्रमे अधिष्ठात्री देवतास्ति अस्मिन्। शकुन्तलैव देवतेत्यर्थः।। अभिज्ञानशाकुन्तलम् (शंकरनरहरि-कृतव्याख्या-समलंकृतम्), सं. रमानाथ शर्मा झा, मिथिला विद्यापीठ, दरभंगा, 1957, (पृ. 172)