अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 37
1-1-2 बंगाली वाचनानुसारी प्रथमाङ्क के पाठ्यांश में दूसरा प्रक्षेप ऐसा है: दुष्यन्त को चक्रवर्ती पुत्र होने का आशीर्वाद दिया जाता है, उसके बाद तापसों की उक्ति है:- “राजन् समिदाहरणाय प्रस्थितावावाम्। एष चास्मद्गुरोः कण्वस्य साधिदैवत इव शकुन्तलानुमालिनीतीरम् आश्रमो दृश्यते। न चेदन्यकार्यातिपातः प्रविश्यात्र गृह्यताम् अतिथिसत्कारः।” यहाँ तापसों के द्वारा, मालिनी नदी के तट पर हमारे गुरु कण्व का आश्रम है-इतनी सूचना देना पर्याप्त था। फिर भी कहा जाता है कि “साधिदैवत इव शकुन्तलया” अर्थात् जिस आश्रम में शकुन्तला मानों अधिदेवता के रूप में विराजमान है, उसमें आप अतिथिसत्कार ग्रहण करने हेतु प्रवेश कीजिये। इस वाक्य में गर्भित रूप से कहा ही गया है कि इस आश्रम में आज शकुन्तला ही मुख्य अधिष्ठात्री के रूप में नियुक्त है।$^{26}$ मतलब कि आश्रम में कण्व मुनि की अनुपस्थिति है, यह बात बिना पूछे तापसों ने सामने से बता दी है। अतः इतना सुनने के बाद राजा जब पूछता है कि अथ संनिहितस्तत्र कुलपतिः। तब प्रश्न होता है कि क्या राजा ने “साधिदैवत इव शकुन्तलया” इन शब्दों को सुना ही नहीं था। राजा ने यदि इन शब्दों को सुना होता तो वह कदापि “अथ संनिहितस्तत्र कुलपतिः” ऐसा नहीं पूछता। इससे सिद्ध होता है कि उपर्युक्त संवाद में “साधिदैवत इव शकुन्तलया” इतने शब्द प्रक्षिप्त हो सकते हैं। देवनागरी, दाक्षिणात्य एवं काश्मीरी शारदा पाण्डुलिपियों में इन शब्दों का समावेश नहीं है। ये केवल बंगाली और मैथिली वाचना में ही प्रविष्ट हुए हैं।
1-1-3 बंगाली वाचना के पाठ में वाक्यात्मक प्रक्षेप का द्वितीय स्थानः तीनों सखियाँ आश्रम के वृक्षों को जब जलसिञ्चन कर रही हैं तब एक “माधवीलता” का निर्देश आता है। यहाँ विचारणीय बिन्दु यह है कि कण्वाश्रम में स्थित जिन वृक्षों एवं लताओं का निर्देश है, उसमें माधवीलता का समावेश होता है या नहीं तथा शकुन्तला का नवमालिका के प्रति विशेष पक्षपात था, क्या उसी तरह से इस माधवीलता के साथ भी था? बंगाली वाचना से यह पाठ्यांश द्रष्टव्य हैः
अनसूया—हला सउन्तले, इअं तादकण्णेण तुमं विअ सहत्थसंवड्ढिदा माहवीलदा। इमं विसुमरिदा सि। (सखि शकुन्तले, इयम् तातकण्वेन त्वमिव स्वहस्तसंवर्धिता माधवीलता। इमां विस्मृतासि।)
शकुन्तला—तदो अत्ताणं पि विसुमरिस्सं। (लतामुपेत्यावलोक्य च सहर्षम्) अच्छरीअं अच्छरीअं। पिअंवदे, पिअं दे णिवेदेमि। (ततः आत्मानमपि विस्मरिष्यामि। आश्चर्यम्..... आश्चर्यम्.... प्रियंवदे, प्रियं ते निवेदयामि।)
- टीकाकार शेकर ने लिखा है कि-किंभूतम्, शकुन्तलया कण्वकुमारिकया साधिदैवतमिव सर्वत्राश्रमे अधिष्ठात्री देवतास्ति अस्मिन्। शकुन्तलैव देवतेत्यर्थः।। अभिज्ञानशाकुन्तलम् (शंकरनरहरि-कृतव्याख्या-समलंकृतम्), सं. रमानाथ शर्मा झा, मिथिला विद्यापीठ, दरभंगा, 1957, (पृ. 172)