भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 262 में से

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36 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

1-1-1 बंगाली पाठ में प्रथम अङ्क के आरम्भ में ही तापस की उक्ति के रूप में जिसका प्रक्षेप हुआ है वह श्लोक निम्नोक्त है। मृगयाविहारी राजा दुष्यन्त को वह कहता है कि, भो भो राजन्, आश्रममृगः खल्वयम्।

न खलु न खलु बाणः संनिपात्योऽयमस्मिन्
मृदुनि मृगशरीरे पुष्पराशाविवाग्निः।
क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं
क्व च निशितनिपाताः सा​रपुङ्खाः शरास्ते।।

<p align="right">1-10</p>

यह श्लोक, निम्न स्तरीय पाठालोचना के अनुसार बंगाली और मैथिली पाठपरम्पराओं में संचरित होकर हम तक आया है और देवनागरी तथा दाक्षिणात्य में भी यह श्लोक सुरक्षित रहा है अतः उसे मौलिक मानने में कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु काश्मीरी वाचना में यह श्लोक दिखता नहीं है तथा देवनागरी वाचना के प्रमुख टीकाकार राघव भट्ट ने इस श्लोक पर टीका नहीं लिखी है, इसलिए यह सोचना अनिवार्य बनता है कि यह श्लोक मौलिक होगा या प्रक्षिप्त? बहुसङ्ख्य पाण्डुलिपियों में होना या अन्यान्य टीकाकारों के द्वारा व्याख्यात होना यही एक अन्तिम निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकता है। उच्च स्तरीय आलोचना में पाण्डुलिपियाँ एवं टीकाओं के आधार को छोड़ कर कुछ कृतिनिष्ठ साधक-बाधक प्रमाणों पर विचार करना चाहिए। यहाँ नेपथ्योक्ति से एक बार कहा गया है कि भो भो राजन्, आश्रममृगोऽयं न हन्तव्यो न हन्तव्यः। उसके बाद रंगमंच पर सारथि राजा को कहता है कि आपके बाण और कृष्णमृग के बीच में तपस्वी लोग आकर खड़े हैं। तब राजा ने रथ को रोकने की सूचना दी और तपस्वी रंगमंच पर आकर वही नेपथ्योक्ति दोबारा बोलते हैं। यह पुनरुक्ति तो आवश्यक थी कि प्रेक्षकों को मालूम हो जाय कि नेपथ्य में से बोलनेवाले कौन थे। लेकिन वह तापस “न खलु न खलु०” वाला श्लोक बोलकर तीसरी बार भी वही आज्ञा दे कि इस मृग को न मारा जाय, तो वह नाटक में संमान्य नहीं है। इस तापस को मृग के मृदु शरीर की गुजारिश करने की, दया की याचना करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि" यह आश्रम का मृग है" इतना ही पर्याप्त है, उसमें ही आज्ञा सुनिश्चित थी। फिर भी जो कहना था वह तो “तदाशु कृतसंधानम्०” इस अनुगामी श्लोक से कहनेवाला ही है कि राजा के शस्त्र आर्त्त-परित्राण के लिए हैं, अनागस को मारने के लिए नहीं हैं। इस अधिक महत्त्वपूर्ण बात को कहने में कोई पुनरुक्ति नहीं है, किन्तु “न खलु न खलु०” वाले श्लोक में तो नितान्त पुनरुक्ति है, जो नाटक में असह्य होती है। अतः वह श्लोक प्रक्षिप्त ही होगा, और अब काश्मीरी में इस श्लोक का न होना एवं राघवभट्ट के द्वारा व्याख्यात नहीं होना सूचक सिद्ध होता है। उसमें काव्यत्व एवं गेयता होने से उसका संरक्षण होता रहा है, तथा पुष्पराशौ के स्थान में तूलराशौ, और सारपुङ्खा के स्थान में वज्रसाराः जैसे पाठभेद भी प्रविष्ट होते रहे हैं।