भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 262 में से

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अभिज्ञानशकुन्तलम्        प्रस्तावना        35

लिखे गये पाठ्यांश में प्रायः परिवर्तन एवं परिवर्धन किया ही है। नाटक एक अभिनेय-काव्य होने के कारण स्थल-काल की एवं रंगमंच की मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए सूत्रधारों के लिए नाट्यकार के मूल पाठ में परिवर्तन करना आवश्यक भी हो जाता है। अतः पाण्डुलिपियों में संचरित हुए नाट्यकृतियों के पाठ को हम सर्वथा मौलिक नहीं मान सकते हैं। ऐसे पाठों की आन्तरिक सम्भावना की दृष्टि से परीक्षा करने की नितान्त आवश्यकता रहती है। यह बात कालिदास जैसे नाट्यकार के लिए, तथा अभिज्ञान-शाकुन्तल जैसे सर्वश्रेष्ठ नाटक के लिए तो बिलकुल सही है क्योंकि उसकी लोकप्रियता आजन्म सिद्ध होने के कारण इसका मंचन पौनःपुन्येन होता ही रहा है। नाट्यकृति के परम्परागत पाठ में आन्तरिक सम्भावना बहुविध दृष्टि से देखी जा सकती है: जैसे कि (1) कृति के पाठ में विचार विषयक पूर्वापर संगति, (2) नाटकीयता की दृष्टि से संवादों में अपेक्षित आनुक्रमिकता, (3) कवि की निरूपण शैली, (4) कृति के मूलस्रोत रूप जो सामग्री हो उसका विश्लेषण एवं मूलस्रोत का परिमार्जन का हेतु, (5) कृति के लक्ष्य की सिद्धि, अर्थात् उपक्रमोपसंहार की संगति इत्यादि।

0-4 यहाँ बंगाली एवं देवनागरी वाचनाओं के अमुक निश्चित पाठभेदों की ही चर्चा की जा रही है जिसमें विशेष रूप से श्लोकात्मक संवादों की समीक्षा करना अभीष्ट है। यहाँ शब्दपर्यन्त ही सीमित रहनेवाले पाठभेदों की, या रंगसूचना देनेवाले वाक्यों में दिख रहे पाठभेद, या पात्रसृष्टि के नाम-सम्बद्ध पाठभेद, या प्रयोगवैविध्य को जन्म देनेवाले पाठभेदों की चर्चा नहीं की जायेगी। एवमेव, अलग अलग वाचनाओं में दृश्यमान प्राकृत-उक्तियों की प्राकृतभाषा की अनेकरूपता भी चर्चित नहीं की जायेगी।<sup>25</sup> यहाँ तो प्राधान्येन कुछ गद्य संवाद एवं श्लोकों में दिख रहे पाठभेद (जो प्रक्षेप एवं संक्षेप का परिणाम हो सकता है) की चर्चा की जा रही है।

1-1-0 बंगाली वाचना का पाठ प्राचीनतर है, इसी लिए वही पूर्ण रूप से मौलिक भी है ऐसा मान लेना मुश्किल है। तथा देवनागरी वाचना के पक्षधर कतिपय विद्वानों ने जैसे उस (बंगाली) वाचना का पाठ बृहत्पाठ होने मात्र से उसे पूर्ण रूप से प्रक्षेपों से भरा मान लिया है और उसकी नितान्त उपेक्षा की है, वह भी न्यायिक नहीं है। एवमेव, देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं के पाठ में ही संयमपूर्ण एवं व्यञ्जनासभर शृङ्गार निरूपित हुआ है, अतः वही मौलिक हो सकता है-ऐसा दावा करना भी सही नहीं है। निष्पक्ष बात तो वही हो सकती है कि दोनों तरह की वाचनाओं की तुलनात्मक दृष्टि से समीक्षा की जाय, तथा उभयत्र प्रक्षेप-संक्षेपादि के उदाहरण लेकर मूल पाठ के निर्धारण का विवेक उजागर किया जाय।


  1. इस सन्दर्भ में मेरा शोध-आलेख द्रष्टव्य है:-"शाकुन्तल की प्राकृतविवृत्ति एवं प्राकृतछायाएँ", संबोधि (वॉ 35) एल.डी. इन्स्टीट्यूट ऑफ इन्डोलॉजी, अहमदाबाद, 2013
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