अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें34 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
इसी तरह से श्री पी. एन. पाटणकर जी ( 1902 ई. स. में) ने भी देवनागरी पाण्डुलिपियों की निम्न स्तरीय पाठालोचना की है। किन्तु उनके निर्धारित किये देवनागरी के “शुद्धतर” पाठ्यांश (Patankar, 1902) में भी विचारसातत्य खण्डित होता है या नहीं, अथवा अमुक पाठ्यांश कवि की निरूपणशैली से विपरीत है या नहीं, या देवनागरी पाठ के नाम पर बंगाली वाचना का कुछ पाठ्यांश स्वीकृत कर लिया गया है या नहीं, ऐसा कोई विचार ही नहीं किया गया है।²³ अतः वे भी देवनागरी वाचना के पाठ में जो संक्षेपीकरण का खेल खेला गया है उसे देख नहीं पाये हैं। देवनागरी पाठपरम्परा का इतिहास बहुत लम्बा होने से शाकुन्तल की देवनागरी पाण्डुलिपियों में भी बहुविधता है। डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने बताया है कि देवनागरी वाचना के भी त्रिविध पाठ प्रसारित हुए हैं:-(1) प्राचीन देवनागरी, (2) मिश्रदेवनागरी एवं (3) संक्षिप्त की गयी देवनागरी पाण्डुलिपियाँ। (संक्षिप्त की गयी देवनागरी का पाठ यानि राघवभट्ट ने जिस पाठ पर टीका लिखी है वह।) सारभूत बात यही है कि सौ डेढ़ सौ साल के इतिहास में अलग अलग प्रान्तों के अनेकविध शाकुन्तल एवं उनकी विविध टीकाओं का प्रकाशन होता रहा है। लेकिन इस नाट्यकृति के पाठ की पाठालोचना करने का कार्य दो-तीन विद्वानों²⁴ से अधिक किसी ने भी नहीं किया है, और वह भी आंशिक रूप में ही हुआ है। प्रस्तुत आलेख में, बंगाली वाचना की तुलना में देवनागरी वाचना में जहाँ संक्षेपीकरण हुआ है, एवं मौलिकता के नजदीक होते हुए भी बंगाली वाचना के पाठ में जहाँ प्रक्षिप्तांश दिखते हैं उसकी उच्चतर समीक्षा की जाती है।।
0-3 पाठालोचना का चतुर्थ सोपान है: उच्चतर समीक्षा। उसमें पाण्डुलिपियों के साक्ष्य से ऊपर उठना है। तथा टीकाकारों के द्वारा जो पाठ मान्य किया गया है ऐसे (सहायक सामग्री रूप) टीका-ग्रन्थों के प्रमाणों को भी छोड़ देना है। पाठालोचना के इस अन्तिम सोपान पर, समीक्षित पाठ के रूप में निर्धारित किये गये पाठ में प्रत्येक वाक्य की परीक्षा करनी होती है। जैसे कि पूर्वापर सन्दर्भ में विचार-सातत्य बना रहता है कि नहीं? एवमेव, प्रत्येक विचार की सुसंगतता एवं औचित्य है या नहीं? नाट्यकृति के जिस श्लोक में या गद्य-वाक्य में विचार-सातत्य खण्डित होता है, अथवा पुनरुक्ति होती है-तो उस पाठ की मौलिकता संशयग्रस्त बनती है। जिस संवाद में प्रसंगानुसारी नाट्यगत औचित्य प्रतीत नहीं होता है तो वह पाठ्यांश प्रक्षेप या संक्षेप का परिणाम हो सकता है क्योंकि अतीत में मंचन के दौरान सूत्रधारों ने अपनी अपनी रुचि-अरुचि या प्रतिभा के अनुसार नाट्यकार के द्वारा
- श्री पाटणकर जी ने कृति का शीर्षक “अभिज्ञानशकुन्तलम्” मान्य किया है। वस्तुतः ऐसा शीर्षक बंगाली, मैथिली और काश्मीरी पाण्डुलिपियों में प्रवर्तमान है। और देवनागरी तथा दाक्षिणात्य पाण्डुलिपियों में “अभिज्ञानशाकुन्तलम्” है।
- प्रोफे. बलवन्तराय ठाकोर (गुजरात), डॉ० एस.के. बेलवरकर (पुणे) और शारदरंजन राय (कोलकाता)।