अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 33
0-2 पाठालोचना की दिशा में विद्वानों के द्वारा अद्यावधि जो शोधकार्य हुआ है उससे इतनी जानकारी मिलती है कि पाण्डुलिपियों में प्रवहमान अभिज्ञानशाकुन्तल का पाठ इयत्ता में द्विविध है। एक को बृहत्पाठ कहते हैं, तथा दूसरे को लघुपाठ कहते हैं। प्रथम याने बृहत्पाठ परम्परा के “अभिज्ञानशकुन्तल” में तीन वाचनायें दृष्टिगोचर हो रही हैं:-(1) काश्मीरी वाचना, (2) मैथिली वाचना, एवं (3) बंगाली वाचना। दूसरी, लघुपाठ परम्परा के “अभिज्ञानशकुन्तल” की दो वाचनायें प्रसिद्ध हैं:-(4) देवनागरी वाचना एवं (5) दाक्षिणात्य वाचना।। विद्वानों के परिश्रम से अभी तक इतना सप्रमाण सिद्ध हुआ है कि देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं की अपेक्षा बंगाली वाचना में संचरित हुआ जो पाठ है वह प्राचीनतर है, एवं बृहत्तर भी है।
बंगाली वाचना के अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ का समीक्षित पाठ-सम्पादन करनेवाले विद्वान् दो हैं:-(1) डॉ० रिचार्ड पिशेल, (Pischel, 1876; (Seond edition-1922), तथा (2) डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल, (काञ्जीलाल, 1980)। इन दोनों सुज्ञ विद्वानों ने बंगाली वाचना पर लिखी गयी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की टीका का विनियोग अवश्य किया है, तथा रिचार्ड पिशेल ने तो इस नाट्यकृति के प्राकृत-संवादों के पाठ की शुद्धि करने के लिये चन्द्रशेखर की टीका का ही अधिक से अधिक सहारा लिया है। किन्तु दोनों में से किसी विद्वान् ने इस नाटक के अधिकृत-समीक्षित-पाठ को प्रकाशित करने के साथ साथ चन्द्रशेखर की “सन्दर्भदीपिका” टीका का अधिकृत पाठ प्रकाशित नहीं किया है। टीकाकार चन्द्रशेखर की टीका से समर्थित होनेवाले पाठ को अधिक श्रद्धेय मान कर, उसके आधार पर अभिज्ञानशकुन्तल का समीक्षित पाठ निर्धारित करने के पश्चात् भी यह प्रश्न तो रहता ही है कि इस टीकाकार के द्वारा समादृत पाठ में प्रक्षेप्यादि के दूषण हैं या नहीं हैं। क्योंकि अनेकानेक बंगाली पाण्डुलिपियों का आलोडन करके अभिज्ञानशकुन्तल का जो पाठ “अधिकृत” या “समीक्षित” पाठ के रूप में रिचार्ड पिशेल एवं श्रीदिलीपकुमार काञ्जीलाल ने प्रस्तुत किया है उसकी आन्तरिक सम्भावना के मानदण्ड से यदि परीक्षा की जाय तो तुरन्त मालूम होगा कि इन दोनों महाशयों द्वारा तैयार किया हुआ बंगाली वाचना का समीक्षित पाठ भी अनेक स्थानों पर प्रक्षेप एवं संक्षेप से भरा पड़ा है। मतलब कि इन दोनों विद्वानों ने जो समीक्षित पाठ निर्धारित किया है वह केवल निम्न स्तरीय पाठालोचना का परिणाम है और उस पाठ की उच्च स्तरीय पाठालोचना करने का कार्य अभी तक शायद पूर्ण रूप से नहीं हुआ है। यदि बंगाली वाचना में प्रवहमान पाठ प्राचीनतर एवं मौलिकता²² के नजदीक है, ऐसा सिद्ध हो रहा है तो उस पाठ की उच्च स्तरीय पाठालोचना कर मौलिकता की ओर अधिक निकटता हासिल करने का प्रयास करना ही चाहिए।
- इस सन्दर्भ में द्रष्टव्य है मेरा शोध-आलेख:-अभिज्ञानशाकुन्तल, बंगाली वाचना की मौलिकता के समर्थक नवीन प्रमाण, संस्कृत-विमर्श (नव शृङ्खला, वॉ. 4) राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नयी दिल्ली, 2010, पृ. 147-160