अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें32 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
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अभिज्ञानश(शा)कुन्तलम् की बंगाली एवं देवनागरी वाचनाओं में प्रक्षेप एवं संक्षेप
0-1, भूमिका—यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक की सर्वोत्तमता को लेकर कोई विवाद ही नहीं उठा है! पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ इस नाटक का पाठ इयत्ता में द्विविध है। अतः उनमें से कौन सा शाकुन्तल मंचन के योग्य है, ऐसा प्रश्न होना चाहिए था, तदनन्तर इनमें से किसकी सर्वोत्तमता मानी जाय ऐसा विवाद भी उठना अपेक्षित था। किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा कुछ हुआ नहीं। यहाँ तो विगत 100-150 वर्षों में अभिज्ञानशाकुन्तल के प्रचलित पाठों की मौलिकता को लेकर संशय या विप्रतिपत्ति दिखानेवाले विद्वान् दो-चार की संख्या में परिसीमित हैं! जबकि हकीकत यह है कि इस नाटक के शीर्षक से लेकर, अन्तिम भरतवाक्य पर्यन्त जितने भी गद्य-पद्य संवाद हैं वे सभी पाठभेद की समस्या से ग्रस्त हैं। अतः स्वाभाविक रूप से ही शाकुन्तल के मौलिक पाठ की गवेषणा करने के लिये गणमान्य विद्वानों के द्वारा बार बार चर्चा-विचारणा होनी आवश्यक थी और आज भी वह अनिवार्य है। अभिज्ञानशाकुन्तल की पाठालोचना करनेवाले विरल विद्वानों में दो मत हैं:-(1) प्रथम, शाकुन्तल के जिस पाठ पर राघवभट्ट ने “अर्थद्योतनिका” टीका लिखी है, वह देवनागरी वाचना का पाठ ही मौलिक हो सकता है। (2) द्वितीय, बंगाली वाचना का पाठ, जिस पर चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने सन्दर्भदीपिका टीका लिखी है, वह प्राचीनतर भी है और अधिक श्रद्धेय एवं कदाचित् मौलिक भी है। अतः कम से कम, उपर्युक्त टीकाकारों के द्वारा स्वीकृत इन दोनों वाचनाओं के पाठ की परीक्षा तो करनी चाहिए। क्योंकि किसी भी कृति की पाठालोचना किये बिना यदि उसकी साहित्यिक आलोचना की जाती है तो वह आज नहीं तो कल गलत सिद्ध होने की पूरी सम्भावना है।