भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 262 में से

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पृष्ठ 45
अभिज्ञानशकुन्तलम्प्रस्तावना31

उपसंहारः- पाठालोचना में इदं प्रथमतया पाण्डुलिपियों का साक्ष्य ही महत्त्व रखता है। उपलब्ध पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठों का तुलनात्मक अध्ययन करके, वंशवृक्षपद्धति से विभिन्न वाचनाओं में से कौन सी वाचना पूर्वज है या वंशज है, अर्थात् प्राचीन या प्राचीनतर है, उसका निर्णय किया जाता है। तदनन्तर, कौन से पाठ को बहुसंख्य पाण्डुलिपिओं का समर्थन मिलता है, अथवा प्राप्त की गयी अनेकानेक पाण्डुलिपिओं में से जो प्राचीनतम पाण्डुलिपि होगी उनमें कौन सा पाठ सुरक्षित रहा है, उसकी विचारणा आधुनिक पाठसम्पादक करते हैं। ऐसे दृष्टिकोण से जो समीक्षित पाठसम्पादन किया जाता है उसमें वस्तुनिष्ठता जरूर होती है। क्योंकि यहाँ पर जैसा भी निर्णय किया जाता है वह उपलब्ध पाण्डुलिपिओं (की संख्या या प्राचीनता) पर निर्भर रहता है। परन्तु जब अनेकविध पाठान्तरों में से कौन सा पाठान्तर अधिक काव्यत्व या नाट्यक्षमता से परिपूर्ण हो सकता है, उसको देखकर, अर्थात् "गुणोपसंहार न्याय" (Eclectic Principles) से समीक्षित पाठसम्पादन तैयार किया जाता है, तो उसमें आत्मलक्षिता प्रविष्ट होती ही है। परिणाम स्वरूप ऐसा समीक्षित पाठसम्पादन सर्वसम्मत नहीं होता है। तथा जिस वंशवृक्षपद्धति से निर्धारित किये समीक्षित पाठसम्पादन को वस्तुनिष्ठ कहा गया है उसमें पाठालोचना के तीन सोपान ही कार्यान्वित किये गये होते हैं। अतः वहाँ चतुर्थ सोपान पर उच्चतर पाठसमीक्षा का कार्य अवशिष्ट रहता है। यहाँ वंशवृक्षपद्धति से जिस वाचना को प्राचीनतर या अधिक श्रद्धेय मान कर, उसके आधार पर पाठसम्पादन किया जाता है उसका पुनःपरीक्षण किया जाता है। ऐसे पुनःपरीक्षण में बाह्य साक्ष्य एवं कृतिनिष्ठ आन्तरिक सम्भावना को सर्वोच्च मानदण्ड के रूप में स्वीकारा जाता है। प्रस्तुत आलेख में, बंगाली वाचना के बृहत् पाठ की मौलिकता को कृति के ही अन्तःसाक्ष्य से कैसे समर्थन मिल रहा है उसकी चर्चा की गयी है। किन्तु यहाँ ऐसा कहने का आशय यह भी नहीं है कि बंगाली वाचना के पाठ को ही साद्यन्त स्वरूप में मौलिक मान लिया जाय। क्योंकि डॉ० रिचार्ड पिशेल के द्वारा निर्धारित किये गये बंगाली वाचना के समीक्षित पाठ की भी व्यापक रूप से उच्चतर समीक्षा करना अनिवार्य है। (जिसको अनुगामी पृष्ठों में प्रस्तुत किया गया है।) बंगाली वाचना के पाठ में मौलिकता झलक रही है ऐसा सिद्ध होने का सही मतलब तो यह है कि अभिज्ञानशकुन्तल का बृहत्पाठ संचरित करनेवाली जो तीन वाचनायें हैं, 1. बंगाली, 2. मैथिली एवं 3. काश्मीरी, इन तीनों में मौलिकता छुपी हुई है। कालिदास के अभिज्ञानशकुन्तल का मूल पाठ उजागर करने के लिए उपर्युक्त त्रिविध वाचनाओं में संचरित हुए बृहत्पाठ का आलोडन करके ही अभिज्ञानशकुन्तल के कविप्रणीत मूल पाठ को निश्चित करना चाहिए।

Bibliography

Kanjilal, D.K. (1980). A Reconstruction of the Abhijnana-śakuntalam,
Calcutta: Sanskrit College.
Vasantkumar, B. (2002)-Anukroshatva–a rare element of humanity,