भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 262 में से

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30 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

देवनागरी वाचनावाले अभिज्ञानशाकुन्तल के सप्तमाङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला के पाँव पड़ता है (और 7 / 24 श्लोक बोलता है।) यहाँ शकुन्तला कहती है कि-उत्तिष्ठत्वार्यपुत्रः। नूनं मे सुचरितप्रतिबन्धकं पुराकृतं तेषु दिवसेषु परिणाममुखम् आसीद्, येन सानुक्रोशोऽप्यार्यपुत्रो मयि विरसः संवृत्तः। यहाँ शकुन्तला ने कहा है कि दुष्यन्त एक सानुक्रोश व्यक्ति है, लेकिन मेरे सुचरित को रोकनेवाले गत जन्म के कोई कर्म उस समय फल देने के लिये तत्पर हो गये थे, जिसके कारण आर्यपुत्र सानुक्रोश होते हुए भी मेरे प्रति विरस हो गये थे। यहाँ दुष्यन्त के लिए प्रयुक्त सानुक्रोश शब्द, जो समग्र संस्कृतसाहित्य में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शब्द है (Vasantkumar, 2002)$^{20}$, उसका औचित्य कैसे सिद्ध किया जा सकता है, यह परीक्षणीय है।

शकुन्तला की उपर्युक्त उक्ति को सुन कर यह प्रश्न किया जा सकता है कि “दुष्यन्त एक सानुक्रोश व्यक्ति है” ऐसा अनुभव शकुन्तला को कब हुआ होगा? दुष्यन्त और शकुन्तला का साहचर्य तो केवल प्रथम एवं तृतीय, इन दो अङ्कों में ही वर्णित हुआ है। 1. प्रथमाङ्क के भ्रमरबाधा प्रसङ्ग में दुष्यन्त शकुन्तला को भ्रमर के त्रास से छुड़ाने के लिये जब सहसा प्रस्तुत होता है एवं वृक्षसेचन के लिये दो घट पानी के ऋण में से मुक्त करवाने के लिये जब वह अपनी राजमुद्रा निकाल कर देता है। 2. देवनागरी वाचना के तृतीयाङ्क में नायक-नायिका का साहचर्य / सहवास परिसीमित क्षणों में पूरा होता है। अतः इस अल्पकालिक मिलन में शकुन्तला को किसी बाधा से छुड़ाने का मौका दुष्यन्त को मिला हो ऐसा कोई प्रसंग वर्णित नहीं है। इस लिये सप्तमाङ्क में जब दुष्यन्त के लिये सानुक्रोश शब्द का प्रयोग होता है तब वह निराधार लगता है। किन्तु बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क के पाठ को यदि लेते हैं तो वहाँ एक निश्चित प्रसङ्ग है जिसमें दुष्यन्त ने शकुन्तला को प्रत्यक्ष रूप से बाधामुक्त किया है। शकुन्तला ने अपने कानों में जो उत्पलपुष्प आरोपित किया था, उसकी रेणु से नेत्र जब कलुषित होता है तब दुष्यन्त ने अपने वदनमारुत से उसका प्रमार्जन किया था। और शकुन्तला ने भी दुष्यन्त को अनुकम्पा प्रदर्शित करनेवाला कहा है।$^{21}$ इस तरह बंगाली वाचना के पाठ को यदि हम ध्यान में ले कर सप्तमाङ्क के सानुक्रोश शब्द के प्रयोग का औचित्य सोचते हैं तो वह सुसंगत और साधार लगता है। परन्तु देवनागरी वाचना के संक्षिप्त पाठ के सन्दर्भ में इस महत्त्वपूर्ण शब्द के प्रयोग का औचित्य जमता नहीं है।


  1. करुणा जो होती है वह ईश्वर की होती है और जो सहानुभूति होती है वह साधुपुरुष की होती है। इस करुणा और सहानुभूति के बीच में अनुक्रोश आता है। तथा अनुक्रोशत्व के कारण प्रेमोद्भव होता है-ऐसा संस्कृत कवियों ने बार बार दिखाया है।
  2. शकुन्तला - न तावत् एवम् प्रेक्षे। पवनोत्कम्पिना कर्णोत्पलररेणुना कलुषीकृता मे दृष्टिः। राजा- यदि मन्यसे अहमेनां वदनमारुतेन विशदां करिष्ये। शकुन्तला - ततो अनुकम्पिता भवेयम्। (रिचार्ड पिशेल आवृत्ति) पृ. 40
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