अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें| 38 | चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम् |
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प्रियंवदा—सहि, किं मे पिअं। (सखि, किं मे प्रियम्।)
शकुन्तला—असमए क्खु एसा आ मूलादो मउलिदा माहवीलदा। (असमये खल्वेषा आमूलात् मुकुलिता माधवीलता।)
उभे—(सत्वरमुपगम्य) सहि, सच्चं सच्चं। (सखि, सत्यं सत्यम्।)
शकुन्तला—सच्चं, किं ण पेक्खध। (सत्यम्। किं न प्रेक्षेथे।)
प्रियंवदा—(सहर्षम् निरूप्य) तेण हि पडिप्पिअं दे णिवेदमि। आसण्णपाणिग्गहणा सि तुमं। (तेन हि प्रतिप्रियं ते निवेदयामि। आसन्नपाणिग्रहणासि त्वम्।)
शकुन्तला—(सासूयम्) णूणं एस दे अत्तगदो मणोरधो। (नूनम् एषः ते आत्मगतः मनोरथः।)
प्रियंवदा—ण क्खु परिहासेण भणामि। सुदं खु मए तादकण्णस्स मुहादो तुए कल्लाणसूअअं इदं णिमित्तं ति। (न खलु परिहासेण भणामि। श्रुतं खलु मया तातकण्वस्य मुखात्त्व कल्याणसूचकम् इदं निमित्तम् इति।)
अनसूया—पिअंवदे, अदो ज्जेव सउन्तला ससिणेहा माहवीलदं सिञ्चदि। (प्रियंवदे, अत एव शकुन्तला सस्नेहा माधवीलतां सिञ्चति।)
शकुन्तला—जदो मे बहिणिआ भोदि तदो किं ति ण सिञ्चिस्सं। (यतः मे भगिनी भवति ततः किमिति न सेक्ष्यामि।) (इति कलशमावर्जयति)
माधवीलता से सम्बद्ध इन संवादों का समावेश केवल बंगाली और मैथिली वाचनाओं में दिखता है। यहाँ दो प्रश्न उपस्थित हो रहे हैं: 1. कण्व मुनि के आश्रम में माधवीलता नामक लता थी या नहीं तथा 2. जैसे प्रियंवदा ने यहाँ कहा है कि शकुन्तला आसन्नपाणिग्रहणा है ऐसा कण्व ने बताया है, तो क्या वस्तुतः ऐसा कहा होगा? विचार करने से लगता है कि ये दोनों बातें प्रक्षिप्त होनी चाहिए। क्योंकि (1) प्रथमांक के वृक्षसिंचनवाले दृश्य में जब शकुन्तला ने पहले कह दिया है कि—हला अनसूये, न केवलं तातनियोगः, ममापि सहोदरस्नेहः एतेषु। (इति वृक्षसेचनं नाटयति)। अर्थात् शकुन्तला के लिए तो आश्रम के छोटे बड़े सभी वृक्ष एवं लतायें सहोदर समान ही हैं, तो फिर कण्व ने अपने हाथों से सम्वर्द्धित की हुई माधवीलता को ही केवल शकुन्तला अपनी “भगिनी” कहे वह उचित नहीं है। इससे पूर्वापर कथन में विरोध आता है। एवञ्च, कवि ने शकुन्तला का विशेष पक्षपात तो नवमालिका लता के प्रति पहले दिखाया है। शकुन्तला ने उसका वनतोषिणी (वनज्योत्स्ना) ऐसा विशेष-नामकरण भी किया है। अतः माधवीलता सम्बद्ध यह संवाद प्रक्षिप्त होने की सम्भावना दिख रही है। किन्तु (अज्ञात) प्रक्षेपकर्ता ने सावधानी भी बरती है। चतुर्थांक में शकुन्तला-विदाई प्रसंग में भी इस माधवीलता का पुनरुल्लेख जोड़ दिया गया है। जैसे कि