अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें| अभिज्ञानशकुन्तलम् | प्रस्तावना | 39 |
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शकुन्तला—(स्मृत्वा) ताद, लदावहिणिअं दाव माहविं आमन्तइस्सं। (तात, लताभगिनीं तावत् माधवीमामन्त्रयिष्यामि।)
कण्वः—वत्से, अवैमि ते तस्यां सौहार्दम्। इयं सा दक्षिणे। पश्य।
शकुन्तला—(उपेत्य लतामालिङ्ग्य) लदावहिणिए। पच्चालिङ्ग मं साहामईहिं बाहाहिं। अज्ज पहुदि दूरवत्तिणी खु दे भविस्सं। ताद, अहं विअ इअं तए चिन्तणीआ।
(लताभगिनि, प्रत्यालिङ्ग मां शाखामयैः बाहुभिः। अद्यप्रभृति दूरवर्तिनी खलु ते भविष्यामि। तात, अहमिव इयं त्वया चिन्तनीया।)
कण्वः—वत्से,
सङ्कल्पितं प्रथममेव मया त्वदर्थे
<p align="right">4-15</p>
भर्तारमात्मसदृशं स्वगुणैर्गतासि।
अस्यास्तु सम्प्रति वरं त्वयि वीतचिन्तः
कान्तं समीपसहकारमिमं करिष्ये॥
तदितः पन्थानं प्रतिपद्यस्व।
शकुन्तला—(सख्यावुपेल्य) हला, एसा दोण्णं पि वो हत्थे णिक्खेवो। (सखि, एषा द्वयोः अपि वां हस्ते निक्षेपः।)।
यहाँ दो बातें खटकती हैं:—(1) शकुन्तला ने पतिगृह जाते समय कण्व को इस माधवीलता के बारे में चिन्ता करने की विनती की है और अपनी सहेलियों से भी वही विनती की है। इसमें न केवल पुनरुक्ति है, उसमें पिता द्वारा पहले दिये वचन पर अविश्वास है ऐसा भी सूचित होता है। दूसरा वदतोव्याघात जैसा बिन्दु यह है कि पिता कण्व ने जो वचन श्लोक-15 के माध्यम से कहे हैं वह प्रथमांक में कही गयी बातों से विरुद्ध है। प्रथमांक में शकुन्तला ने ही कहा है कि सहकार वृक्ष के साथ तो नवमालिका का व्यतिकर हो चुका है, उसके बाद अब कण्व कैसे इस माधवीलता को सहकार वृक्ष के साथ विवाहित करेंगे? इस विरोधपूर्ण बात को देखते हुए कहना होगा कि माधवीलता से सम्बद्ध जो वचन प्रथमांक में एवं चतुर्थांक में हैं वह दोनों प्रक्षिप्त हैं। एक तीसरा विचारणीय बिन्दु यह भी है कि माधवीलता के सन्दर्भ में जो “इति कलशामावर्जयति” ऐसी रंगसूचना है, वह भी “इति वृक्षसेचनं नाटयति” से हट कर नये स्वरूप की है। यह भी माधवीलता से सम्बद्ध संवादमाला की प्रक्षिप्तता का सबूत बनता है। (2) जैसे प्रियंवदा बताती है कि शकुन्तला आसन्नपाणिग्रहणा है—ऐसा कण्व ने कहा है, तो यह संवाद भी प्रक्षिप्त इस लिये होगा कि पहले तो तापसों ने दुष्यन्त को ऐसा कहा है कि—इदानीमेव दुहितरम् अतिथिसत्कारायादिश्य दैवमस्याः प्रतिकूलं शमयितुं सोमतीर्थं गतः। अर्थात् शकुन्तला के सम्भावित प्रतिकूल दैव