अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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शकुन्तला—(स्मृत्वा) ताद, लदावहिणिअं दाव माहविं आमन्तइस्सं। (तात, लताभगिनीं तावत् माधवीमामन्त्रयिष्यामि।)
कण्वः—वत्से, अवैमि ते तस्यां सौहार्दम्। इयं सा दक्षिणे। पश्य।
शकुन्तला—(उपेत्य लतामालिङ्ग्य) लदावहिणिए। पच्चालिङ्ग मं साहामईहिं बाहाहिं। अज्ज पहुदि दूरवत्तिणी खु दे भविस्सं। ताद, अहं विअ इअं तए चिन्तणीआ।
(लताभगिनि, प्रत्यालिङ्ग मां शाखामयैः बाहुभिः। अद्यप्रभृति दूरवर्तिनी खलु ते भविष्यामि। तात, अहमिव इयं त्वया चिन्तनीया।)
कण्वः—वत्से,
सङ्कल्पितं प्रथममेव मया त्वदर्थे
<p align="right">4-15</p>
भर्तारमात्मसदृशं स्वगुणैर्गतासि।
अस्यास्तु सम्प्रति वरं त्वयि वीतचिन्तः
कान्तं समीपसहकारमिमं करिष्ये॥
तदितः पन्थानं प्रतिपद्यस्व।
शकुन्तला—(सख्यावुपेल्य) हला, एसा दोण्णं पि वो हत्थे णिक्खेवो। (सखि, एषा द्वयोः अपि वां हस्ते निक्षेपः।)।
यहाँ दो बातें खटकती हैं:—(1) शकुन्तला ने पतिगृह जाते समय कण्व को इस माधवीलता के बारे में चिन्ता करने की विनती की है और अपनी सहेलियों से भी वही विनती की है। इसमें न केवल पुनरुक्ति है, उसमें पिता द्वारा पहले दिये वचन पर अविश्वास है ऐसा भी सूचित होता है। दूसरा वदतोव्याघात जैसा बिन्दु यह है कि पिता कण्व ने जो वचन श्लोक-15 के माध्यम से कहे हैं वह प्रथमांक में कही गयी बातों से विरुद्ध है। प्रथमांक में शकुन्तला ने ही कहा है कि सहकार वृक्ष के साथ तो नवमालिका का व्यतिकर हो चुका है, उसके बाद अब कण्व कैसे इस माधवीलता को सहकार वृक्ष के साथ विवाहित करेंगे? इस विरोधपूर्ण बात को देखते हुए कहना होगा कि माधवीलता से सम्बद्ध जो वचन प्रथमांक में एवं चतुर्थांक में हैं वह दोनों प्रक्षिप्त हैं। एक तीसरा विचारणीय बिन्दु यह भी है कि माधवीलता के सन्दर्भ में जो “इति कलशामावर्जयति” ऐसी रंगसूचना है, वह भी “इति वृक्षसेचनं नाटयति” से हट कर नये स्वरूप की है। यह भी माधवीलता से सम्बद्ध संवादमाला की प्रक्षिप्तता का सबूत बनता है। (2) जैसे प्रियंवदा बताती है कि शकुन्तला आसन्नपाणिग्रहणा है—ऐसा कण्व ने कहा है, तो यह संवाद भी प्रक्षिप्त इस लिये होगा कि पहले तो तापसों ने दुष्यन्त को ऐसा कहा है कि—इदानीमेव दुहितरम् अतिथिसत्कारायादिश्य दैवमस्याः प्रतिकूलं शमयितुं सोमतीर्थं गतः। अर्थात् शकुन्तला के सम्भावित प्रतिकूल दैव
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के शमन के लिये कण्व तीर्थयात्रा पर चल पड़े हैं। यदि उन्होंने जान लिया है कि शकुन्तला आसन्नपाणिग्रहणा है, तो वे आश्रम से क्यों चल पड़े हैं, यह सवाल पैदा होता है। तथा यह बात उन्होंने अकेली प्रियंवदा को ही क्यों कही थी, ऐसा दूसरा सवाल भी उठता है। महाकवि कालिदास जैसे परिणतप्रज्ञ नाट्यकार से ऐसी परस्पर विसंगतताओं से भरी प्रस्तुति सम्भव ही नहीं है। अतः उसको प्रक्षिप्त मानना ही उचित होगा।
1-1-4 बंगाली वाचना के प्रथमांक के पाठ में प्रक्षेप के उदाहरण देखने के बाद, उसमें कुत्रचित् संक्षेप भी हुआ है उसका भी निरूपण करना चाहिए:
राजा—उपपद्यते,
मानुषीभ्यः कथं नु स्यादस्य रूपस्य संभवः।
न प्रभातरलं ज्योतिरुदेति वसुधातलात्।।
1-25
(शकुन्तला सव्रीडाऽधोमुखी तिष्ठति)
राजा—(आत्मगतम्) हन्त, लब्धावकाशा मे मनोरथाः।
प्रियंवदा—(सस्मितम् शकुन्तलां विलोक्य) पुणो वि वक्तुकामो विअ अज्जो। (पुनः अपि वक्तुकामः इव आर्यः।) (शकुन्तला सखीमङ्गुल्या तर्जयति।)
राजा—सम्यगुपलक्षितं भवत्या। अस्ति नः सुचरितश्रवणलोभादन्यदपि प्रष्टव्यम्।
प्रियंवदा—तेण हि अलं विआरिदेण। अणिज्जन्तणणिओओ क्खु तवस्सिअणो। (तेन हि अलं विचारितेन। अनियन्त्रणनियोगः खलु तपस्विजनः।)
राजा—एतत्पृच्छामि
वैखानसं किमनया व्रतमाप्रदानाद् व्यापाररोधि मदनस्य निषेवितव्यम्।
अत्यन्तमेव सदृशेक्षणवल्लभाभिराहो निवत्स्यति समं हरिणाङ्गनाभिः।।
1-26
प्रियंवदा—अज्ज धम्माअरणपरव्वसो अअं जणो। गुरुणो उण से अणुरूववरप्पदाणे संकप्पो। (आर्य, धर्माचरणपरवशः अयं जनः। गुरोः पुनः अस्याः अनुरूपवरप्रदाने संकल्पः।)
राजा—(आत्मगतम् सहर्षम्)
भव हृदय साभिलाषं सम्प्रति संदेहनिर्णयो जातः।
आशङ्कसे यदग्निं तदिदं स्पर्शक्षमं रत्नम्।।
1-27
शकुन्तला के जन्म का वृत्तान्त प्रियंवदा से जान लेने के बाद, दुष्यन्त को मालूम हो जाता है कि शकुन्तला राजर्षि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की संतति है। अब दुष्यन्त के
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मनोरथों को साकार होने का अवकाश निश्चित है। वह अपने आप को कहता है कि हन्त, लब्धावकाशा मे मनोरथाः। किन्तु इस उक्ति के बाद भी एक गद्य वाक्य था, जो किसी अज्ञात सूत्रधार ने शायद हटा दिया है, संक्षेप कर लिया है। वह वाक्य मैथिली और काश्मीरी वाचनाओं में, तथा देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचनाओं में सुरक्षित रहा है। जैसे मैथिली में, “किन्तु परिहासोदारं वरप्रार्थनमस्याः श्रुत्वापि, व्रतद्वैतकातरं मे मनः।”, उसी तरह से देवनागरी में, “किन्तु सख्याः परिहासोदाहृतां वरप्रार्थनां श्रुत्वा, धृतद्वैधीभावकातरं मे मनः”। नायक ने जान लिया कि शकुन्तला ब्राह्मणकन्या नहीं है, इस लिए उसके मनोरथ को सफल होने का अवकाश है। फिर भी उसका मन द्विधाभाव का अनुभव कर रहा था। शकुन्तला क्या मदनव्यापार को रोकनेवाले वैखानस व्रत का आचरण सदैव करनेवाली है, या फिर वह व्रत विवाह पर्यन्त ही है? इस द्विविधा को प्रकट करनेवाला दूसरा वाक्य बंगाली वाचना में से हटाया गया है। यह द्विविधापूर्ण स्थिति यद्यपि आत्मगत उक्ति के द्वारा रखी गयी है, तथापि उसका मूल पाठ में होना आवश्यक इस लिए लगता है कि जो उत्तरवर्ती संवाद-शृङ्खला है, वह पूर्ण रूप से इस द्विविधा की निवृत्ति के लिए ही प्रस्तुत हो रही है। तथा अन्त में श्लोक-27 से इस द्विविधा का उपशमन भी किया गया है।।
1-2-0 देवनागरी वाचना के पाठ में ही कालिदासीय कवित्व का संस्पर्श है-ऐसा मानना आत्मलक्षिता से भरा है, एवं तुलनात्मक अभ्यास के अभाव का परिणाम है। सुप्रचलित एवं बहुव्याख्यात होते हुए भी देवनागरी वाचना का पाठ मौलिकता से दूर हट गया है क्योंकि उसमें बहुशः संक्षिप्त किया गया पाठ ही संचरित हुआ है, और कुत्रचित् उसमें भी प्रक्षिप्तांश मिलते हैं। इसकी उच्च स्तरीय पाठालोचना करना अनिवार्य है।
1-2-1 देवनागरी वाचना में प्रथमांक के पाठ में प्रक्षेप का उदाहरणः कृष्णमृगानुसारी राजा दुःषन्त / दुष्यन्त के मार्ग में बीच में आकर वैखानस कहता है भो राजन्, आश्रममृगोऽयम्, न हन्तव्यो न हन्तव्यः। तब राजा ने अपना बाण वापस ले लिया। इससे प्रसन्न हुए वैखानस ने राजा को आशीर्वाद दिया कि-
सदृशमेतत् पुरुवंशप्रदीपस्य भवतः।
जन्म यस्य पुरोर्वंशे युक्तरूपमिदं तव।
पुत्रमेवंगुणोपेतं चक्रवर्तिनमाप्नुहि।।
(1-11)
इसके पश्चात्, वैखानस के साथ आये हुए दोनों शिष्यों ने अपने हाथ उठा कर उसी आशीर्वाद का अनुवाद करते हुए कहा है-सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रमाप्नुहि।। यहाँ देवनागरी वाचना के पाठ में स्पष्ट रूप से पुनरुक्ति हो रही है। जो आशीर्वचन वैखानस ने दिये हैं उसका दृढीकरण करनेवालों का दर्जा मात्र शिष्य का है। अतः उसका औचित्य कितना? इससे प्रतीत होता है कि यहाँ कुछ अंश प्रक्षिप्त एवं परिवर्तित हुआ है। इसका समाधान
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बंगाली वाचना में होता है। बंगाली पाठ में रंगमंच पर केवल दो तापस ही आते हैं और उनमें से एक ही तापस ने आशीर्वचन कहे हैं। दूसरे तापस ने उसकी पुनरुक्ति नहीं की है। वहाँ पर उपर्युक्त श्लोक भी नहीं आता है। तापस ने केवल गद्य वाक्य में ही आशीर्वाद दिये हैं। हाँ, इतना जरूर कहना चाहिए कि देवनागरी वाचनानुसारी प्रस्तुति में दृश्य की अभिनेयता बढ़ जाती है। शायद इसी लिये किसी सूत्रधार की प्रतिभा ने पूर्वोक्त श्लोक का प्रक्षेप करवाया होगा।
1-2-2 प्रथमाङ्क में श्लोक का संक्षेपः (बंगाली वाचनानुसार) कण्व मुनि के आश्रम के पास पहुँचते ही राजा ने यह तपोवन का भाग है ऐसा सारथि को बताते हुए निम्नलिखित दो श्लोकों में उसका वर्णन किया है-
नीवाराः शुककोटरगर्भमुखभ्रष्टास्तरूणामधः
प्रस्निग्धाः क्वचिदिङ्गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपलाः।
विश्वासोपगमादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा-
स्तोयाधारपथाश्च वल्कलशिखानिष्यन्दलेखाङ्किताः॥
1-13
अपि च-
कुल्याम्भोभिः पवनचपलैः शाखिनो धौतमूला
भिन्नो रागः किसलयरुचामाज्यधूमोद्गमेन
एते चार्वागुपवनभुवि च्छिन्नदर्भाङ्कुरायां
नष्टाशङ्का हरिणशिशवो मन्दमन्दं चरन्ति॥
1-14
श्री पी. एन. पाटणकर के द्वारा संपादित शकुन्तल में दोनों श्लोक यथावत् मान्य किये गये हैं। किन्तु राघवभट्ट ने शाकुन्तल के जिस पाठ पर टीका लिखी है वह (अति)संक्षिप्त किया गया पाठ है। उस पाठ में “अपि च” से सम्बद्ध किया गया कुल्याम्भोभिः० वाला दूसरा श्लोक हटाया गया है। अर्थात् इस श्लोक पर राघवभट्ट ने टीका ही नहीं लिखी है। इस श्लोक को यदि मौलिक मानते हैं तो उसको हटाने का कारण यही हो सकता है कि मंचन के दौरान समय-मर्यादा को, अथवा नट की स्मृति-मर्यादा को ध्यान में रखते हुए उसे काटा जा सकता है। यदि इस श्लोक को मौलिक नहीं मानते हैं तो उसका क्या प्रमाण हो सकता है, वह सोचना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि प्रथम श्लोक में” विश्वासोपगमाद् अभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगाः” कहा गया है, तथा दूसरे श्लोक में भी “नष्टाशङ्का हरिणशिशवो मन्दमन्दं चरन्ति” बताया जाता है। इन दोनों वर्णनों में पुनरुक्ति है, जो नाटक जैसी समयबद्ध कला में असह्य होती है। कालिदास जैसे नाट्यकार शाकुन्तल में कहीं भी पुनरुक्ति नहीं
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करते हैं उसमें दो मत नहीं है। इस दृष्टि से, “अपि च” से सम्बद्ध$^{27}$ दो श्लोकों में से एक प्रक्षिप्त होने की सम्भावना हमें स्वीकारनी चाहिये।
1-2-3 प्रथमांक में संक्षेप का एक अन्य स्थान भी दृष्टिगोचर हो रहा है: शकुन्तला ने जो वल्कल धारण किये हैं उस सन्दर्भ में बंगाली वाचना में, निम्नोक्त संवाद-शृङ्खला प्राप्त होती है:
राजा- (आत्मगतम्) कथमियं सा कण्वदुहिता शकुन्तला। (सविस्मयम्) अहो असाधुदर्शी तत्रभवान् कण्वो य इमां वल्कलधारणे नियुङ्क्ते।
इदं किलाव्याजमनोहरं वपुस्तपःक्लमं साधयितुं य इच्छति।
ध्रुवं स नीलोत्पलपत्रधारया शमीलतां छेतुमृषिर्व्यवस्यति।।
1-17
भवतु, पादपान्तरितो विश्वस्तां तावदेनां पश्यामि। (इत्यपवार्य स्थितः)
शकुन्तला- हला, अणूसूए, अदिपिणद्धेण एदिणा वक्कलेण पिअंवदाए दढं पीडिद म्हि। ता सिढिलेहि दाव णं। (अनसूया शिथिलयति), (सखि अनसूये, अति पिनद्धेनैतेन वल्कलेन प्रियंवदया दृढं पीडितास्मि। तत् शिथिलय तावदेनम्।)
प्रियंवदा- (विहस्य)-एत्थ दाव पओहरवित्थारइत्तअं अत्तणो जोव्वणारम्भं उवालहसु।
(अत्र तावत् पयोधरविस्तारयितृकमात्मनो यौवनमुपालभस्व।)
राजा- सम्यगियमाह-
इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना स्कन्धदेशे
स्तनयुगपरिणाहाच्छादिना वल्कलेन।
वपुरभिनवमस्याः पुष्यति स्वां न शोभां
कुसुममिव पिनद्धं पाण्डुपत्रोदरेण।।
1-18
अथ वा काममप्रतिरूपमस्य वयसो वल्कलं न पुनरलङ्कारश्रियं न पुष्णाति। कुतः
सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं
मलिनपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति।
इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी
किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।। 1-19
- इस सन्दर्भ में मेरा एक लेख द्रष्टव्य है-अभिज्ञाकुन्तल में अपि च से सम्बद्ध प्रक्षेप एवं संक्षेप की पहचान। “धीमहि”, (वॉ-3) सं. दिलीपकुमार राणा, चिन्मय इन्टरनेशनल फाउन्डेशन शोध संस्थान, एरनाकुलम्, 2012, पृ. 76 से 89
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अपि च
कठिनमपि मृगाक्ष्या वल्कलं कान्तरूपं
न मनसि रुचिभंगं स्वल्पमप्यादधाति।
विकचसरसिजायाः स्तोकनिर्मुक्तकण्ठं
निजमिव कमलिन्याः कर्कशं वृन्तजालम्।। १-२०
यहाँ टीकाकार चन्द्रशेखर ने बंगाली पाठानुसारी उपर्युक्त चारो श्लोकों पर टीका लिखी है। किन्तु इसके विपरीत राघवभट्ट द्वारा जिस पर टीका लिखी गयी है वहाँ दो ही (पहला और तीसरा) श्लोक हैं। अतः चर्चा करना आवश्यक हो जाता है कि बंगाली पाठ्यांश में प्रक्षेप है या फिर देवनागरी पाठ में संक्षेप हुआ है? यहाँ सब से पहले कालिदास के “अथवा” निपात के प्रयोग का स्वारस्य विचारणीय है। कालिदास जब एक विचार की प्रस्तुति करते हैं और वहाँ तर्क की दृष्टि से प्रतिपक्ष में भी कोई विरोधी विचार प्रस्ताव के योग्य हो तो उसको तुरन्त “अथवा” निपात से अवतारित कर ही देते हैं। उदाहरण के रूप में-क्व सूर्यप्रभवो वंशः, क्व चाल्पविषया मतिः। इत्यादि (रघुवंशम् 1-2) लिखने के बाद तो, काव्यसर्जन के लिये उद्यत हुए कवि को उस कर्म से विरत ही हो जाना चाहिए। लेकिन हमारे कवि यहाँ तुरन्त “अथवा” निपात का प्रयोग करते हुए पक्षान्तर को प्रस्तुत कर देते हैं कि-अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन् पूर्वसूरिभिः। मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः। (रघुवंशम् 1-4) इस तरह से, सूर्यवंश अतिमहान् होते हुए भी उनके द्वारा रघुवंश का वर्णन कैसे सम्भव है वह लिख देते हैं।²⁸
(बंगाली पाठ के अनुसार) शकुन्तला की सहेलियों के ऐसे उपर्युक्त संवाद को सुन कर वृक्ष के पीछे खड़े दुष्यन्त ने दो (18 एवं 19) श्लोकों का उच्चारण किया है और इन दोनों के बीच में “अथवा” निपात का विनियोग किया है। श्लोक-18 में पहले कहा गया है कि स्तन-युगल के विस्तार को वल्कल से बाँधा गया है, जिससे शकुन्तला का अभिनव शरीर उसी प्रकार अपनी निजी शोभा को नहीं बढ़ाता है जैसे पाण्डु पर्णों के अन्दर बाँधे गये पुष्प शोभा नहीं देते हैं। इतना कह देने के बाद नायक को अपने विचार में रहा एक सूक्ष्म दोष भी दिखायी देता है। अभी जो कहा गया है उसका मतलब तो यही होगा कि शकुन्तला के सौन्दर्य को निखारने के लिए वल्कल नहीं, किन्तु कुछ अन्य वस्त्र होने चाहिए। नायक तुरन्त अपने वाग्दोष को सुधारने के लिए, (स्वोक्तिम् आक्षिपति-अथवेति।) “अथ वा” शब्द का प्रयोग करता हुआ, इस सन्दर्भ में पक्षान्तर प्रस्तुत करता है कि शकुन्तला के वल्कल भी उसकी शोभा नहीं बढ़ाते है ऐसा नहीं है। क्योंकि जो मधुर आकृतिवाले लोग होते हैं उनको तो सब कुछ अच्छा ही लगता है। इस तरह से पूरे नाटक में, जहाँ जहाँ पर
- टीकाकार चन्द्रशेखर ने ऐसे सन्दर्भों के लिए लिखा है कि-स्वोक्तिम् आक्षिपति-अथवेति।
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अमुक विचार को प्रस्तुत करने के बाद पक्षान्तर में दूसरा विचार भी कहना तर्क की दृष्टि से अनिवार्य लगता है कवि ने वहाँ अथवा का प्रयोग किया ही है। अर्थात् “अथवा” निपात से अवतारित किये दो दो श्लोकों का (बंगाली पाठ में) जो भी सन्दर्भ है उसके मौलिक होने की सम्भावना अधिक है। देवनागरी (एवं दाक्षिणात्य) वाचना के पाठ को संक्षिप्त करनेवालों ने ऐसे “अथवा” निपात से जुड़े दो दो श्लोकवाले सन्दर्भों को ही कटौती करने के लिए प्रायः पसन्द किया है। राघवभट्ट के द्वारा स्वीकृत पाठ में उपर्युक्त श्लोक-18 इसी कारण से नहीं मिलता है। तथा “अथवा” से शुरू होनेवाली (बंगाली वाचना के पाठ की) वाक्य-रचना भी बदल दी गयी है। इस तरह से देवनागरी में इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना०। श्लोक का न होना संक्षेपीकरण का परिणाम है ऐसा सिद्ध होता है।
सरसिजमनुविद्धं ...। श्लोक के नीचे जो कठिनमपि ...। श्लोक है, उसे “अपि च” निपात से बाँधा गया है। लेकिन यहाँ सरसिजम्० श्लोक से जो विचार प्रस्तुत किया गया है उसी का पुनरुच्चार दूसरे शब्दों में किया जा रहा है। अतः नाटक में, (वह भी शाकुन्तल जैसे कालिदास के नाटक में) पुनरुक्ति रूप संवाद प्रक्षिप्त होने की पूरी सम्भावना है। टीकाकार चन्द्रशेखर ने भी इस कठिनमपि... वाले श्लोक (1-20) के लिए कहा है कि-पद्यमिदं दाक्षिणात्य-तीरभुक्तीयग्रन्थेषु न दृश्यते। तीरभुक्तीय अर्थात् मैथिली पाठ में, एवमेव देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में भी वह श्लोक संचरित नहीं हुआ है। इससे भी इस श्लोक का मौलिक न होना सिद्ध हो जाता है। इस श्लोक को बंगाली पाठ में प्रक्षिप्त मानना होगा।
1-2-4 देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षेप किये हुए स्थानों के उदाहरणः अभिज्ञानशाकुन्तल में कुत्रचित् वर्णनात्मक स्थान हैं, वहाँ पर दो दो श्लोकों को समुच्चयार्थक “अपि च” अव्यय से सम्बद्ध किया गया है। लेकिन ऐसे स्थान प्रक्षेप एवं संक्षेप के सम्भावित स्थान भी हैं। अतः शाकुन्तल में प्रयुक्त इस समुच्चयार्थक “अपि च” के प्रयोग का स्वारस्य सर्व प्रथम गवेषणीय बनता है। उदाहरण के रूप में भ्रमरबाधा प्रसंग को हम लेते है। यहाँ पर बंगाली एवं मैथिली वाचना में “अपि च” से सम्बद्ध किये गये दो श्लोक हैं:
“राजा-( सस्पृहम् ) यतो यतः षट्चरणोऽभिवर्तते, ततस्ततः प्रेरितवामलोचना। विवर्तितभ्रूरियमद्य शिक्षते भयादकामापि हि दृष्टिविभ्रमम्॥
<p align="right">1-22</p>
अपि च-(सासूयमिव) चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि बहुशो वेपथुमतीं रहस्याख्यायीव स्वनसि मृदु कर्णान्तिकचरः।
46 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
करं व्याधुन्वत्याः पिबसि रतिसर्वस्वमधरं
<p align="right">1-23</p>
वयं तत्त्वान्वेषान् मधुकर, हतास्त्वं खलु कृती।।
इन शब्दों से वर्णित भ्रमरबाधा प्रसंग में, पहले (22) श्लोक में भ्रमर से सन्त्रस्त हो रही शकुन्तला का चित्र खींचा गया है।²⁹ तत्पश्चात् दूसरे (23) श्लोक में शकुन्तला के मुखारविन्द पर घूम रहे ईर्ष्याजनक भ्रमर का चित्र खींचा गया है।³⁰ यहाँ एक ही दृश्य की द्विपाश्र्वी रमणीयता को दो अलग अलग श्लोकों में वर्णित करने की आवश्यकता है। अतः कालिदास ने यहाँ समुच्चयार्थक “अपि च” का प्रयोग करके इन दोनों को परस्पर बाँधा है। नायक के द्वारा भ्रमरबाधा प्रसंग के प्रथम क्षण में नायिका के लोचन का सौन्दर्य प्रेक्षणीय है और इसीलिये कवि ने भी “सस्पृहम्” ऐसी रंगसूचना लिखी है। दूसरे क्षण में, नायक के मन में भ्रमर के प्रति प्रतिस्पर्धी का भाव जाग उठता है, इस लिए उस भाव को भी अभिव्यक्त करने के लिए “अपि च” से दूसरे श्लोक का अवतार किया जाता है। वहाँ पर “सासूर्यम्” ऐसी रंगसूचना दी जाती है। यहाँ दोनों श्लोकों में दृष्टिकोणों का ही भेद होने से उसमें पुनरुक्ति का कोई अवकाश ही नहीं है। अतः दो श्लोकों से प्रस्तुत हुआ यह वर्णन मूलगामी पाठ हो सकता है, जो बंगाली एवं मैथिली वाचना में संचरित होता रहा है। लेकिन समय-मर्यादा की बाधा से पीडित सूत्रधारों ने उन दोनों में से पहले श्लोक को हटा दिया होगा। परिणामतः देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना की पाठपरम्परा ने केवल चलापाङ्गां० वाला श्लोक ही सुरक्षित रखा है।
“अपि च” से सम्बद्ध दो दो श्लोकवाले वर्णन में यदि पुनरुक्ति दिखती है तो वह प्रक्षेप का स्थान हो सकता है। किन्तु यदि एक ही दृश्य में द्विपाश्र्वी रमणीयता वर्णित करने का सन्दर्भ दिखता है तो वहीं पर दोनों श्लोक मौलिक हो सकते हैं और अनुगामी काल में सूत्रधारों द्वारा उनमें से किसी एक को हटा कर संक्षेप किया गया होगा-यह बात भी निश्चित है।
1-2-5 देवनागरी वाचना के पाठ में कटौती का एक अन्य उदाहरण प्रथमांक के समापन प्रसंग में मिल रहा है। राजा ने शकुन्तला को “तत्त्वतः” जान लिया है कि वह उसके (क्षत्रिय के) लिए विवाह-योग्य है। अब दूसरा विचारणीय बिन्दु यह है कि वह उसको पसन्द करती है या नहीं? इस सन्दर्भ में दुष्यन्त ने निम्नोक्त श्लोक कहा है:
राजा- (शकुन्तलां विलोकयन्नात्मगतम्) किं नु खलु यथा वयमस्यामेवमियमप्यस्मान् प्रति स्यात्। अथवा लब्धावकाशा मे मनोवृत्तिः।
वाचं न मिश्रयति यद्यपि मद्वचोभिः
कर्णं ददात्यवहिता मयि भाषमाणे।
- यह श्लोक वंशस्थविल वृत्त में लिखा गया है।
- यह श्लोक शिखरिणी वृत्त में लिखा गया है।
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 47
कामं न तिष्ठति मदाननसम्मुखीयं भूयिष्ठमन्यविषया न तु दृष्टिरस्याः।।
1-30
इस तरह के इङ्गितों से निर्णय हो पाता है कि शकुन्तला भी नायक को चाहती है, तब प्रथमांक का प्रयोजन पूरा हो जाता है। कवि को अब इस अङ्क की समाप्ति कर देनी चाहिए (किसी निमित्त से सभी पात्रों को रंगमंच से विदा कर देना चाहिए) ऐसा समझ कर शिकार के निमित्त से दौड़ आये राजा और सारथि से जो अङ्क शुरू किया था, उसी सन्दर्भ का अनुसन्धान करते हुए निम्नोक्त क्रम से समापन किया जाता है:
(नेपथ्ये)
भो भोस्तपस्विनः। तपोवनसन्निहितसत्त्वरक्षणाय सज्जीभवन्तु भवन्तः। प्रत्यासन्नः किल मृगयाविहारी पार्थिवो दुःषन्तः।
तुरगखुरहतस्तथा हि रेणुर्विटपनिषक्तजलार्द्रवल्कलेषु। पतति परिणतारुणप्रकाशः शलभसमूह इवाश्रमद्रुमेषु।।
1-31
राजा- (स्वगतम्) अहो धिक्, कथं मदन्वेषिणः सैनिकास्तपोवनमभिरुन्धन्ति।
(पुनर्नेपथ्ये)
भो भोस्तपस्विनः। पर्याकुलीकुर्वन् वृद्धस्त्रीकुमारकान् एष प्राप्तः।
तीव्राघातादभिमुखतरुस्कन्धभग्नैकदन्तः प्रौढाकृष्टव्रततिवलयासञ्जाज्जातपाशः । मूर्तो विघ्नस्तपस इव नो भिन्नसारङ्गयूथो धर्मारण्यं विरुजति गजः स्यन्दनालोकभीतः।।
1-32
(सर्वाः श्रुत्वा ससंभ्रममुत्तिष्ठन्ति।)
राजा- अहो धिक्, कथमपराद्धस्तपस्विनामस्मि। भवतु तावत्, प्रतिगच्छामि।
सख्यौ- महाभाअ, इमिणा हत्थिसंभमेण पज्जाउलाओ म्ह। ता अणुजाणाहि णो उडअगवणे। (महाभाग, अनेन हस्तिसंभ्रमेण पर्याकुलाः स्मः। तदनुजानीहि नः उटजगमने)
अनसूया- (शकुन्तलां प्रति) हला सउन्तले, आउला अज्जा गोदमी भविस्सदि। ता एहि। सिग्धं एक्कत्थाओ होम्ह। (सखि शकुन्तले, आकुला आर्या गौतमी भविष्यति। तदेहि शीघ्रम् एकास्थाः भवामः।) ।।
मृगयाविहारी राजा तीव्र वेग से दौड़ते मृग का अनुसरण करता हुआ कण्वाश्रम तक
48 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
पहुँचा और भाग्यवशात् शकुन्तला में अनुरक्त भी हुआ। किन्तु वह मृगया विहार के लिए सेनापति सहित सैन्य भी साथ में लेकर निकला था। अतः वह सैन्य राजा का अनुसरण करता हुआ, बल्कि राजा का अन्वेषण करता हुआ अब कण्व के आश्रम के पास पहुँच रहा है। यहाँ जो संवाद-शृङ्खला प्रस्तुत हुई है वह मननीय है। उसमें भाव-प्रतिभाव की जो आनुक्रमिकता है वह दुष्यन्त का एक अच्छे संवेदनशील व्यक्ति के रूप में परिचय देनेवाली है। किसी आश्रमवासी ने दूर से देखा है कि दुष्यन्त का सैन्य आश्रम की ओर आगे बढ़ रहा है। उसने (नेपथ्योक्ति से) तपस्वियों का आह्वान किया है कि आश्रम के पशुओं की रक्षा के लिए सब सन्निहित हो जायें। सैन्य के घोड़ों की खुर से आहत हुई धूलि चारों ओर उड़ रही है और भीगे वल्कल वस्त्रों पर वह गिर रही है, ऐसा श्लोक 31 में कहा जाता है। इसको सुनते ही दुष्यन्त ने प्रतिभाव व्यक्त किया कि मुझे ढूँढ़ते हुए आ रहे मेरे सैनिक क्या तपोवन को घेरे डाल रहे हैं? तब फिर से नेपथ्य से कहा जाता है कि-वृद्ध, स्त्री और छोटे बालकों को पर्याकुलित करता हुआ कोई हस्ती भी भागता हुआ वहाँ आ रहा है। उस हाथी की घबराहट का कारण भी कहा जाता है कि राजा के रथ को देख कर वह डरा हुआ है।$^{31}$ इस वाक्य को सुन कर शकुन्तलादि स्त्रियाँ संभ्रम के साथ एकदम खड़ी हो जाती हैं, लेकिन राजा को एक क्षण में मालूम हो जाता है कि उसने तपस्वियों का अपराध कर दिया है। यह उसकी संवेदनशीलता का परिचायक है। किन्तु जो देवनागरी वाचना का पाठ है वह संक्षेपीकरण के दोष से दूषित हो गया है, जिसमें नायक उपर्युक्त दोनों श्लोकों को सुनने के बावजूद भी कोई संवेदना का अनुभाव नहीं दिखाता है। देवनागरी वाचना के पाठ में पूर्वोक्त दोनों श्लोक सुरक्षित रखे गये हैं। किन्तु इनके आगे पीछे जो गद्य वाक्य है उसमें कटौती और परिवर्तन किया गया है जिसके कारण यह अन्तिम अंश भाव-प्रतिभाव के प्रदर्शन की नाटकीयता से दूर हट जाता है। उपर्युक्त बंगाली पाठ से तुलना करने के लिए निम्नोक्त देवनागरी पाठ द्रष्टव्य है:-
(नेपथ्ये) भो भोस्तपस्विनः, संनिहितास्तपोवनसत्त्वरक्षायै भवत। प्रत्यासन्नः किल मृगयाविहारी पार्थिवो दुष्यन्तः।
तुरगखुरहतस्तथा हि रेणुर्विटपविषक्तजलार्द्रवल्कलेषु।
पतति परिणतारुणप्रकाशः शलभसमूह इवाश्रमद्रुमेषु।।
(राघवभट्टः, 1-28)
अपि च-
तीव्राघातप्रतिहततरुः स्कन्धलग्नैकदन्तः
पादाकृष्टव्रततिवलयासङ्गसंजातपाशः ।
- धर्मारण्यं विरुजति गजः स्यन्दनालोकभीतः।
अभिज्ञानशकुन्तलम्
प्रस्तावना
49
मूर्त्तो विघ्नस्तपस इव नो भिन्नसारङ्गयूथो
धर्मारण्यं प्रविशति गजः स्यन्दनालोकभीतः ।।
(राघवभट्टः, 1–29)
(सर्वाः कर्णं दत्वा किंचिदिव संभ्रान्ताः।)
राजा–(आत्मगतम्) अहो धिक्। पौरा अस्मदन्वेषिणस्तपोवनमुपरुन्धन्ति। भवतु, प्रतिगमिष्यामस्तावत्।
यहाँ दोनों श्लोकों को “अपि च” से बाँधा है, लेकिन उन दोनों के बीच में नायक का प्रतिभाव व्यक्त करनेवाले वाक्यों की कटौती कर देने से उसका संवेदनशील व्यक्तित्व प्रकट नहीं हो पाता है। यह संक्षेपीकरण का दुष्परिणाम है, जो संक्षेपीकरण मानने का आधार भी है।
1–2–6 देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षेपीकरण का एक अन्तिम उदाहरण शकुन्तला के निर्गमन प्रसंग में मिल रहा है:-राजा ने जब कहा कि आप सब के दर्शन से ही मैं पुरस्कृत हुआ हूँ, अतः मुझसे क्षमायाचना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। तीनों सहेलियाँ साथ में रंगमंच से निकल रही हैं, तब शकुन्तला कहती है कि
अहिणवकुससूइपरिक्खदं मे चलणं कुरुवअसाहापरिलग्गं च मे वक्कलं। ता पडिवालेध मं जाव णं मोआवेमि।।
(अभिनवकुशसूचिक्षतं मे चरणं कुरबकशाखापरिलग्नं मे वल्कलम्। तावत् प्रतिपालयतम् माम् यावत् एनं मोचयामि।) इसके बाद रंगसूचना है–इति राजानमवलोकयन्ती सह सखीभ्यां निष्क्रान्ता।। इस बंगाली पाठ में शकुन्तला के वाचिक संवाद के साथ साथ रंगसूचना भी रखी गयी है। किन्तु देवनागरी वाचना के पाठ में शकुन्तला के वाचिक संवाद को हटा कर, केवल रंगसूचना दी गयी है। जैसे कि “शकुन्तला राजानमवलोकयन्ती सव्याजं विलम्ब्य सह सखीभ्यां निष्क्रान्ता”। इस परिवर्तन से वाचिक उक्ति का संक्षेप किया गया है। यहाँ, देवनागरी वाचना में, केवल अभिनय से ही नायिका ने दुष्यन्त के प्रति अनुराग प्रदर्शित किया है।
अभिज्ञानशाकुन्तल के मूल पाठ में से अनेक श्लोक एवं गद्य वाक्यों को काट कर देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में संक्षेपीकरण किया गया है। यद्यपि इसमें प्रथम दृष्टि से तो, मंचन के दौरान मर्यादित समय की पाबंदी दृष्टिगोचर हो रही है। किन्तु ऐसा करने से नाटक के मूल पाठ में विचार की जो प्रवाहिता होती है वह खण्डित होती है और उससे कदाचित् नायक आदि के व्यक्तित्व का सही चित्र भी दूषित हो जाता है, जो प्रकट रूप से काव्य को हानि पहुँचाता है।
कालिदास ने अपने काव्यों में अभिव्यक्ति का एक विशिष्ट स्वरूप विकसित करते
50 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
हुए “अथवा” निपात का जो प्रयोग किया है उसका स्वारस्य समझ लेने से ऐसे संक्षेपों को पहचाना जाता है। एवमेव, बंगाली वाचना का जो पाठ लम्बा होते हुए भी मौलिकता के नजदीक है। उसमें भी कुत्रचित् प्रक्षेप होने के कारण वह भी मौलिकता से दूर हटता जा रहा है। ऐसी स्थिति में, “अपि च” जैसे निपातों के प्रयोग का स्वारस्य ढूँढने से / सोचने से ऐसे प्रक्षेपों की पहचान की जा सकती है।
2-1-1 बंगाली पाठानुसारी द्वितीयाङ्क के एक प्रासंगिक एवं बहुत सुन्दर श्लोक का संक्षेप देवनागरी में किया गया है: राजा के साथ आया विदूषक मृगयाविहार से सन्त्रस्त है और घर वापस जाने के लिए बड़ा उत्सुक है। उसे शकुन्तला विषयक बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं है। अतः वह राजा की प्रेमाविष्ट दशा पर रोक लगाना चाहता है। वह राजा को कहता है कि-चूँकि वह (शकुन्तला) एक तपस्वी की (अर्थात् ब्राह्मण की) कन्या है, इस लिए आपके लिए तो अभ्यर्थनीय नहीं हो सकती है। तो फिर उसे देखने से क्या फायदा? अब उसके प्रत्युत्तर में राजा ने जो कहा है वह बहुत सतर्क है एवं नायक की सौन्दर्यनिष्ठ दृष्टि का परिचायक है। इस प्रसंग से सम्बद्ध बंगाली वाचना का पाठ निम्नोक्त है:
विदूषकः- (स्वगतम्) भोदु। ण से पसरं वड्डाइस्सं। (प्रकाशम्) भो जदो सा तावस-कण्णआ अणब्भत्थणीआ, तदो ताए किं दिट्ठाए। (भवतु, नास्य प्रसरं वर्धयिष्यामि। भोः यतः सा तापसकन्यका अनभ्यर्थनीया, ततः तया किं दृष्ट्या।)
राजा- मूर्ख, निराकृतनिमेषाभिर्नेत्रपङ्क्तिभिरुन्मुखः । नवामिन्दुकलां लोकः केन भावेन पश्यति।। 2-8
न च परिहार्ये वस्तुनि दुःषन्तस्य मनः प्रवर्तते। विदूषकः- ता कधेहि। (तत्कथय।) राजा- ललिताप्सरोभवं किल मुनेरपत्यं तदुज्झिताधिगतम्। अर्कस्योपरि शिथिलं च्युतमिव नवमालिकाकुसुमम्।। 2-9
यहाँ राजा ने शकुन्तला तापसकन्या होने से अभ्यर्थनीय न हो तो भी, वह सौन्दर्यशालिनी होने से भी द्रष्टव्य तो है ही उसका बहुत प्रतीतिकर तर्क श्लोक 2-8 में प्रस्तुत किया है। नवीन इन्दुकला भी कदापि प्राप्य नहीं होती है, फिर भी संसार के सभी लोग उसे अति स्पृहणीय समझ कर ही निरन्तर देखते रहते हैं। उसी तरह से शकुन्तला भी तापसकन्या होने
| अभिज्ञानशकुन्तलम् | प्रस्तावना | 51 |
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के कारण यदि अभ्यर्थनीय न हो तो भी निश्चित रूप से द्रष्टव्य तो है ही। दुष्यन्त ने एक दृष्टान्त के माध्यम से सिद्ध कर दिया कि सौन्दर्यशालिनी होने मात्र से स्पृहणीय एवं अभ्यर्थनीय है। किन्तु दृष्टान्त में इन्दुकला रूप एक चीज ऐसी है जिसकी स्पृहा करना सब के लिये मान्य है, लेकिन दार्ष्टान्तिक के रूप में रही शकुन्तला तो ऐसी कोई चीज नहीं है कि जिसकी स्पृहा कोई भी कर सकता है। शकुन्तला जैसी मनुलता को प्राप्त करने के लिये धर्म की अनुज्ञा भी होनी अनिवार्य है। इस लिए राजा ने “ललिताप्सरसंभवम्०” इत्यादि शब्दों से वह शकुन्तला दुष्यन्त जैसे क्षत्रिय से विवाह के योग्य भी है यह स्पष्ट किया है।। अर्थात् बंगाली वाचना का पूरा पाठ्यांश शकुन्तला की अभ्यर्थनीयता को उभयथा सिद्ध करता है, अतः मौलिक प्रतीत होता है। लेकिन देवनागरी (और दाक्षिणात्य) पाण्डुलिपियों की परम्परा में” निराकृतनिमेषाभिः०” (श्लोक-8) हटाया गया है। तथा इस प्रसंग के पाठ्यांश का नवीन संस्कार करके इस तरह से अवतारित किया गया हैः
(राघवभट्टानुसारी देवनागरी पाठ)
विदूषकः- (स्वगतम्) होदु, से अवसरं ण दइस्सं। (प्रकाशम्) भो वअस्स, ते तावसकण्णआ अब्भत्थणीआ दीसदि। (भवतु, अस्यावसरं न दास्ये। भो वयस्य, ते तापसकन्याभ्यर्थनीया³² दृश्यते।)
राजा- सखे, न परिहार्ये वस्तुनि पौरवाणां मनः प्रवर्तते।
सुरयुवतिसंभवं³³ किल मुनेरपत्यं तदुज्झिताधिगतम्।
अर्कस्योपरि शिथिलं च्युतमिव नवमालिकाकुसुमम्।। (2-8)
यहाँ पर निराकृतनिमेषाभिः० वाला श्लोक हटा कर, मूल पाठ का संक्षेपीकरण किया गया है। किन्तु ऐसा पाठ बनाने से राजा ने विदूषक को शकुन्तला की जो अभ्यर्थनीयता सिद्ध करने के लिए कहा है, वह अपर्याप्त दिखता है। क्योंकि दर्शकों को याद होगा कि राजा ने पहले विदूषक को ऐसा कहा था कि यदि तुम ने शकुन्तला को नहीं देखा है तो तुम्हें आँखें होने का कोई फल मिला ही नहीं है। अर्थात् “आश्रमललामभूता” शकुन्तला तो एक नवीन इन्दुकला समान है। जो न केवल विदूषक को, लेकिन सब को अवश्य देखनी चाहिए। अतः राजा के मूल प्रस्ताव को याद किया जायेगा तो देवनागरी पाठ की अपूर्णता साफ दिखायी देगी।
- बंगाली पाठ में “अनभ्यर्थनीया” शब्द था, उसके स्थान पर देवनागरी में “अभ्यर्थनीया” ऐसा पाठभेद किया गया है।
- बंगाली पाठ में “ललिताप्सरसंभवम्” शब्द के द्वारा ललित अप्सरा (मेनका) में पैदा हुई मुनि (विश्वामित्र) की पुत्री के रूप में शकुन्तला की पहचान दी गयी है। लेकिन देवनागरी में “सुरयुवतिसंभवम्” शब्द के द्वारा देवों की वाराङ्गना (मेनका) में पैदा हुई-ऐसा कहा जाता है, जिसमें सुरुचि का भङ्ग हो रहा है। इससे भी देवनागरी पाठ विकृति का परिणाम है ऐसा सिद्ध होता है।
52 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
3-1-0 अभिज्ञानशाकुन्तल की विभिन्न वाचनाओं में तृतीयांक का पाठ ही सब से अधिक विवादास्पद है। लघुपाठ परम्परा में, अर्थात् देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में तीसरे अङ्क का कलेवर 21 से 23 या 24 श्लोक पर्यन्त सीमित है। बृहत्पाठ परम्परा में, अर्थात् बंगाली वाचना के पाठ में तीसरे अङ्क का कलेवर 40 से 41 श्लोक पर्यन्त सुविकसित स्वरूप वाला है। अतः यह गवेषणीय बनता है कि कालिदास-प्रणीत मूल पाठ में सूत्रधारों के द्वारा कुछ नये श्लोकों का प्रक्षेप किया गया होगा, या मूलतः पाठ प्रलम्ब ही था और अज्ञात सूत्रधारों ने मंचन के दौरान उसमें संक्षेप करके लघुपाठ बनाया है, जो देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ है?
यद्यपि डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने बंगाली वाचना का पाठ ही प्राचीनतर (10वीं शती का) है ऐसा सिद्ध किया है और इसी कारण से वही पाठ अधिक श्रद्धेय मानना उपयुक्त समझा है,³⁴ किन्तु पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ कोई भी पाठ अन्यान्य प्रमाणों से प्राचीनतर सिद्ध होने मात्र से उसको ही सब से अधिक श्रद्धेय मान लेना सर्वथा उचित नहीं है। बंगाली वाचना के समीक्षित पाठ में भी, उच्चतर समीक्षा करने से अनेक प्रक्षेप मिल सकते हैं और कुत्रचित् उसमें संक्षेप भी दिखते हैं जिसकी चर्चा निम्नोक्त पृष्ठों में की जाती है।
3-1-1 तृतीयाङ्क के बंगाली वाचनानुसारी पाठ में जो जो प्रक्षेप हैं इनका क्रमशः निरूपण किया जाता है: अङ्क के आरम्भ में दुष्यन्त का प्रवेश होता है। नायक मदनावस्था में है ऐसा कहा गया है, इस स्थिति में वह कुल मिला कर नव श्लोकों से भरा संवाद प्रस्तुत करता है। इनमें से दो श्लोक प्रक्षिप्त हैं ऐसा कृति के आन्तरिक प्रमाणों से सिद्ध होता है। जैसे-
दुष्यन्तः- भगवन् मन्मथ, कुतस्ते कुसुमायुधस्य सतस्तैक्ष्ण्यमेतत्। (स्मृत्वा) आं ज्ञातम्।
अद्यापि नूनं हरकोपवह्निस्त्वयि ज्वलत्यौर्व इवाम्बुराशौ।
त्वमन्यथा मन्मथ मद्विधानां भस्मावशेषः कथमेवमुष्णः।। (3-3)
इस श्लोक में शङ्कर के कोप से मन्मथ (कामदेव) भस्मावशेष हुआ था ऐसा कुमारसम्भवोक्त सन्दर्भ अनुस्यूत है। अतः यह श्लोक कालिदास-प्रणीत होने की सम्भावना दिखती है। किन्तु इसी अङ्क में हम जैसे जैसे आगे बढ़ते हैं तो इसी तरह का एक दूसरा श्लोक भी दृष्टिगोचर होता है:
- One must not think in terms of what is truly Kalidasian or non-Kalidasian, but what the anthologists, poeticists, & literature of India cite from the text of Kalidasa. If evidences testify to the existence of the alleged enlarged version before the 10th century, it would be proper for us to in the 20th cent. to accept the same as more authentic than any interpretative reconstruction. D.K. Kanjilal, Introductory chapter 3, page 132.
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 53
दुःषन्तः–(शकुन्तलाया हस्तमादाय) अहो स्पर्शः।
हरकोपाग्निदग्धस्य दैवेनामृतवर्षिणा।
प्ररोहः संभृतो भूयः किंस्वित् कामतरोरयम्।। (3-34)
शकुन्तला–(स्पर्शं रूपयित्वा) तुवरदु, तुवरदु अज्जउत्तो।।
इन दोनों श्लोकों में “हरकोपवह्निः” एवं “हरकोपाग्निः” शब्दों में स्पष्ट पुनरुक्ति है। अतः दोनों में से कोई एक प्रक्षिप्त होगा ही। तीसरे अङ्क के मध्य भाग में आये हुए 3-34 श्लोक का सन्दर्भ यदि देखा जाय तो दुष्यन्त ने शकुन्तला का हाथ अपने हाथों में लिया है और वह शकुन्तला को (कङ्कण के रूप में) मृणालतन्तु का वलय पहनाने जा रहा है। तब शकुन्तला के हाथ का रोमांचकारी प्रथम स्पर्शानुभव करता हुआ 34 वाँ श्लोक बोलता है। उसको लगता है कि हरकोपाग्नि से भस्मीभूत हुए कामतरु का मानों एक प्ररोह (अङ्कुर) ही शकुन्तला के हाथ के रूप में प्रस्फुटित हुआ है। यह श्लोक इस प्रसंग में सर्वथा सुसंगत है। लेकिन जो 3-3 श्लोक है वह भले ही मदनावस्था में प्रविष्ट हो रहे नायक के मुख में रखा गया है इस लिए प्रथम दृष्टि में उचित लगता हो, फिर भी इसी श्लोक के नीचे श्लोक 4 के वर्णन को देखते हैं तब उसी विचार की पुनरुक्ति सुनायी जा रही है। अर्थात् श्लोक 3-3 के हरकोपवह्नि शब्दों की पुनरुक्ति 3-34 में हो रही है, तथा कामदेव को कोसने की प्रवृत्ति 3-3 से करने के बाद 3-4 में भी पुनरावृत्त की जा रही है। अतः 3-3 का प्रक्षिप्त होना सिद्ध हो जाता है। यहाँ किसी के मन में ऐसा प्रश्न उठ सकता है कि 3-3 में प्रस्तुत हुए विचार की यदि 3-4 में पुनरावृत्ति होती है, तो क्यों 3-4 को ही प्रक्षिप्त न मान लिया जाय? इस शङ्का का समाधान यह है कि श्लोक 3-4 को जो 3-5 के साथ “अथवा” निपात से बाँधा गया है, वह एकदम उचित है। 3-4 में नायक अपनी मदनावस्था के उपलक्ष्य में चन्द्रमा और कामदेव को एक साथ में उलाहना देता है कि तुम दोनों का शीतरश्मित्व और कुसुमशरत्व होना बेकार है। क्योंकि चन्द्रमा शीतकिरणों से भी अग्नि-वमन कर रहा है, और कामदेव कुसुमबाणों को वज्र बना रहे हैं। किन्तु इतना कहने के बाद नायक को तुरन्त अपने कहने में दोष भी प्रतीत होता है। चन्द्रमा की किरणों से एवं कामदेव के बाणों से मिलनेवाला कष्ट तो वाञ्छनीय है, यदि वह कष्ट मदिरायतनयना शकुन्तला को लेकर मिल रहा हो तो। कवि कालिदास की यह शैली रही है कि वे एक विचार की प्रस्तुति करने के बाद, उस उक्ति में रहे वाग्दोष को दूर करने के लिए, पक्षान्तर में रहे अदोष, एवं यथार्थ विचार की प्रस्तुति करने लिए “अथवा” निपात का प्रयोग करते हैं। मतलब कि 3-4 और 3-5 के बीच में जो “अथवा” निपात का उपयोग हुआ है वह श्लोक 3-4 की मौलिकता को सिद्ध करता है। अतः 3-3 को ही प्रक्षिप्त कहना उचित होगा।
यहाँ कहने का तात्पर्य यही है कि तृतीयांक के आरम्भ में नायक के मुख में रखे गये उपर्युक्त इन तीन श्लोकों को, जो “अपि च” एवं “अथवा” निपातों से बाँधे गये हैं, उनकी
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विचारसातत्य तथा पुनरुक्ति आदि के मानदण्ड से परीक्षा की जाय तो 3-3 का प्रक्षिप्त होना दिखायी दे रहा है। एक सिद्धान्त के रूप में कहा जाय तो बंगाली वाचना में “अपि च” का प्रयोग प्रक्षेप का प्रसव-स्थान हो सकता है, और “अथवा” का प्रयोग होने पर वह देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षेप करने का अनुकूल स्थान बन गया है। राघवभट्ट के द्वारा मान्य किये गये पाठ में “अद्यापि नूनं हरकोपवह्निः०” (3-3) श्लोक नहीं दिया गया है। तथा “अनिशमपि मकरकेतुर्मनसो०” (3-5) श्लोक को भी हटाया गया है³⁵।।
3-1-2 बंगाली पाठ के तृतीयाङ्क में श्लोक-7 भी प्रक्षिप्त सिद्ध होता है। जैसे कि-दुःषन्त मदनावस्था में शकुन्तला के पास पहुँचने के लिए उसे ढूँढता है और अनुमान लगाता है कि इस बालपादपों वाली वीथी से गुजरकर वह सुतनु अभी अभी गयी होगी। वह कैसे? तो
संमीलन्ति न तावद् बन्धनकोशास्तयावचितपुष्पाः।
क्षीरस्निग्धाश्चामी दृश्यन्ते किसलयच्छेदाः।।
3-7
इस श्लोक में कहा गया है कि-शकुन्तला ने जिस पौधे से पुष्पचयन किया है उसके बन्धनकोश अभी बंद नहीं हुए हैं। तथा किसलय के छेदों में से अभी भी दूध निकलने से वे स्निग्ध दिख रहे है। इससे नायक को लगता है कि शकुन्तला थोड़ी देर पहले ही यहाँ से गयी है। लेकिन यह श्लोक आन्तरिक सम्भावना की दृष्टि से देखा जायेगा तो मौलिक नहीं है क्योंकि कवि ने शकुन्तला का वनस्पति-प्रेम वर्णित करते हुए कहा है कि उसको सभी वृक्ष एवं लताओं के प्रति सहोदर जैसा स्नेह है। और, उसको मण्डन करना प्रिय होते हुए भी वह कभी भी वृक्षों से एक पल्लव भी नहीं तोड़ती थी।³⁶ इसी कृति में शकुन्तला का जो प्रकृति-प्रेम प्रदर्शित किया गया है उसके अनुसार तो वह रास्ते में आते-जाते पुष्पों और किसलयों को तोड़ती हुई नहीं जा सकती है। इससे प्रमाणित होता है कि उपर्वनिर्दिष्ट 3-7 श्लोक प्रक्षिप्त ही है।
3-1-3 आन्तरिक सम्भावना के मानदण्ड से सोचा जाय तो इस अङ्क का श्लोक 11 भी प्रक्षिप्त कहना पड़ेगा। अनसूया शकुन्तला की मदनावस्था को देख कर बोलती है कि शकुन्तला को जो अङ्गसंताप हो रहा है वह बलवान् है। अतः शकुन्तला को कुछ पूछना चाहती है। यह सुन कर दुष्यन्त को भी मन में होता है कि शकुन्तला को पूछ लेना ही चाहिए। क्योंकि
- श्री पी.एन. पाटणकर के द्वारा सम्पादित किये गये देवनागरी के शुद्धतर पाठ में 3-3 एवं 3-5 श्लोकों को मान्य किया गया है। अर्थात् वे पुनरुक्तियुक्त प्रक्षिप्त श्लोक को नहीं पहचान पाये हैं।
- नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्। चतुर्थाङ्क, श्लोक 11
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 55
शशिकरविशदान्यस्यास्तथा हि दुःसहनिदाघशंसीनि।
<div align="right">3-11</div>
भिन्नानि श्यामिकया मृणालनिर्माणवलयानि।।
“शकुन्तला ने अपने हाथों में मृणालतन्तुओं से बनाये वलय पहने हैं वह चन्द्रकिरण जैसे शुभ्र होते हुए भी श्याम हो गये हैं, जो शकुन्तला के अङ्गसंताप को कह रहे हैं।” इस श्लोक में “मृणालनिर्माणवलयानि” शब्द बहुवचन में है, वह पूर्व श्लोक (3-10) के “प्रशिथिलितमृणालैकवलयम्” के साथ असम्बद्ध सिद्ध होता है। पहले जब कहा जाता है कि शकुन्तला के हाथ में मृणाल का एक वलय प्रशिथिल है, तब तुरन्त ही अनुगामी श्लोक में कहा जाय कि शकुन्तला ने मृणाल से बने अनेक वलय पहने हैं, तो वह वदतोव्याघात है। अतः 3-11 श्लोक को प्रक्षिप्त मानना ही उचित होगा। इस नाट्यकृति के प्रत्येक शब्द, वाक्य को स्मृतिपट पर रखते हुए पुनरुक्ति या परस्पर विसंगतता है या नहीं, इसका यदि विचार किया जायेगा तो अनेक प्रक्षिप्त स्थानों को पहचाना जा सकेगा।
3-1-4 तृतीयांक में श्लोक 16 एवं 17 को अवतारित करने के लिए “अपि च” निपात का विनियोग किया गया है। अतः इन दोनों की भी समालोचना करणीय है।
राजा-
अयं स ते तिष्ठति संगमोत्सुको
<div align="right">3-16</div>
विशङ्कसे भीरु यतोऽवधीरणाम्।
लभेत वा प्रार्थयिता न वा श्रियं
श्रियो दुरापः कथमीप्सितो भवेत् ।।
अपि च-
अयं स यस्मात्प्रणयावधीरणाम्
<div align="right">3-17</div>
अशङ्कनीयां करभोरु शङ्कसे।
उपस्थितस्वां प्रणयोत्सुको जनो
न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत् ।।
इन दोनों श्लोकों में “अवधीरणा” शब्द की पुनरुक्ति ही विचार करने को प्रेरित करती है कि इन में से कोई एक श्लोक मौलिक नहीं होगा। काव्यशास्त्रियों ने (और इनका अनुसरण करनेवाले टीकाकारों ने) श्लोक 3-16 में उद्देश्य-प्रतिनिर्देश्य का प्रक्रमभङ्ग³⁷
³⁷. यहाँ (त्वं श्रीः) विशङ्कसे-यह उद्देश्य दल है, किन्तु तृतीय चरण में प्रतिनिधैर्य के रूप में प्रार्थयिता (नरः) है। इसको प्रक्रमभङ्ग दोष कहते हैं जिसके कारण इसका अर्थ समझना थोड़ा विलम्बित हो जाता है।
56 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
हो रहा है, जो एक काव्यदोष है ऐसा कहा है। तथा पूर्वापर चरणों का व्यत्यय करके पाठ प्रस्तुत करने का सुझाव दिया है। और “कथं न लभ्येत नरः श्रियार्थितः” ऐसा नया पाठ भी सूचित किया है, जिससे पर्यायप्रक्रमभङ्ग का दोष नहीं आयेगा। इस तरह काव्यदोष के परिहार करने के दो दो सुझाव प्रस्तुत करने के बाद भी किसी काव्यरसिक व्यक्ति ने तीसरे उपायान्तर के रूप में एक नया श्लोक ही लिख कर उसे मूल पाठ में “अपि च” के द्वारा प्रक्षिप्त कर देने की चेष्टा की है। “अवधीरणा” शब्द की पुनरुक्ति के साथ जो दूसरा श्लोक हमारे सामने आ रहा है उसका राज्ञ सम्भवतः उपर्युक्त काव्यदोष है। इस दूसरे श्लोक की मौलिकता की आशङ्का को दृढ करनेवाला “प्रणय” शब्द है, जो दो बार इसमें प्रयुक्त हुआ है। पूर्व श्लोक में संगम की उत्सुकता व्यक्त करने के बाद प्रणय की उत्सुकता दिखाना वह भी एक तरह का क्रमभङ्ग ही है। “अपि च” निपात से बाँधे गये श्लोक से ऐसी अपेक्षा रहती है कि वह कुछ नये अर्थ, नये दृश्य का समुच्चय प्रस्तुत करे। प्रणय एक लम्बी राह है, जिसमें संगम अन्तिम लक्ष्य है। अतः संगमोत्सुक बोल देने के बाद नायक अपने को प्रणयोत्सुक कहे वह अनुचित लगता है। सारभूत बात यही निकलती है कि “अपि च” से प्रस्तुत हुआ दूसरा श्लोक प्रक्षिप्त है।
3-1-5 बंगाली वाचना के तृतीयांक का नाम “शृङ्गारभोग” रखा गया है, जिसमें दुःषन्त-शकुन्तला का गान्धर्वविवाह वर्णित है। इसमें दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपने कुल की प्रतिष्ठा के रूप में घोषित किया है। इस सन्दर्भ में जो संवादशृङ्खला मिलती है वह निम्नोक्त हैः
प्रियंवदा- (जनान्तिकम्) अणूसूए, पेक्ख पेक्ख, मेहवादाहदं विअ गिम्हे मोरिं खणे खणे पच्चाअदजीविदं पिअसहिं। (अनसूये, प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व मेघवाताहतामिव ग्रीष्मे मयूरीं क्षणे क्षणे प्रत्यागतजीवितां प्रियसखीम्।)
शकुन्तला-हला, मरिसावेध लोअवालं जं अम्हेहिं बीसद्धपलाविणीहिं उवआरादिक्कमेण भणिदं। (सख्यौ, मर्षयतं लोकपालं यदस्माभिः विस्रब्धप्रलापिनीभिः उपचारातिक्रमेण भणितम्।)
सख्यौ- (सस्मितम्) जेण तं मन्तिदं सो ज्जेव मरिसावेदु। अणस्स को अच्चओ। (येन तत् मन्त्रितं सः एव मर्षयतु। अन्यस्य कः अत्ययः।)
शकुन्तला-अरिहदि क्खु महाराओ इमं पच्चक्खवअणं विसोढुं। परोक्खं वा किं ण मन्तीअदि। (अर्हति खलु महाराजः इदं प्रत्यक्षवचनं विषोढुं, परोक्षं वा किं न मन्त्रयते।)
राजा- (सस्मितम्)
अपराधमिमं ततः सहिष्ये यदि रम्भोरु तवाङ्गसङ्गसृष्टे।
कुसुमास्तरणे क्लमापहं मे सुजनत्वादनुमन्यसेऽवकाशम्॥
3-24
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 57
प्रियंवदा - ण एत्तिकेण उण तुट्टी भविस्सदि। (नैतावता तुष्टिः भविष्यति।)
शकुन्तला - (सरोषमिव) विरम दुल्ललिदे। एदावत्थं गदाए वि मए कीळसि। (विरम दुर्ललिते। एतदवस्थां गतयापि मया क्रीडसि।)
यहाँ दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपनी कुलप्रतिष्ठा के रूप में प्रतिज्ञात किया तब उसकी दोनों सहेलियाँ पूर्ण रूप से आश्वस्त हो जाती हैं और शकुन्तला भी बहुत हर्षित होती है। अब वह अपनी सहेलियों को लोकपाल से क्षमायाचना करने को कहती है क्योंकि अनसूया ने राजा को कहा था कि-महाराज, बहुवल्लभा खलु राजानः श्रूयन्ते। तत यथा इयं नः प्रियसखी बन्धुजनशोचनीया न भवति, तथा करिष्यसि। इन शब्दों के द्वारा अनसूया ने राजा के प्रति अन्यत्र प्रेमासक्त होने की जो सूक्ष्म आशङ्का व्यक्त की थी वह शकुन्तला की दृष्टि में उचित नहीं थी। अतः वह राजा से क्षमा माँगने को कहती है। किन्तु सहेलियाँ शकुन्तला को ही क्षमा माँगने को कहती हैं क्योंकि "हला, अलं वाम् अन्तःपुरविरहपर्युत्सुकेन राजर्षिणा उपरोधेन।" ऐसा कहकर शकुन्तला ने ही पहले राजा के प्रति उपचार का अतिक्रमण किया था। अतः जिसने उपचार का भङ्ग किया हो वही क्षमा माँगे। तब शकुन्तला महाराज दुष्यन्त को कहती है कि जो प्रत्यक्ष वचन (मुँह पर) कहा गया है उसे नजरअंदाज कर लीजिए क्योंकि लोग परोक्ष में तो ऐसी कई बातें बोलते रहते हैं। इस संवाद की पङ्क्तियाँ उपरि भाग में दी गयी हैं। किन्तु वह शकुन्तला के उदात्त चरित से बिलकुल विपरीत है। किसी भी व्यक्ति की पीठ के पीछे कुछ भी बोला जा सकता है ऐसा कहनेवाली शकुन्तला उच्च कोटि की नायिका सिद्ध नहीं हो सकती है। साथ में, राजा ने इस प्रसंग में जो श्लोकबद्ध प्रतिभाव दिया है वह किसी भी अभिरूपभूयिष्ठा परिषत् की सुरुचि का भङ्ग करनेवाला है। कोई भी नायक रंगमंच पर ही नायिका के साथ सहशयन की माँग करे वह सर्वथा अश्लील है। इस नाट्यकृति के आरम्भ में ही कवि ने अपने नायक का परिचय देते हुए कहा है कि "साक्षात् पश्यामीव पिनाकिनम्" अर्थात् दुष्यन्त भगवान् शङ्कर जैसा धीरोदात्त नायक है। वह जाहिर में और प्रकट शब्दों में शकुन्तला से सहशयन की माँग नहीं कर सकता है। अतः मानना होगा कि किसी सूत्रधार ने ही अपने स्थल-काल के दर्शकों की रुचि के अनुसार ऐसा अश्लील श्लोक नायक के मुख में रख दिया होगा।
तथैव, नायक की उक्ति के पीछे प्रियंवदा की जो उक्ति है (नैतावता तुष्टिर्भविष्यति।) वह तो नितान्त ग्राम्य है। रंगभूमि पर ऐसी अश्लील बातें कहलाने वाले कवि कालिदास नहीं हो सकते हैं। प्रकृत संवाद नायिका, नायक और प्रियंवदा के लिए कथमपि शोभास्पद नहीं होने से आन्तरिक सम्भावना के विरुद्ध है। अतः इस पूरे संवाद को प्रक्षिप्त मानना ही होगा।
3-1-6 तीसरे अङ्क का एक उदाहरण द्रष्टव्य है, जिसमें भी नायक के उदात्त चरित से विपरीत एवं गलत सोचवाली श्लोकरचना प्रस्तुत हुई है।
58 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
राजा- (स्वागतम्)
अप्यौत्सुक्ये महति दयितप्रार्थनासु प्रतीपाः काङ्क्ष्यन्त्योऽपि व्यतिकरसुखं कातराः स्वाङ्गदाने। आबाध्यन्ते न खलु मदनेनैव लब्धान्तरत्वाद् आबाधन्ते मनसिजमपि क्षिप्तकालाः कुमार्यः।।³⁸ 3-27
(शकुन्तला गच्छत्येव)
इस श्लोक में नायक दुष्यन्त कुमारिका स्त्रियों की मानसिकता को विशद करता हुआ जो बोल रहा है उसमें भी उसकी ही भोगेच्छा खुल कर बाहर आ रही है। किन्तु प्रासंगिक दृष्टि से सोचा जाय तो रंगमंच से सहेलियों के चले जाने के बाद कुछ ज्यादा समय तो बीता नहीं है और शकुन्तला के साथ कोई प्रेमगोष्ठियाँ भी अभी हुई नहीं हैं, उससे पहले दुष्यन्त की उपर्युक्त श्लोकोक्ति नायक की अधीरता प्रकट करनेवाली है। प्रेमकथाओं में प्रणयि-युगल के बीच जो स्वाभाविक रूप से संवनन प्रक्रिया क्रमशः विकसित होती है और जो इस अङ्क में आगे आनेवाले मृणाल-वलय प्रसंग में दृश्यमान होनेवाली है, उसकी प्रस्तुति होने से पहले दुष्यन्त का यह आत्मगत चिन्तन सामयिक नहीं है। अतः यह उपर्युक्त श्लोक भी प्रक्षिप्त लगता है।
3-1-7 तृतीयांक में प्रियंवदा और अनसूया मृगबाल को उनकी माता के पास पहुँचाने का बहाना बना कर लतामण्डप से दूर चली जाती हैं। अब रंगमंच पर दुष्यन्त और शकुन्तला अकेले हैं। सखीजनों की भूमिका पर अब दुष्यन्त खड़ा है। मध्याह्न का समय होने से वह शकुन्तला को नलिनीदल से आर्द्र वायु का संचार करने का इच्छुक है, और शकुन्तला कहे तो उसके चरणों का संवाहन करने को भी तैयार है। किन्तु शकुन्तला माननीय व्यक्ति से ऐसी सेवा लेना उचित नहीं समझती है। अतः वहाँ से उठ कर चली जाती है। दुष्यन्त उसके पीछे चल पड़ता है और उसका पल्लू पकड़ कर रोकने की चेष्टा करता है। शकुन्तला कहती है-पौरव, रक्ष विनयम्। इतस्ततः ऋषयः संचरन्ति। इस संवाद के बाद राजा की जो उक्ति है, उसकी मौलिकता संदेहास्पद है:
राजा- सुन्दरि, अलं गुरुजनाद् भयेन। न ते विदितधर्मा तत्रभवान् कण्वः खेदमुपयास्यति।
- अनुवाद: राजा-(स्वगत) ये कुमारिकायें अतिशय इच्छा रखती हुई भी अपने प्रियतम के प्रतिकूल बर्ताव करती हैं। यद्यपि मिलन-सुख की अभिलाषा रखती हैं, फिर भी अपना अंग समर्पित करने में कातरता दिखाती हैं। अतएव मालूम होता है कि समय पाकर केवल कामदेव ही उनको पीड़ित नहीं करता, बल्कि व्यर्थ में समय बिता कर ये कामदेव को भी बाधा पहुँचाती हैं।