अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें| अभिज्ञानशकुन्तलम् | प्रस्तावना | 51 |
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के कारण यदि अभ्यर्थनीय न हो तो भी निश्चित रूप से द्रष्टव्य तो है ही। दुष्यन्त ने एक दृष्टान्त के माध्यम से सिद्ध कर दिया कि सौन्दर्यशालिनी होने मात्र से स्पृहणीय एवं अभ्यर्थनीय है। किन्तु दृष्टान्त में इन्दुकला रूप एक चीज ऐसी है जिसकी स्पृहा करना सब के लिये मान्य है, लेकिन दार्ष्टान्तिक के रूप में रही शकुन्तला तो ऐसी कोई चीज नहीं है कि जिसकी स्पृहा कोई भी कर सकता है। शकुन्तला जैसी मनुलता को प्राप्त करने के लिये धर्म की अनुज्ञा भी होनी अनिवार्य है। इस लिए राजा ने “ललिताप्सरसंभवम्०” इत्यादि शब्दों से वह शकुन्तला दुष्यन्त जैसे क्षत्रिय से विवाह के योग्य भी है यह स्पष्ट किया है।। अर्थात् बंगाली वाचना का पूरा पाठ्यांश शकुन्तला की अभ्यर्थनीयता को उभयथा सिद्ध करता है, अतः मौलिक प्रतीत होता है। लेकिन देवनागरी (और दाक्षिणात्य) पाण्डुलिपियों की परम्परा में” निराकृतनिमेषाभिः०” (श्लोक-8) हटाया गया है। तथा इस प्रसंग के पाठ्यांश का नवीन संस्कार करके इस तरह से अवतारित किया गया हैः
(राघवभट्टानुसारी देवनागरी पाठ)
विदूषकः- (स्वगतम्) होदु, से अवसरं ण दइस्सं। (प्रकाशम्) भो वअस्स, ते तावसकण्णआ अब्भत्थणीआ दीसदि। (भवतु, अस्यावसरं न दास्ये। भो वयस्य, ते तापसकन्याभ्यर्थनीया³² दृश्यते।)
राजा- सखे, न परिहार्ये वस्तुनि पौरवाणां मनः प्रवर्तते।
सुरयुवतिसंभवं³³ किल मुनेरपत्यं तदुज्झिताधिगतम्।
अर्कस्योपरि शिथिलं च्युतमिव नवमालिकाकुसुमम्।। (2-8)
यहाँ पर निराकृतनिमेषाभिः० वाला श्लोक हटा कर, मूल पाठ का संक्षेपीकरण किया गया है। किन्तु ऐसा पाठ बनाने से राजा ने विदूषक को शकुन्तला की जो अभ्यर्थनीयता सिद्ध करने के लिए कहा है, वह अपर्याप्त दिखता है। क्योंकि दर्शकों को याद होगा कि राजा ने पहले विदूषक को ऐसा कहा था कि यदि तुम ने शकुन्तला को नहीं देखा है तो तुम्हें आँखें होने का कोई फल मिला ही नहीं है। अर्थात् “आश्रमललामभूता” शकुन्तला तो एक नवीन इन्दुकला समान है। जो न केवल विदूषक को, लेकिन सब को अवश्य देखनी चाहिए। अतः राजा के मूल प्रस्ताव को याद किया जायेगा तो देवनागरी पाठ की अपूर्णता साफ दिखायी देगी।
- बंगाली पाठ में “अनभ्यर्थनीया” शब्द था, उसके स्थान पर देवनागरी में “अभ्यर्थनीया” ऐसा पाठभेद किया गया है।
- बंगाली पाठ में “ललिताप्सरसंभवम्” शब्द के द्वारा ललित अप्सरा (मेनका) में पैदा हुई मुनि (विश्वामित्र) की पुत्री के रूप में शकुन्तला की पहचान दी गयी है। लेकिन देवनागरी में “सुरयुवतिसंभवम्” शब्द के द्वारा देवों की वाराङ्गना (मेनका) में पैदा हुई-ऐसा कहा जाता है, जिसमें सुरुचि का भङ्ग हो रहा है। इससे भी देवनागरी पाठ विकृति का परिणाम है ऐसा सिद्ध होता है।