भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 262 में से

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पृष्ठ 64

50 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

हुए “अथवा” निपात का जो प्रयोग किया है उसका स्वारस्य समझ लेने से ऐसे संक्षेपों को पहचाना जाता है। एवमेव, बंगाली वाचना का जो पाठ लम्बा होते हुए भी मौलिकता के नजदीक है। उसमें भी कुत्रचित् प्रक्षेप होने के कारण वह भी मौलिकता से दूर हटता जा रहा है। ऐसी स्थिति में, “अपि च” जैसे निपातों के प्रयोग का स्वारस्य ढूँढने से / सोचने से ऐसे प्रक्षेपों की पहचान की जा सकती है।

2-1-1 बंगाली पाठानुसारी द्वितीयाङ्क के एक प्रासंगिक एवं बहुत सुन्दर श्लोक का संक्षेप देवनागरी में किया गया है: राजा के साथ आया विदूषक मृगयाविहार से सन्त्रस्त है और घर वापस जाने के लिए बड़ा उत्सुक है। उसे शकुन्तला विषयक बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं है। अतः वह राजा की प्रेमाविष्ट दशा पर रोक लगाना चाहता है। वह राजा को कहता है कि-चूँकि वह (शकुन्तला) एक तपस्वी की (अर्थात् ब्राह्मण की) कन्या है, इस लिए आपके लिए तो अभ्यर्थनीय नहीं हो सकती है। तो फिर उसे देखने से क्या फायदा? अब उसके प्रत्युत्तर में राजा ने जो कहा है वह बहुत सतर्क है एवं नायक की सौन्दर्यनिष्ठ दृष्टि का परिचायक है। इस प्रसंग से सम्बद्ध बंगाली वाचना का पाठ निम्नोक्त है:

विदूषकः- (स्वगतम्) भोदु। ण से पसरं वड्डाइस्सं। (प्रकाशम्) भो जदो सा तावस-कण्णआ अणब्भत्थणीआ, तदो ताए किं दिट्ठाए। (भवतु, नास्य प्रसरं वर्धयिष्यामि। भोः यतः सा तापसकन्यका अनभ्यर्थनीया, ततः तया किं दृष्ट्या।)

राजा- मूर्ख, निराकृतनिमेषाभिर्नेत्रपङ्क्तिभिरुन्मुखः । नवामिन्दुकलां लोकः केन भावेन पश्यति।। 2-8

न च परिहार्ये वस्तुनि दुःषन्तस्य मनः प्रवर्तते। विदूषकः- ता कधेहि। (तत्कथय।) राजा- ललिताप्सरोभवं किल मुनेरपत्यं तदुज्झिताधिगतम्। अर्कस्योपरि शिथिलं च्युतमिव नवमालिकाकुसुमम्।। 2-9

यहाँ राजा ने शकुन्तला तापसकन्या होने से अभ्यर्थनीय न हो तो भी, वह सौन्दर्यशालिनी होने से भी द्रष्टव्य तो है ही उसका बहुत प्रतीतिकर तर्क श्लोक 2-8 में प्रस्तुत किया है। नवीन इन्दुकला भी कदापि प्राप्य नहीं होती है, फिर भी संसार के सभी लोग उसे अति स्पृहणीय समझ कर ही निरन्तर देखते रहते हैं। उसी तरह से शकुन्तला भी तापसकन्या होने