अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम्
प्रस्तावना
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मूर्त्तो विघ्नस्तपस इव नो भिन्नसारङ्गयूथो
धर्मारण्यं प्रविशति गजः स्यन्दनालोकभीतः ।।
(राघवभट्टः, 1–29)
(सर्वाः कर्णं दत्वा किंचिदिव संभ्रान्ताः।)
राजा–(आत्मगतम्) अहो धिक्। पौरा अस्मदन्वेषिणस्तपोवनमुपरुन्धन्ति। भवतु, प्रतिगमिष्यामस्तावत्।
यहाँ दोनों श्लोकों को “अपि च” से बाँधा है, लेकिन उन दोनों के बीच में नायक का प्रतिभाव व्यक्त करनेवाले वाक्यों की कटौती कर देने से उसका संवेदनशील व्यक्तित्व प्रकट नहीं हो पाता है। यह संक्षेपीकरण का दुष्परिणाम है, जो संक्षेपीकरण मानने का आधार भी है।
1–2–6 देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षेपीकरण का एक अन्तिम उदाहरण शकुन्तला के निर्गमन प्रसंग में मिल रहा है:-राजा ने जब कहा कि आप सब के दर्शन से ही मैं पुरस्कृत हुआ हूँ, अतः मुझसे क्षमायाचना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। तीनों सहेलियाँ साथ में रंगमंच से निकल रही हैं, तब शकुन्तला कहती है कि
अहिणवकुससूइपरिक्खदं मे चलणं कुरुवअसाहापरिलग्गं च मे वक्कलं। ता पडिवालेध मं जाव णं मोआवेमि।।
(अभिनवकुशसूचिक्षतं मे चरणं कुरबकशाखापरिलग्नं मे वल्कलम्। तावत् प्रतिपालयतम् माम् यावत् एनं मोचयामि।) इसके बाद रंगसूचना है–इति राजानमवलोकयन्ती सह सखीभ्यां निष्क्रान्ता।। इस बंगाली पाठ में शकुन्तला के वाचिक संवाद के साथ साथ रंगसूचना भी रखी गयी है। किन्तु देवनागरी वाचना के पाठ में शकुन्तला के वाचिक संवाद को हटा कर, केवल रंगसूचना दी गयी है। जैसे कि “शकुन्तला राजानमवलोकयन्ती सव्याजं विलम्ब्य सह सखीभ्यां निष्क्रान्ता”। इस परिवर्तन से वाचिक उक्ति का संक्षेप किया गया है। यहाँ, देवनागरी वाचना में, केवल अभिनय से ही नायिका ने दुष्यन्त के प्रति अनुराग प्रदर्शित किया है।
अभिज्ञानशाकुन्तल के मूल पाठ में से अनेक श्लोक एवं गद्य वाक्यों को काट कर देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में संक्षेपीकरण किया गया है। यद्यपि इसमें प्रथम दृष्टि से तो, मंचन के दौरान मर्यादित समय की पाबंदी दृष्टिगोचर हो रही है। किन्तु ऐसा करने से नाटक के मूल पाठ में विचार की जो प्रवाहिता होती है वह खण्डित होती है और उससे कदाचित् नायक आदि के व्यक्तित्व का सही चित्र भी दूषित हो जाता है, जो प्रकट रूप से काव्य को हानि पहुँचाता है।
कालिदास ने अपने काव्यों में अभिव्यक्ति का एक विशिष्ट स्वरूप विकसित करते