अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें48 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
पहुँचा और भाग्यवशात् शकुन्तला में अनुरक्त भी हुआ। किन्तु वह मृगया विहार के लिए सेनापति सहित सैन्य भी साथ में लेकर निकला था। अतः वह सैन्य राजा का अनुसरण करता हुआ, बल्कि राजा का अन्वेषण करता हुआ अब कण्व के आश्रम के पास पहुँच रहा है। यहाँ जो संवाद-शृङ्खला प्रस्तुत हुई है वह मननीय है। उसमें भाव-प्रतिभाव की जो आनुक्रमिकता है वह दुष्यन्त का एक अच्छे संवेदनशील व्यक्ति के रूप में परिचय देनेवाली है। किसी आश्रमवासी ने दूर से देखा है कि दुष्यन्त का सैन्य आश्रम की ओर आगे बढ़ रहा है। उसने (नेपथ्योक्ति से) तपस्वियों का आह्वान किया है कि आश्रम के पशुओं की रक्षा के लिए सब सन्निहित हो जायें। सैन्य के घोड़ों की खुर से आहत हुई धूलि चारों ओर उड़ रही है और भीगे वल्कल वस्त्रों पर वह गिर रही है, ऐसा श्लोक 31 में कहा जाता है। इसको सुनते ही दुष्यन्त ने प्रतिभाव व्यक्त किया कि मुझे ढूँढ़ते हुए आ रहे मेरे सैनिक क्या तपोवन को घेरे डाल रहे हैं? तब फिर से नेपथ्य से कहा जाता है कि-वृद्ध, स्त्री और छोटे बालकों को पर्याकुलित करता हुआ कोई हस्ती भी भागता हुआ वहाँ आ रहा है। उस हाथी की घबराहट का कारण भी कहा जाता है कि राजा के रथ को देख कर वह डरा हुआ है।$^{31}$ इस वाक्य को सुन कर शकुन्तलादि स्त्रियाँ संभ्रम के साथ एकदम खड़ी हो जाती हैं, लेकिन राजा को एक क्षण में मालूम हो जाता है कि उसने तपस्वियों का अपराध कर दिया है। यह उसकी संवेदनशीलता का परिचायक है। किन्तु जो देवनागरी वाचना का पाठ है वह संक्षेपीकरण के दोष से दूषित हो गया है, जिसमें नायक उपर्युक्त दोनों श्लोकों को सुनने के बावजूद भी कोई संवेदना का अनुभाव नहीं दिखाता है। देवनागरी वाचना के पाठ में पूर्वोक्त दोनों श्लोक सुरक्षित रखे गये हैं। किन्तु इनके आगे पीछे जो गद्य वाक्य है उसमें कटौती और परिवर्तन किया गया है जिसके कारण यह अन्तिम अंश भाव-प्रतिभाव के प्रदर्शन की नाटकीयता से दूर हट जाता है। उपर्युक्त बंगाली पाठ से तुलना करने के लिए निम्नोक्त देवनागरी पाठ द्रष्टव्य है:-
(नेपथ्ये) भो भोस्तपस्विनः, संनिहितास्तपोवनसत्त्वरक्षायै भवत। प्रत्यासन्नः किल मृगयाविहारी पार्थिवो दुष्यन्तः।
तुरगखुरहतस्तथा हि रेणुर्विटपविषक्तजलार्द्रवल्कलेषु।
पतति परिणतारुणप्रकाशः शलभसमूह इवाश्रमद्रुमेषु।।
(राघवभट्टः, 1-28)
अपि च-
तीव्राघातप्रतिहततरुः स्कन्धलग्नैकदन्तः
पादाकृष्टव्रततिवलयासङ्गसंजातपाशः ।
- धर्मारण्यं विरुजति गजः स्यन्दनालोकभीतः।