अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 47
कामं न तिष्ठति मदाननसम्मुखीयं भूयिष्ठमन्यविषया न तु दृष्टिरस्याः।।
1-30
इस तरह के इङ्गितों से निर्णय हो पाता है कि शकुन्तला भी नायक को चाहती है, तब प्रथमांक का प्रयोजन पूरा हो जाता है। कवि को अब इस अङ्क की समाप्ति कर देनी चाहिए (किसी निमित्त से सभी पात्रों को रंगमंच से विदा कर देना चाहिए) ऐसा समझ कर शिकार के निमित्त से दौड़ आये राजा और सारथि से जो अङ्क शुरू किया था, उसी सन्दर्भ का अनुसन्धान करते हुए निम्नोक्त क्रम से समापन किया जाता है:
(नेपथ्ये)
भो भोस्तपस्विनः। तपोवनसन्निहितसत्त्वरक्षणाय सज्जीभवन्तु भवन्तः। प्रत्यासन्नः किल मृगयाविहारी पार्थिवो दुःषन्तः।
तुरगखुरहतस्तथा हि रेणुर्विटपनिषक्तजलार्द्रवल्कलेषु। पतति परिणतारुणप्रकाशः शलभसमूह इवाश्रमद्रुमेषु।।
1-31
राजा- (स्वगतम्) अहो धिक्, कथं मदन्वेषिणः सैनिकास्तपोवनमभिरुन्धन्ति।
(पुनर्नेपथ्ये)
भो भोस्तपस्विनः। पर्याकुलीकुर्वन् वृद्धस्त्रीकुमारकान् एष प्राप्तः।
तीव्राघातादभिमुखतरुस्कन्धभग्नैकदन्तः प्रौढाकृष्टव्रततिवलयासञ्जाज्जातपाशः । मूर्तो विघ्नस्तपस इव नो भिन्नसारङ्गयूथो धर्मारण्यं विरुजति गजः स्यन्दनालोकभीतः।।
1-32
(सर्वाः श्रुत्वा ससंभ्रममुत्तिष्ठन्ति।)
राजा- अहो धिक्, कथमपराद्धस्तपस्विनामस्मि। भवतु तावत्, प्रतिगच्छामि।
सख्यौ- महाभाअ, इमिणा हत्थिसंभमेण पज्जाउलाओ म्ह। ता अणुजाणाहि णो उडअगवणे। (महाभाग, अनेन हस्तिसंभ्रमेण पर्याकुलाः स्मः। तदनुजानीहि नः उटजगमने)
अनसूया- (शकुन्तलां प्रति) हला सउन्तले, आउला अज्जा गोदमी भविस्सदि। ता एहि। सिग्धं एक्कत्थाओ होम्ह। (सखि शकुन्तले, आकुला आर्या गौतमी भविष्यति। तदेहि शीघ्रम् एकास्थाः भवामः।) ।।
मृगयाविहारी राजा तीव्र वेग से दौड़ते मृग का अनुसरण करता हुआ कण्वाश्रम तक