अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें46 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
करं व्याधुन्वत्याः पिबसि रतिसर्वस्वमधरं
<p align="right">1-23</p>
वयं तत्त्वान्वेषान् मधुकर, हतास्त्वं खलु कृती।।
इन शब्दों से वर्णित भ्रमरबाधा प्रसंग में, पहले (22) श्लोक में भ्रमर से सन्त्रस्त हो रही शकुन्तला का चित्र खींचा गया है।²⁹ तत्पश्चात् दूसरे (23) श्लोक में शकुन्तला के मुखारविन्द पर घूम रहे ईर्ष्याजनक भ्रमर का चित्र खींचा गया है।³⁰ यहाँ एक ही दृश्य की द्विपाश्र्वी रमणीयता को दो अलग अलग श्लोकों में वर्णित करने की आवश्यकता है। अतः कालिदास ने यहाँ समुच्चयार्थक “अपि च” का प्रयोग करके इन दोनों को परस्पर बाँधा है। नायक के द्वारा भ्रमरबाधा प्रसंग के प्रथम क्षण में नायिका के लोचन का सौन्दर्य प्रेक्षणीय है और इसीलिये कवि ने भी “सस्पृहम्” ऐसी रंगसूचना लिखी है। दूसरे क्षण में, नायक के मन में भ्रमर के प्रति प्रतिस्पर्धी का भाव जाग उठता है, इस लिए उस भाव को भी अभिव्यक्त करने के लिए “अपि च” से दूसरे श्लोक का अवतार किया जाता है। वहाँ पर “सासूर्यम्” ऐसी रंगसूचना दी जाती है। यहाँ दोनों श्लोकों में दृष्टिकोणों का ही भेद होने से उसमें पुनरुक्ति का कोई अवकाश ही नहीं है। अतः दो श्लोकों से प्रस्तुत हुआ यह वर्णन मूलगामी पाठ हो सकता है, जो बंगाली एवं मैथिली वाचना में संचरित होता रहा है। लेकिन समय-मर्यादा की बाधा से पीडित सूत्रधारों ने उन दोनों में से पहले श्लोक को हटा दिया होगा। परिणामतः देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना की पाठपरम्परा ने केवल चलापाङ्गां० वाला श्लोक ही सुरक्षित रखा है।
“अपि च” से सम्बद्ध दो दो श्लोकवाले वर्णन में यदि पुनरुक्ति दिखती है तो वह प्रक्षेप का स्थान हो सकता है। किन्तु यदि एक ही दृश्य में द्विपाश्र्वी रमणीयता वर्णित करने का सन्दर्भ दिखता है तो वहीं पर दोनों श्लोक मौलिक हो सकते हैं और अनुगामी काल में सूत्रधारों द्वारा उनमें से किसी एक को हटा कर संक्षेप किया गया होगा-यह बात भी निश्चित है।
1-2-5 देवनागरी वाचना के पाठ में कटौती का एक अन्य उदाहरण प्रथमांक के समापन प्रसंग में मिल रहा है। राजा ने शकुन्तला को “तत्त्वतः” जान लिया है कि वह उसके (क्षत्रिय के) लिए विवाह-योग्य है। अब दूसरा विचारणीय बिन्दु यह है कि वह उसको पसन्द करती है या नहीं? इस सन्दर्भ में दुष्यन्त ने निम्नोक्त श्लोक कहा है:
राजा- (शकुन्तलां विलोकयन्नात्मगतम्) किं नु खलु यथा वयमस्यामेवमियमप्यस्मान् प्रति स्यात्। अथवा लब्धावकाशा मे मनोवृत्तिः।
वाचं न मिश्रयति यद्यपि मद्वचोभिः
कर्णं ददात्यवहिता मयि भाषमाणे।
- यह श्लोक वंशस्थविल वृत्त में लिखा गया है।
- यह श्लोक शिखरिणी वृत्त में लिखा गया है।