भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 45

अमुक विचार को प्रस्तुत करने के बाद पक्षान्तर में दूसरा विचार भी कहना तर्क की दृष्टि से अनिवार्य लगता है कवि ने वहाँ अथवा का प्रयोग किया ही है। अर्थात् “अथवा” निपात से अवतारित किये दो दो श्लोकों का (बंगाली पाठ में) जो भी सन्दर्भ है उसके मौलिक होने की सम्भावना अधिक है। देवनागरी (एवं दाक्षिणात्य) वाचना के पाठ को संक्षिप्त करनेवालों ने ऐसे “अथवा” निपात से जुड़े दो दो श्लोकवाले सन्दर्भों को ही कटौती करने के लिए प्रायः पसन्द किया है। राघवभट्ट के द्वारा स्वीकृत पाठ में उपर्युक्त श्लोक-18 इसी कारण से नहीं मिलता है। तथा “अथवा” से शुरू होनेवाली (बंगाली वाचना के पाठ की) वाक्य-रचना भी बदल दी गयी है। इस तरह से देवनागरी में इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना०। श्लोक का न होना संक्षेपीकरण का परिणाम है ऐसा सिद्ध होता है।

सरसिजमनुविद्धं ...। श्लोक के नीचे जो कठिनमपि ...। श्लोक है, उसे “अपि च” निपात से बाँधा गया है। लेकिन यहाँ सरसिजम्० श्लोक से जो विचार प्रस्तुत किया गया है उसी का पुनरुच्चार दूसरे शब्दों में किया जा रहा है। अतः नाटक में, (वह भी शाकुन्तल जैसे कालिदास के नाटक में) पुनरुक्ति रूप संवाद प्रक्षिप्त होने की पूरी सम्भावना है। टीकाकार चन्द्रशेखर ने भी इस कठिनमपि... वाले श्लोक (1-20) के लिए कहा है कि-पद्यमिदं दाक्षिणात्य-तीरभुक्तीयग्रन्थेषु न दृश्यते। तीरभुक्तीय अर्थात् मैथिली पाठ में, एवमेव देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में भी वह श्लोक संचरित नहीं हुआ है। इससे भी इस श्लोक का मौलिक न होना सिद्ध हो जाता है। इस श्लोक को बंगाली पाठ में प्रक्षिप्त मानना होगा।

1-2-4 देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षेप किये हुए स्थानों के उदाहरणः अभिज्ञानशाकुन्तल में कुत्रचित् वर्णनात्मक स्थान हैं, वहाँ पर दो दो श्लोकों को समुच्चयार्थक “अपि च” अव्यय से सम्बद्ध किया गया है। लेकिन ऐसे स्थान प्रक्षेप एवं संक्षेप के सम्भावित स्थान भी हैं। अतः शाकुन्तल में प्रयुक्त इस समुच्चयार्थक “अपि च” के प्रयोग का स्वारस्य सर्व प्रथम गवेषणीय बनता है। उदाहरण के रूप में भ्रमरबाधा प्रसंग को हम लेते है। यहाँ पर बंगाली एवं मैथिली वाचना में “अपि च” से सम्बद्ध किये गये दो श्लोक हैं:

राजा-( सस्पृहम् ) यतो यतः षट्चरणोऽभिवर्तते, ततस्ततः प्रेरितवामलोचना। विवर्तितभ्रूरियमद्य शिक्षते भयादकामापि हि दृष्टिविभ्रमम्॥

<p align="right">1-22</p>

अपि च-(सासूयमिव) चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि बहुशो वेपथुमतीं रहस्याख्यायीव स्वनसि मृदु कर्णान्तिकचरः।