अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें44 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
अपि च
कठिनमपि मृगाक्ष्या वल्कलं कान्तरूपं
न मनसि रुचिभंगं स्वल्पमप्यादधाति।
विकचसरसिजायाः स्तोकनिर्मुक्तकण्ठं
निजमिव कमलिन्याः कर्कशं वृन्तजालम्।। १-२०
यहाँ टीकाकार चन्द्रशेखर ने बंगाली पाठानुसारी उपर्युक्त चारो श्लोकों पर टीका लिखी है। किन्तु इसके विपरीत राघवभट्ट द्वारा जिस पर टीका लिखी गयी है वहाँ दो ही (पहला और तीसरा) श्लोक हैं। अतः चर्चा करना आवश्यक हो जाता है कि बंगाली पाठ्यांश में प्रक्षेप है या फिर देवनागरी पाठ में संक्षेप हुआ है? यहाँ सब से पहले कालिदास के “अथवा” निपात के प्रयोग का स्वारस्य विचारणीय है। कालिदास जब एक विचार की प्रस्तुति करते हैं और वहाँ तर्क की दृष्टि से प्रतिपक्ष में भी कोई विरोधी विचार प्रस्ताव के योग्य हो तो उसको तुरन्त “अथवा” निपात से अवतारित कर ही देते हैं। उदाहरण के रूप में-क्व सूर्यप्रभवो वंशः, क्व चाल्पविषया मतिः। इत्यादि (रघुवंशम् 1-2) लिखने के बाद तो, काव्यसर्जन के लिये उद्यत हुए कवि को उस कर्म से विरत ही हो जाना चाहिए। लेकिन हमारे कवि यहाँ तुरन्त “अथवा” निपात का प्रयोग करते हुए पक्षान्तर को प्रस्तुत कर देते हैं कि-अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन् पूर्वसूरिभिः। मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः। (रघुवंशम् 1-4) इस तरह से, सूर्यवंश अतिमहान् होते हुए भी उनके द्वारा रघुवंश का वर्णन कैसे सम्भव है वह लिख देते हैं।²⁸
(बंगाली पाठ के अनुसार) शकुन्तला की सहेलियों के ऐसे उपर्युक्त संवाद को सुन कर वृक्ष के पीछे खड़े दुष्यन्त ने दो (18 एवं 19) श्लोकों का उच्चारण किया है और इन दोनों के बीच में “अथवा” निपात का विनियोग किया है। श्लोक-18 में पहले कहा गया है कि स्तन-युगल के विस्तार को वल्कल से बाँधा गया है, जिससे शकुन्तला का अभिनव शरीर उसी प्रकार अपनी निजी शोभा को नहीं बढ़ाता है जैसे पाण्डु पर्णों के अन्दर बाँधे गये पुष्प शोभा नहीं देते हैं। इतना कह देने के बाद नायक को अपने विचार में रहा एक सूक्ष्म दोष भी दिखायी देता है। अभी जो कहा गया है उसका मतलब तो यही होगा कि शकुन्तला के सौन्दर्य को निखारने के लिए वल्कल नहीं, किन्तु कुछ अन्य वस्त्र होने चाहिए। नायक तुरन्त अपने वाग्दोष को सुधारने के लिए, (स्वोक्तिम् आक्षिपति-अथवेति।) “अथ वा” शब्द का प्रयोग करता हुआ, इस सन्दर्भ में पक्षान्तर प्रस्तुत करता है कि शकुन्तला के वल्कल भी उसकी शोभा नहीं बढ़ाते है ऐसा नहीं है। क्योंकि जो मधुर आकृतिवाले लोग होते हैं उनको तो सब कुछ अच्छा ही लगता है। इस तरह से पूरे नाटक में, जहाँ जहाँ पर
- टीकाकार चन्द्रशेखर ने ऐसे सन्दर्भों के लिए लिखा है कि-स्वोक्तिम् आक्षिपति-अथवेति।