भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 262 में से

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52 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

3-1-0 अभिज्ञानशाकुन्तल की विभिन्न वाचनाओं में तृतीयांक का पाठ ही सब से अधिक विवादास्पद है। लघुपाठ परम्परा में, अर्थात् देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में तीसरे अङ्क का कलेवर 21 से 23 या 24 श्लोक पर्यन्त सीमित है। बृहत्पाठ परम्परा में, अर्थात् बंगाली वाचना के पाठ में तीसरे अङ्क का कलेवर 40 से 41 श्लोक पर्यन्त सुविकसित स्वरूप वाला है। अतः यह गवेषणीय बनता है कि कालिदास-प्रणीत मूल पाठ में सूत्रधारों के द्वारा कुछ नये श्लोकों का प्रक्षेप किया गया होगा, या मूलतः पाठ प्रलम्ब ही था और अज्ञात सूत्रधारों ने मंचन के दौरान उसमें संक्षेप करके लघुपाठ बनाया है, जो देवनागरी पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ है?

यद्यपि डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने बंगाली वाचना का पाठ ही प्राचीनतर (10वीं शती का) है ऐसा सिद्ध किया है और इसी कारण से वही पाठ अधिक श्रद्धेय मानना उपयुक्त समझा है,³⁴ किन्तु पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ कोई भी पाठ अन्यान्य प्रमाणों से प्राचीनतर सिद्ध होने मात्र से उसको ही सब से अधिक श्रद्धेय मान लेना सर्वथा उचित नहीं है। बंगाली वाचना के समीक्षित पाठ में भी, उच्चतर समीक्षा करने से अनेक प्रक्षेप मिल सकते हैं और कुत्रचित् उसमें संक्षेप भी दिखते हैं जिसकी चर्चा निम्नोक्त पृष्ठों में की जाती है।

3-1-1 तृतीयाङ्क के बंगाली वाचनानुसारी पाठ में जो जो प्रक्षेप हैं इनका क्रमशः निरूपण किया जाता है: अङ्क के आरम्भ में दुष्यन्त का प्रवेश होता है। नायक मदनावस्था में है ऐसा कहा गया है, इस स्थिति में वह कुल मिला कर नव श्लोकों से भरा संवाद प्रस्तुत करता है। इनमें से दो श्लोक प्रक्षिप्त हैं ऐसा कृति के आन्तरिक प्रमाणों से सिद्ध होता है। जैसे-

दुष्यन्तः- भगवन् मन्मथ, कुतस्ते कुसुमायुधस्य सतस्तैक्ष्ण्यमेतत्। (स्मृत्वा) आं ज्ञातम्।

अद्यापि नूनं हरकोपवह्निस्त्वयि ज्वलत्यौर्व इवाम्बुराशौ।
त्वमन्यथा मन्मथ मद्विधानां भस्मावशेषः कथमेवमुष्णः।। (3-3)

इस श्लोक में शङ्कर के कोप से मन्मथ (कामदेव) भस्मावशेष हुआ था ऐसा कुमारसम्भवोक्त सन्दर्भ अनुस्यूत है। अतः यह श्लोक कालिदास-प्रणीत होने की सम्भावना दिखती है। किन्तु इसी अङ्क में हम जैसे जैसे आगे बढ़ते हैं तो इसी तरह का एक दूसरा श्लोक भी दृष्टिगोचर होता है:


  1. One must not think in terms of what is truly Kalidasian or non-Kalidasian, but what the anthologists, poeticists, & literature of India cite from the text of Kalidasa. If evidences testify to the existence of the alleged enlarged version before the 10th century, it would be proper for us to in the 20th cent. to accept the same as more authentic than any interpretative reconstruction. D.K. Kanjilal, Introductory chapter 3, page 132.