अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 53
दुःषन्तः–(शकुन्तलाया हस्तमादाय) अहो स्पर्शः।
हरकोपाग्निदग्धस्य दैवेनामृतवर्षिणा।
प्ररोहः संभृतो भूयः किंस्वित् कामतरोरयम्।। (3-34)
शकुन्तला–(स्पर्शं रूपयित्वा) तुवरदु, तुवरदु अज्जउत्तो।।
इन दोनों श्लोकों में “हरकोपवह्निः” एवं “हरकोपाग्निः” शब्दों में स्पष्ट पुनरुक्ति है। अतः दोनों में से कोई एक प्रक्षिप्त होगा ही। तीसरे अङ्क के मध्य भाग में आये हुए 3-34 श्लोक का सन्दर्भ यदि देखा जाय तो दुष्यन्त ने शकुन्तला का हाथ अपने हाथों में लिया है और वह शकुन्तला को (कङ्कण के रूप में) मृणालतन्तु का वलय पहनाने जा रहा है। तब शकुन्तला के हाथ का रोमांचकारी प्रथम स्पर्शानुभव करता हुआ 34 वाँ श्लोक बोलता है। उसको लगता है कि हरकोपाग्नि से भस्मीभूत हुए कामतरु का मानों एक प्ररोह (अङ्कुर) ही शकुन्तला के हाथ के रूप में प्रस्फुटित हुआ है। यह श्लोक इस प्रसंग में सर्वथा सुसंगत है। लेकिन जो 3-3 श्लोक है वह भले ही मदनावस्था में प्रविष्ट हो रहे नायक के मुख में रखा गया है इस लिए प्रथम दृष्टि में उचित लगता हो, फिर भी इसी श्लोक के नीचे श्लोक 4 के वर्णन को देखते हैं तब उसी विचार की पुनरुक्ति सुनायी जा रही है। अर्थात् श्लोक 3-3 के हरकोपवह्नि शब्दों की पुनरुक्ति 3-34 में हो रही है, तथा कामदेव को कोसने की प्रवृत्ति 3-3 से करने के बाद 3-4 में भी पुनरावृत्त की जा रही है। अतः 3-3 का प्रक्षिप्त होना सिद्ध हो जाता है। यहाँ किसी के मन में ऐसा प्रश्न उठ सकता है कि 3-3 में प्रस्तुत हुए विचार की यदि 3-4 में पुनरावृत्ति होती है, तो क्यों 3-4 को ही प्रक्षिप्त न मान लिया जाय? इस शङ्का का समाधान यह है कि श्लोक 3-4 को जो 3-5 के साथ “अथवा” निपात से बाँधा गया है, वह एकदम उचित है। 3-4 में नायक अपनी मदनावस्था के उपलक्ष्य में चन्द्रमा और कामदेव को एक साथ में उलाहना देता है कि तुम दोनों का शीतरश्मित्व और कुसुमशरत्व होना बेकार है। क्योंकि चन्द्रमा शीतकिरणों से भी अग्नि-वमन कर रहा है, और कामदेव कुसुमबाणों को वज्र बना रहे हैं। किन्तु इतना कहने के बाद नायक को तुरन्त अपने कहने में दोष भी प्रतीत होता है। चन्द्रमा की किरणों से एवं कामदेव के बाणों से मिलनेवाला कष्ट तो वाञ्छनीय है, यदि वह कष्ट मदिरायतनयना शकुन्तला को लेकर मिल रहा हो तो। कवि कालिदास की यह शैली रही है कि वे एक विचार की प्रस्तुति करने के बाद, उस उक्ति में रहे वाग्दोष को दूर करने के लिए, पक्षान्तर में रहे अदोष, एवं यथार्थ विचार की प्रस्तुति करने लिए “अथवा” निपात का प्रयोग करते हैं। मतलब कि 3-4 और 3-5 के बीच में जो “अथवा” निपात का उपयोग हुआ है वह श्लोक 3-4 की मौलिकता को सिद्ध करता है। अतः 3-3 को ही प्रक्षिप्त कहना उचित होगा।
यहाँ कहने का तात्पर्य यही है कि तृतीयांक के आरम्भ में नायक के मुख में रखे गये उपर्युक्त इन तीन श्लोकों को, जो “अपि च” एवं “अथवा” निपातों से बाँधे गये हैं, उनकी