भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 262 में से

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पृष्ठ 68

54 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

विचारसातत्य तथा पुनरुक्ति आदि के मानदण्ड से परीक्षा की जाय तो 3-3 का प्रक्षिप्त होना दिखायी दे रहा है। एक सिद्धान्त के रूप में कहा जाय तो बंगाली वाचना में “अपि च” का प्रयोग प्रक्षेप का प्रसव-स्थान हो सकता है, और “अथवा” का प्रयोग होने पर वह देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षेप करने का अनुकूल स्थान बन गया है। राघवभट्ट के द्वारा मान्य किये गये पाठ में “अद्यापि नूनं हरकोपवह्निः०” (3-3) श्लोक नहीं दिया गया है। तथा “अनिशमपि मकरकेतुर्मनसो०” (3-5) श्लोक को भी हटाया गया है³⁵।।

3-1-2 बंगाली पाठ के तृतीयाङ्क में श्लोक-7 भी प्रक्षिप्त सिद्ध होता है। जैसे कि-दुःषन्त मदनावस्था में शकुन्तला के पास पहुँचने के लिए उसे ढूँढता है और अनुमान लगाता है कि इस बालपादपों वाली वीथी से गुजरकर वह सुतनु अभी अभी गयी होगी। वह कैसे? तो

संमीलन्ति न तावद् बन्धनकोशास्तयावचितपुष्पाः।
क्षीरस्निग्धाश्चामी दृश्यन्ते किसलयच्छेदाः।।
3-7

इस श्लोक में कहा गया है कि-शकुन्तला ने जिस पौधे से पुष्पचयन किया है उसके बन्धनकोश अभी बंद नहीं हुए हैं। तथा किसलय के छेदों में से अभी भी दूध निकलने से वे स्निग्ध दिख रहे है। इससे नायक को लगता है कि शकुन्तला थोड़ी देर पहले ही यहाँ से गयी है। लेकिन यह श्लोक आन्तरिक सम्भावना की दृष्टि से देखा जायेगा तो मौलिक नहीं है क्योंकि कवि ने शकुन्तला का वनस्पति-प्रेम वर्णित करते हुए कहा है कि उसको सभी वृक्ष एवं लताओं के प्रति सहोदर जैसा स्नेह है। और, उसको मण्डन करना प्रिय होते हुए भी वह कभी भी वृक्षों से एक पल्लव भी नहीं तोड़ती थी।³⁶ इसी कृति में शकुन्तला का जो प्रकृति-प्रेम प्रदर्शित किया गया है उसके अनुसार तो वह रास्ते में आते-जाते पुष्पों और किसलयों को तोड़ती हुई नहीं जा सकती है। इससे प्रमाणित होता है कि उपर्वनिर्दिष्ट 3-7 श्लोक प्रक्षिप्त ही है।

3-1-3 आन्तरिक सम्भावना के मानदण्ड से सोचा जाय तो इस अङ्क का श्लोक 11 भी प्रक्षिप्त कहना पड़ेगा। अनसूया शकुन्तला की मदनावस्था को देख कर बोलती है कि शकुन्तला को जो अङ्गसंताप हो रहा है वह बलवान् है। अतः शकुन्तला को कुछ पूछना चाहती है। यह सुन कर दुष्यन्त को भी मन में होता है कि शकुन्तला को पूछ लेना ही चाहिए। क्योंकि


  1. श्री पी.एन. पाटणकर के द्वारा सम्पादित किये गये देवनागरी के शुद्धतर पाठ में 3-3 एवं 3-5 श्लोकों को मान्य किया गया है। अर्थात् वे पुनरुक्तियुक्त प्रक्षिप्त श्लोक को नहीं पहचान पाये हैं।
  2. नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्। चतुर्थाङ्क, श्लोक 11