अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 55
शशिकरविशदान्यस्यास्तथा हि दुःसहनिदाघशंसीनि।
<div align="right">3-11</div>
भिन्नानि श्यामिकया मृणालनिर्माणवलयानि।।
“शकुन्तला ने अपने हाथों में मृणालतन्तुओं से बनाये वलय पहने हैं वह चन्द्रकिरण जैसे शुभ्र होते हुए भी श्याम हो गये हैं, जो शकुन्तला के अङ्गसंताप को कह रहे हैं।” इस श्लोक में “मृणालनिर्माणवलयानि” शब्द बहुवचन में है, वह पूर्व श्लोक (3-10) के “प्रशिथिलितमृणालैकवलयम्” के साथ असम्बद्ध सिद्ध होता है। पहले जब कहा जाता है कि शकुन्तला के हाथ में मृणाल का एक वलय प्रशिथिल है, तब तुरन्त ही अनुगामी श्लोक में कहा जाय कि शकुन्तला ने मृणाल से बने अनेक वलय पहने हैं, तो वह वदतोव्याघात है। अतः 3-11 श्लोक को प्रक्षिप्त मानना ही उचित होगा। इस नाट्यकृति के प्रत्येक शब्द, वाक्य को स्मृतिपट पर रखते हुए पुनरुक्ति या परस्पर विसंगतता है या नहीं, इसका यदि विचार किया जायेगा तो अनेक प्रक्षिप्त स्थानों को पहचाना जा सकेगा।
3-1-4 तृतीयांक में श्लोक 16 एवं 17 को अवतारित करने के लिए “अपि च” निपात का विनियोग किया गया है। अतः इन दोनों की भी समालोचना करणीय है।
राजा-
अयं स ते तिष्ठति संगमोत्सुको
<div align="right">3-16</div>
विशङ्कसे भीरु यतोऽवधीरणाम्।
लभेत वा प्रार्थयिता न वा श्रियं
श्रियो दुरापः कथमीप्सितो भवेत् ।।
अपि च-
अयं स यस्मात्प्रणयावधीरणाम्
<div align="right">3-17</div>
अशङ्कनीयां करभोरु शङ्कसे।
उपस्थितस्वां प्रणयोत्सुको जनो
न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत् ।।
इन दोनों श्लोकों में “अवधीरणा” शब्द की पुनरुक्ति ही विचार करने को प्रेरित करती है कि इन में से कोई एक श्लोक मौलिक नहीं होगा। काव्यशास्त्रियों ने (और इनका अनुसरण करनेवाले टीकाकारों ने) श्लोक 3-16 में उद्देश्य-प्रतिनिर्देश्य का प्रक्रमभङ्ग³⁷
³⁷. यहाँ (त्वं श्रीः) विशङ्कसे-यह उद्देश्य दल है, किन्तु तृतीय चरण में प्रतिनिधैर्य के रूप में प्रार्थयिता (नरः) है। इसको प्रक्रमभङ्ग दोष कहते हैं जिसके कारण इसका अर्थ समझना थोड़ा विलम्बित हो जाता है।