भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 262 में से

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पृष्ठ 70

56 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

हो रहा है, जो एक काव्यदोष है ऐसा कहा है। तथा पूर्वापर चरणों का व्यत्यय करके पाठ प्रस्तुत करने का सुझाव दिया है। और “कथं न लभ्येत नरः श्रियार्थितः” ऐसा नया पाठ भी सूचित किया है, जिससे पर्यायप्रक्रमभङ्ग का दोष नहीं आयेगा। इस तरह काव्यदोष के परिहार करने के दो दो सुझाव प्रस्तुत करने के बाद भी किसी काव्यरसिक व्यक्ति ने तीसरे उपायान्तर के रूप में एक नया श्लोक ही लिख कर उसे मूल पाठ में “अपि च” के द्वारा प्रक्षिप्त कर देने की चेष्टा की है। “अवधीरणा” शब्द की पुनरुक्ति के साथ जो दूसरा श्लोक हमारे सामने आ रहा है उसका राज्ञ सम्भवतः उपर्युक्त काव्यदोष है। इस दूसरे श्लोक की मौलिकता की आशङ्का को दृढ करनेवाला “प्रणय” शब्द है, जो दो बार इसमें प्रयुक्त हुआ है। पूर्व श्लोक में संगम की उत्सुकता व्यक्त करने के बाद प्रणय की उत्सुकता दिखाना वह भी एक तरह का क्रमभङ्ग ही है। “अपि च” निपात से बाँधे गये श्लोक से ऐसी अपेक्षा रहती है कि वह कुछ नये अर्थ, नये दृश्य का समुच्चय प्रस्तुत करे। प्रणय एक लम्बी राह है, जिसमें संगम अन्तिम लक्ष्य है। अतः संगमोत्सुक बोल देने के बाद नायक अपने को प्रणयोत्सुक कहे वह अनुचित लगता है। सारभूत बात यही निकलती है कि “अपि च” से प्रस्तुत हुआ दूसरा श्लोक प्रक्षिप्त है।

3-1-5 बंगाली वाचना के तृतीयांक का नाम “शृङ्गारभोग” रखा गया है, जिसमें दुःषन्त-शकुन्तला का गान्धर्वविवाह वर्णित है। इसमें दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपने कुल की प्रतिष्ठा के रूप में घोषित किया है। इस सन्दर्भ में जो संवादशृङ्खला मिलती है वह निम्नोक्त हैः

प्रियंवदा- (जनान्तिकम्) अणूसूए, पेक्ख पेक्ख, मेहवादाहदं विअ गिम्हे मोरिं खणे खणे पच्चाअदजीविदं पिअसहिं। (अनसूये, प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व मेघवाताहतामिव ग्रीष्मे मयूरीं क्षणे क्षणे प्रत्यागतजीवितां प्रियसखीम्।)

शकुन्तला-हला, मरिसावेध लोअवालं जं अम्हेहिं बीसद्धपलाविणीहिं उवआरादिक्कमेण भणिदं। (सख्यौ, मर्षयतं लोकपालं यदस्माभिः विस्रब्धप्रलापिनीभिः उपचारातिक्रमेण भणितम्।)

सख्यौ- (सस्मितम्) जेण तं मन्तिदं सो ज्जेव मरिसावेदु। अणस्स को अच्चओ। (येन तत् मन्त्रितं सः एव मर्षयतु। अन्यस्य कः अत्ययः।)

शकुन्तला-अरिहदि क्खु महाराओ इमं पच्चक्खवअणं विसोढुं। परोक्खं वा किं ण मन्तीअदि। (अर्हति खलु महाराजः इदं प्रत्यक्षवचनं विषोढुं, परोक्षं वा किं न मन्त्रयते।)

राजा- (सस्मितम्)

अपराधमिमं ततः सहिष्ये यदि रम्भोरु तवाङ्गसङ्गसृष्टे।
कुसुमास्तरणे क्लमापहं मे सुजनत्वादनुमन्यसेऽवकाशम्॥
3-24