भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 262 में से

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पृष्ठ 71

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 57

प्रियंवदा - ण एत्तिकेण उण तुट्टी भविस्सदि। (नैतावता तुष्टिः भविष्यति।)

शकुन्तला - (सरोषमिव) विरम दुल्ललिदे। एदावत्थं गदाए वि मए कीळसि। (विरम दुर्ललिते। एतदवस्थां गतयापि मया क्रीडसि।)

यहाँ दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपनी कुलप्रतिष्ठा के रूप में प्रतिज्ञात किया तब उसकी दोनों सहेलियाँ पूर्ण रूप से आश्वस्त हो जाती हैं और शकुन्तला भी बहुत हर्षित होती है। अब वह अपनी सहेलियों को लोकपाल से क्षमायाचना करने को कहती है क्योंकि अनसूया ने राजा को कहा था कि-महाराज, बहुवल्लभा खलु राजानः श्रूयन्ते। तत यथा इयं नः प्रियसखी बन्धुजनशोचनीया न भवति, तथा करिष्यसि। इन शब्दों के द्वारा अनसूया ने राजा के प्रति अन्यत्र प्रेमासक्त होने की जो सूक्ष्म आशङ्का व्यक्त की थी वह शकुन्तला की दृष्टि में उचित नहीं थी। अतः वह राजा से क्षमा माँगने को कहती है। किन्तु सहेलियाँ शकुन्तला को ही क्षमा माँगने को कहती हैं क्योंकि "हला, अलं वाम् अन्तःपुरविरहपर्युत्सुकेन राजर्षिणा उपरोधेन।" ऐसा कहकर शकुन्तला ने ही पहले राजा के प्रति उपचार का अतिक्रमण किया था। अतः जिसने उपचार का भङ्ग किया हो वही क्षमा माँगे। तब शकुन्तला महाराज दुष्यन्त को कहती है कि जो प्रत्यक्ष वचन (मुँह पर) कहा गया है उसे नजरअंदाज कर लीजिए क्योंकि लोग परोक्ष में तो ऐसी कई बातें बोलते रहते हैं। इस संवाद की पङ्क्तियाँ उपरि भाग में दी गयी हैं। किन्तु वह शकुन्तला के उदात्त चरित से बिलकुल विपरीत है। किसी भी व्यक्ति की पीठ के पीछे कुछ भी बोला जा सकता है ऐसा कहनेवाली शकुन्तला उच्च कोटि की नायिका सिद्ध नहीं हो सकती है। साथ में, राजा ने इस प्रसंग में जो श्लोकबद्ध प्रतिभाव दिया है वह किसी भी अभिरूपभूयिष्ठा परिषत् की सुरुचि का भङ्ग करनेवाला है। कोई भी नायक रंगमंच पर ही नायिका के साथ सहशयन की माँग करे वह सर्वथा अश्लील है। इस नाट्यकृति के आरम्भ में ही कवि ने अपने नायक का परिचय देते हुए कहा है कि "साक्षात् पश्यामीव पिनाकिनम्" अर्थात् दुष्यन्त भगवान् शङ्कर जैसा धीरोदात्त नायक है। वह जाहिर में और प्रकट शब्दों में शकुन्तला से सहशयन की माँग नहीं कर सकता है। अतः मानना होगा कि किसी सूत्रधार ने ही अपने स्थल-काल के दर्शकों की रुचि के अनुसार ऐसा अश्लील श्लोक नायक के मुख में रख दिया होगा।

तथैव, नायक की उक्ति के पीछे प्रियंवदा की जो उक्ति है (नैतावता तुष्टिर्भविष्यति।) वह तो नितान्त ग्राम्य है। रंगभूमि पर ऐसी अश्लील बातें कहलाने वाले कवि कालिदास नहीं हो सकते हैं। प्रकृत संवाद नायिका, नायक और प्रियंवदा के लिए कथमपि शोभास्पद नहीं होने से आन्तरिक सम्भावना के विरुद्ध है। अतः इस पूरे संवाद को प्रक्षिप्त मानना ही होगा।

3-1-6 तीसरे अङ्क का एक उदाहरण द्रष्टव्य है, जिसमें भी नायक के उदात्त चरित से विपरीत एवं गलत सोचवाली श्लोकरचना प्रस्तुत हुई है।