भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 262 में से

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पृष्ठ 72

58 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

राजा- (स्वागतम्)

अप्यौत्सुक्ये महति दयितप्रार्थनासु प्रतीपाः काङ्क्ष्यन्त्योऽपि व्यतिकरसुखं कातराः स्वाङ्गदाने। आबाध्यन्ते न खलु मदनेनैव लब्धान्तरत्वाद् आबाधन्ते मनसिजमपि क्षिप्तकालाः कुमार्यः।।³⁸ 3-27

(शकुन्तला गच्छत्येव)

इस श्लोक में नायक दुष्यन्त कुमारिका स्त्रियों की मानसिकता को विशद करता हुआ जो बोल रहा है उसमें भी उसकी ही भोगेच्छा खुल कर बाहर आ रही है। किन्तु प्रासंगिक दृष्टि से सोचा जाय तो रंगमंच से सहेलियों के चले जाने के बाद कुछ ज्यादा समय तो बीता नहीं है और शकुन्तला के साथ कोई प्रेमगोष्ठियाँ भी अभी हुई नहीं हैं, उससे पहले दुष्यन्त की उपर्युक्त श्लोकोक्ति नायक की अधीरता प्रकट करनेवाली है। प्रेमकथाओं में प्रणयि-युगल के बीच जो स्वाभाविक रूप से संवनन प्रक्रिया क्रमशः विकसित होती है और जो इस अङ्क में आगे आनेवाले मृणाल-वलय प्रसंग में दृश्यमान होनेवाली है, उसकी प्रस्तुति होने से पहले दुष्यन्त का यह आत्मगत चिन्तन सामयिक नहीं है। अतः यह उपर्युक्त श्लोक भी प्रक्षिप्त लगता है।

3-1-7 तृतीयांक में प्रियंवदा और अनसूया मृगबाल को उनकी माता के पास पहुँचाने का बहाना बना कर लतामण्डप से दूर चली जाती हैं। अब रंगमंच पर दुष्यन्त और शकुन्तला अकेले हैं। सखीजनों की भूमिका पर अब दुष्यन्त खड़ा है। मध्याह्न का समय होने से वह शकुन्तला को नलिनीदल से आर्द्र वायु का संचार करने का इच्छुक है, और शकुन्तला कहे तो उसके चरणों का संवाहन करने को भी तैयार है। किन्तु शकुन्तला माननीय व्यक्ति से ऐसी सेवा लेना उचित नहीं समझती है। अतः वहाँ से उठ कर चली जाती है। दुष्यन्त उसके पीछे चल पड़ता है और उसका पल्लू पकड़ कर रोकने की चेष्टा करता है। शकुन्तला कहती है-पौरव, रक्ष विनयम्। इतस्ततः ऋषयः संचरन्ति। इस संवाद के बाद राजा की जो उक्ति है, उसकी मौलिकता संदेहास्पद है:

राजा- सुन्दरि, अलं गुरुजनाद् भयेन। न ते विदितधर्मा तत्रभवान् कण्वः खेदमुपयास्यति।


  1. अनुवाद: राजा-(स्वगत) ये कुमारिकायें अतिशय इच्छा रखती हुई भी अपने प्रियतम के प्रतिकूल बर्ताव करती हैं। यद्यपि मिलन-सुख की अभिलाषा रखती हैं, फिर भी अपना अंग समर्पित करने में कातरता दिखाती हैं। अतएव मालूम होता है कि समय पाकर केवल कामदेव ही उनको पीड़ित नहीं करता, बल्कि व्यर्थ में समय बिता कर ये कामदेव को भी बाधा पहुँचाती हैं।
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