भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 59

गान्धर्वेण विवाहेन बह्व्योऽथ मुनिकन्यकाः।
श्रूयन्ते परिणीतास्ताः पितृभिश्चाभिनन्दिताः॥
3-28

(दिशोऽवलोक्य) कथं प्रकाशं निर्गतोऽस्मि। (शकुन्तलां हित्वा पुनस्तैरेव पदैः प्रतिनिवर्तते।)

शकुन्तला- (पदान्तरे प्रतिनिवृत्य साङ्गभङ्गम्) पौरव, अणिच्छापूरओ वि संभासणमेत्तएण परिचिदो अअं जणो ण विसुमरिदव्वो।।

यहाँ, लतामण्डप से बाहर निकल कर जा रही शकुन्तला के पीछे दुष्यन्त भी चल पड़ता है तब उसको सावधान करने के लिए शकुन्तला ने “यहाँ वहाँ ऋषिमुनि लोग घूम रहे होंगे” ऐसा कहा है। इस सन्दर्भ में दुष्यन्त कहता है कि गुरुजनों से भय रखने की आवश्यकता नहीं है, कण्व भी (तुझे प्रेमासक्त या विवाहित जान कर) खेद का अनुभव नहीं करेंगे। अर्थात् तुझ पर नाराज नहीं होंगे। दुष्यन्त यहाँ विशेष में यह भी कहता है कि गान्धर्व-विवाह से विवाहित हुई बहुत सी मुनिकन्यायें हैं, जो (बाद में) पिताओं के द्वारा अभिनन्दित भी की गयी हैं। इस श्लोक पर किसी विद्वान् ने नुकताचीनी शायद नहीं की है। लेकिन सम्भव है कि किसी साहित्यरसिक की दृष्टि में, दुष्यन्त ने ही यहाँ शकुन्तला को गान्धर्व-विवाह के लिये उकसाया है-ऐसा भाव उठ सकता है। ऐसी संवित्ति मुखर हो कर सामने आये या न आये, लेकिन शकुन्तला जब कह रही है कि आसपास में ऋषि-मुनि घूम रहे होंगे, तब जो विनीत बर्ताव की अपेक्षा है, उससे विपरीत दुष्यन्त गुरुजनों से डरने की कोई जरूरत नहीं है ऐसा समझाने का उपक्रम शुरू करे वह दुष्यन्त के चरित के अनुरूप नहीं है। किन्तु दुष्यन्त के मुख में रखा गया प्रथम वाक्य एवं “गान्धर्वेण विवाहेन”० वाला श्लोक बीच में से हटाया जाय तो, जो रंगसूचना-पुरस्सर का अनुगामी वाक्य है- “(दिशोऽवलोक्य) कथं प्रकाशं निर्गतोऽस्मि। (शकुन्तलां हित्वा पुनस्तैरेव पदैः प्रतिनिवर्तते।)”, वह बिलकुल सही सिद्ध होता है। इसमें विचार-सातत्य भी है, और दुष्यन्त का लतामण्डप में वापस चला जाना भी शकुन्तला की उक्ति से सुसम्बद्ध है। महाभारत के शकुन्तलोपाख्यान में दुष्यन्त गान्धर्व-विवाह के लिए बहुत उतावला हो गया है। उस मूल कथा में सुधार के लिये उद्यत हुए महाकवि के लिए प्रेम का उदात्त चित्र खींचना मुनासिब है तो उसको अपनी कलम से गान्धर्व-विवाह का प्रस्ताव कराकर किसी मुग्धा मुनिकन्या को उकसाने की जरूरत नहीं थी। इसे, अर्थात् गान्धर्वेण विवाहेन० वाले श्लोक को प्रक्षिप्त मानकर हटा देने से दुष्यन्त के उदात्त चरित की भी रक्षा होती है और शकुन्तला की उक्ति के साथ “कथं प्रकाशं निर्गतोऽस्मि” जैसा दुष्यन्त का प्रतिभाव भी सुसंगत ठहरता है। यहाँ एक अन्य हकीकत की ओर ध्यान-आकृष्ट करना अनिवार्य है कि एकमात्र काश्मीर-प्रान्तीय शारदालिपि में लिखित पाण्डुलिपियों³⁹ में यह (गान्धर्वेण विवाहेन०


  1. ऑक्सफोर्ड की पाण्डुलिपि क्रमांक-1247 एवं 159