भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 262 में से

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पृष्ठ 74

60 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

वाला) श्लोक नहीं है। कहने का तात्पर्य यही है कि शकुन्तला को लतामण्डप से बाहर चले जाने के बाद, दुष्यन्त भी जब वहाँ से बाहर आ जाता है तब “यहाँ वहाँ ऋषिमुनि लोग घूम रहे होंगे” ऐसी शकुन्तला की उक्ति के साथ तो, “(दिशोऽवलोक्य) कथं प्रकाशं निर्गतोऽस्मि।” का सन्धान ही मौलिक प्रतीत होता है। यद्यपि यह श्लोक बंगाली, मैथिली, देवनागरी एवं दाक्षिणात्य-इन चारो वाचनाओं में संचरित हुआ है, तथापि शारदा पाण्डुलिपिओं में उसका न होना अनुपेक्ष्य होने के साथ पुनर्विचारणीय भी है⁴⁰।

तीसरा ध्यातव्य बिन्दु यह है कि इस श्लोक के बाद जो दृश्यावली प्रस्तुत होती है उसमें नायक-नायिका के बीच मृणालवलय पहनाने का प्रेमभरा जो सहचार है वही सही स्वरूप में मदनलेखादि के पूर्वप्रसंगों के अनुसन्धान में समुचित लगता है, जिसके आधार पर ही (बिना किसी तरह से उकसाये) दोनों का प्रेममिलन नैसर्गिक प्रतीत होता है।

3-1-8 (क) बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में 41 श्लोकों का विस्तार है, उसके सामने देवनागरी वाचना के तृतीयाङ्क में 23 या 24 श्लोक सम्मिलित हैं। अर्थात् देवनागरी की अपेक्षा से बंगाली में 17 श्लोक अधिक हैं। अभी तक हमने उनमें से 7 श्लोकों के प्रक्षिप्त होने की चर्चा की है। किन्तु इनके अलावा जो 10 श्लोक अवशिष्ट रहते हैं और इनके आगे-पीछे आये हुए गद्य संवाद हैं-इतने अंश में जो प्रसंग, जो दृश्य रखा गया है वह प्रक्षिप्त है या मौलिक, उसकी भी चर्चा करना यहाँ नितान्त आवश्यक है।। इस सन्दर्भ में सब से पहले तो पुण्यश्लोक डॉ० श्री एस. के. बेलवलकर जी का ही नाम स्मरण करना होगा। क्योंकि भारतीय पाठालोचना के धुरन्धर विद्वान् के रूप में वे अग्रगण्य हैं, और अविस्मरणीय भी। उन्होंने विश्व के रसिकों को यह दिखाया है कि अभिज्ञानशाकुन्तल के तृतीयांक के प्रचलित (देवनागरी एवं दाक्षिणात्य) पाठ में समय की विसंगति है। जैसे कि-दोनों सहेलियों के चले जाने के बाद, दुष्यन्त शकुन्तला को नलिनीदल से पवन झलने की एवं उसके पद्मताम्र चरणों का संवाहन करने की तत्परता दिखाता है। लेकिन शकुन्तला माननीय व्यक्ति से ऐसी सेवा लेकर अपने आपको अपराधी बनाना नहीं चाहती है, इस लिए वो वहाँ से उठ कर चली जाना चाहती है। तब दुष्यन्त ने कहा है कि-सुन्दरि, अपरिनिर्वाणो दिवसः। इयं च ते शरीरावस्था। ...... कथमातपे गमिष्यसि परिबाधा पेलवैरङ्गैः।। (3-19)। अर्थात् अभी तो मध्याह्न का समय है, दिवस पूर्ण होने की काफी देर है। ऐसा कहने के बाद, देवनागरी पाठ में केवल पाँच संवाद के बाद ही नेपथ्योक्ति आती है कि-चक्रवाकवधूके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्। उपस्थिता रजनी। (गौतमी आ जाती है और शकुन्तला को लेकर रंगभूमि से निकल जाती है।) अर्थात् पाँच-छह संवाद के बाद ही “रात्रि उपस्थित हो


  1. डॉ० दिलीप कुमार काञ्जीलाल ने इस गान्धर्वेण विवाहेन श्लोक के सन्दर्भ में उच्चतर समीक्षा के नाम पर कुछ भी निर्देश नहीं किया है। (द्रष्टव्य-A Reconstruction of the Śakuntalam, Introductory Chapter 2, page 68)