अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ें| अभिज्ञानशाकुन्तलम् | प्रस्तावना | 61 |
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गयी है" ऐसी समय की सूचना जिसमें आती है वह पाठ निश्चित रूप से ऐसा है जिसमें बीच में कटौती की गयी है। यहाँ किसी अज्ञात सूत्रधार के द्वारा कुछ श्लोकों में एवं उनसे जुड़े गद्य-संवादों में संक्षेप किया गया है। राघवभट्टादि जैसे मूर्धन्य टीकाकारों के द्वारा उसी संक्षिप्त किये गये पाठ का समादर होने के कारण उसे ही मौलिक मान लिया गया। परन्तु डॉ० श्री एस. के. बेलवलकरजी जैसे सूक्ष्मेक्षिका से पाठ-परीक्षण करनेवाले विद्वान् ने मध्याह्न और रात्रि के बीच में जो अपेक्षित काल-व्यवधानकी विसंगति है उसकी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।$^{41}$ इसी लिए यह न केवल अपेक्षित ही, बल्कि अनिवार्य भी है कि हम देवनागरी पाठ की संक्षिप्तता समझने के लिए बंगाली पाठ से उसकी तुलना करें। तथा पूर्वग्रह से जिस बंगाली पाठ को प्रक्षेपों से भरा मान लिया गया है उसकी मौलिकता को पहचानें, अथवा बिना परीक्षा किये उसकी उपेक्षा न करें।।
बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में, जिन दो प्रसंगों का प्रक्षेप माना गया है वह हैं: 1. शकुन्तला को मृणाल-वलय पहनाने का, एवं 2. कर्णोत्पलरेणु से शकुन्तला की दृष्टि कलुषित होने पर दुष्यन्त द्वारा अपने वदनमारुत से उसे विशद कर देने का। इन दोनों प्रसंगों की मौलिकता जांचने के लिए तृतीयाङ्क का 39वाँ श्लोक कृतिनिष्ठ “आन्तरिक प्रमाण” के रूप में विश्लेषणीय है।
तस्याः पुष्पमयी शरीरलुलिता शय्या शिलायामियं
<p align="right">3-39</p>
कान्तो मन्मथलेख एष नलिनीपत्रे नखैरर्पितः।
हस्ताद् भ्रष्टमिदं बिसाभरणमित्यासज्यमानेक्षणो
निर्गन्तुं सहसा न वेतसगृहादीशोडस्मि शून्यादपि।।
यह श्लोक, शकुन्तला को लेकर गौतमी के चले जाने के बाद वेतसगृह में अकेला खड़ा, दुष्यन्त बोलता है। वह शकुन्तला की तीन चीजों का परिगणन करता है, 1. शकुन्तला की पुष्पशय्या, 2. उसका लिखा हुआ मदनलेख तथा 3. उसके हाथ से गिरा हुआ बिसाभरण अर्थात् मृणालवलय। यह श्लोक शाकुन्तल की पाँचों वाचनाओं में सर्वसम्मति से ग्राह्य रहा है। तथापि केवल बृहत्पाठ परम्परावाली बंगाली, मैथिली एवं काश्मीरी वाचना की पाण्डुलिपियों में ही यह प्रसंग आता है जिसमें दुष्यन्त शकुन्तला के हाथ से गिरा मृणालवलय उठा लेता है और शकुन्तला के हाथ में पुनः पहनाता है। शाकुन्तल की लघुपाठ परम्परावाली देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में यह मृणाल-वलय पहनाने का प्रसंग आता ही नहीं है। तो फिर उपर्युक्त श्लोक में जिस बिसाभरण अर्थात् मृणालवलय का परिगणन करवाया
- The most cogent objection against its shorter version is the fact that it plays fast and loose with the time-indications of the scene—see: Sringaric elaboration in Śakuntala, Act 3, pub. in "Indian Studies in Honor of C.R. Lanman", Harvard Univ. Press, 1929, pp. 187-192.