अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें62 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
है, उसकी प्रस्तुतता कैसे सिद्ध हो पायेगी? अतः हम यह मानने को बाध्य हो जाते हैं कि उपर्युक्त विशेष प्रसंग मूल शाकुन्तल के पाठ में थे, और मंचन के दौरान किसी अज्ञात सूत्रधार ने उसे हटा दिया होगा। ऐसे संक्षिप्त किये गये पाठ में से शाकुन्तल की लघुपाठ परम्परा शुरू हुई होगी। यहाँ मृणाल-वलय गिर जाने का प्रसंग मूल पाठ में होना आवश्यक इस लिए भी लगता है कि तीसरे अङ्क के आरम्भ में ही “स्तनन्यस्तोशीरं प्रशिथिल-मृणालैक-वलयम्” (श्लोक 3-10) शब्दशः से कहा गया है कि शकुन्तला ने अपने हाथ में जो मृणालवलय पहना था वह शुरू से ही प्रकृष्टतया शिथिल था।⁴² और नाटक मात्र का यह नियम होता है कि उसमें जो भी कहा जाता है वह सप्रयोजन होता है। अतः अङ्क के आरम्भ में यदि दर्शकों को कहा जाता है कि शकुन्तला के हाथ में पहना मृणाल वलय प्रशिथिल है तो ऐसी अपेक्षा रहती है कि अङ्क में मृणाल-वलय गिर जाने का प्रसंग आकारित हो। यह प्रसंग बंगाली आदि बृहत्पाठवाली वाचनाओं में है, किन्तु लघुपाठवाली देवनागरी में नहीं है। किन्तु जैसा उपरि निर्दिष्ट प्रमाणों से सिद्ध होता है कि यह प्रसंग मौलिक ही होगा, तो मानना पड़ेगा कि देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षिप्तीकरण के दौरान उसे मूल पाठ में से हटाया गया है।
3-1-8 (ख) इस मृणाल-वलय का प्रसंग मूलगामी पाठ में होना एक अन्य आन्तरिक सम्भावना से भी समर्थित होता है। उसकी ओर भी सत्यान्वेषी साहित्यरसिकों का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है: जिस लतामण्डप में दुष्यन्त-शकुन्तला का एकान्त मिलन होता है वहाँ आरम्भ में शकुन्तला लतामण्डप से बाहर चली जाती है। तब दुष्यन्त शकुन्तला के मणिबन्धन से गलित हुए मृणालवलय को देखता है, जिसको वह “हृदयस्य निगडम् इव” कहता है⁴³, फिर उसको उठा लेता है और अपने गले लगाता है। तब उस वलय को वापस लेने के बहाने शकुन्तला लतामण्डप में पुनः प्रविष्ट होती है। यहाँ प्रिया शकुन्तला को देखते ही दुष्यन्त सहर्ष बोलता है:- “अये, जीवितेश्वरी मे प्राप्ता।” इसके बाद, दुष्यन्त मृणाल-वलय को वापस लौटाने के लिये एक अभिसन्धि (शर्त) रखता है कि वह स्वयं उसके हाथ में पहनाएगा। शकुन्तला इस अभिसन्धि को मंजूर करती है। दुष्यन्त ने जब शकुन्तला के हाथ में उसे पहनाया तब शकुन्तला के मुख से “त्वरताम् त्वरताम् आर्यपुत्रः।” ऐसा सम्बोधन निकल जाता है। कङ्कण-स्वरूप मृणाल-वलय पहनाने के अवसर पर शकुन्तला के मन में दुष्यन्त के लिये पतिभाव प्रकट हुआ हो यह अत्यन्त स्वाभाविक है। इस दृष्टि से, मृणाल-वलय प्रसंग में नायक-नायिका ने परस्पर जो
- यहाँ श्री शरद रंजन राय (1908 में) ने ऐसा प्रश्न उठाया था कि गिरा हुआ मृणालवलय यदि दुष्यन्त ने पहनाया था, तो अङ्क के अन्त में वह फिर से गिरा कैसे? इसका समाधान देते हुए डॉ० एस. के. बेलवलकरजी ने कहा है कि शकुन्तला ने दोनों हाथ में मृणालवलय पहने होंगे, अतः दूसरे हाथ का वलय गिर गया होगा।
- इस श्लोक को वर्द्धमान ने गणरत्नमहोदधि (12वीं शती) में उद्धृत किया है।