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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

62 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

है, उसकी प्रस्तुतता कैसे सिद्ध हो पायेगी? अतः हम यह मानने को बाध्य हो जाते हैं कि उपर्युक्त विशेष प्रसंग मूल शाकुन्तल के पाठ में थे, और मंचन के दौरान किसी अज्ञात सूत्रधार ने उसे हटा दिया होगा। ऐसे संक्षिप्त किये गये पाठ में से शाकुन्तल की लघुपाठ परम्परा शुरू हुई होगी। यहाँ मृणाल-वलय गिर जाने का प्रसंग मूल पाठ में होना आवश्यक इस लिए भी लगता है कि तीसरे अङ्क के आरम्भ में ही “स्तनन्यस्तोशीरं प्रशिथिल-मृणालैक-वलयम्” (श्लोक 3-10) शब्दशः से कहा गया है कि शकुन्तला ने अपने हाथ में जो मृणालवलय पहना था वह शुरू से ही प्रकृष्टतया शिथिल था।⁴² और नाटक मात्र का यह नियम होता है कि उसमें जो भी कहा जाता है वह सप्रयोजन होता है। अतः अङ्क के आरम्भ में यदि दर्शकों को कहा जाता है कि शकुन्तला के हाथ में पहना मृणाल वलय प्रशिथिल है तो ऐसी अपेक्षा रहती है कि अङ्क में मृणाल-वलय गिर जाने का प्रसंग आकारित हो। यह प्रसंग बंगाली आदि बृहत्पाठवाली वाचनाओं में है, किन्तु लघुपाठवाली देवनागरी में नहीं है। किन्तु जैसा उपरि निर्दिष्ट प्रमाणों से सिद्ध होता है कि यह प्रसंग मौलिक ही होगा, तो मानना पड़ेगा कि देवनागरी वाचना के पाठ में संक्षिप्तीकरण के दौरान उसे मूल पाठ में से हटाया गया है।

3-1-8 (ख) इस मृणाल-वलय का प्रसंग मूलगामी पाठ में होना एक अन्य आन्तरिक सम्भावना से भी समर्थित होता है। उसकी ओर भी सत्यान्वेषी साहित्यरसिकों का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है: जिस लतामण्डप में दुष्यन्त-शकुन्तला का एकान्त मिलन होता है वहाँ आरम्भ में शकुन्तला लतामण्डप से बाहर चली जाती है। तब दुष्यन्त शकुन्तला के मणिबन्धन से गलित हुए मृणालवलय को देखता है, जिसको वह “हृदयस्य निगडम् इव” कहता है⁴³, फिर उसको उठा लेता है और अपने गले लगाता है। तब उस वलय को वापस लेने के बहाने शकुन्तला लतामण्डप में पुनः प्रविष्ट होती है। यहाँ प्रिया शकुन्तला को देखते ही दुष्यन्त सहर्ष बोलता है:- “अये, जीवितेश्वरी मे प्राप्ता।” इसके बाद, दुष्यन्त मृणाल-वलय को वापस लौटाने के लिये एक अभिसन्धि (शर्त) रखता है कि वह स्वयं उसके हाथ में पहनाएगा। शकुन्तला इस अभिसन्धि को मंजूर करती है। दुष्यन्त ने जब शकुन्तला के हाथ में उसे पहनाया तब शकुन्तला के मुख से “त्वरताम् त्वरताम् आर्यपुत्रः।” ऐसा सम्बोधन निकल जाता है। कङ्कण-स्वरूप मृणाल-वलय पहनाने के अवसर पर शकुन्तला के मन में दुष्यन्त के लिये पतिभाव प्रकट हुआ हो यह अत्यन्त स्वाभाविक है। इस दृष्टि से, मृणाल-वलय प्रसंग में नायक-नायिका ने परस्पर जो


  1. यहाँ श्री शरद रंजन राय (1908 में) ने ऐसा प्रश्न उठाया था कि गिरा हुआ मृणालवलय यदि दुष्यन्त ने पहनाया था, तो अङ्क के अन्त में वह फिर से गिरा कैसे? इसका समाधान देते हुए डॉ० एस. के. बेलवलकरजी ने कहा है कि शकुन्तला ने दोनों हाथ में मृणालवलय पहने होंगे, अतः दूसरे हाथ का वलय गिर गया होगा।
  2. इस श्लोक को वर्द्धमान ने गणरत्नमहोदधि (12वीं शती) में उद्धृत किया है।

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“जीवितेश्वरी” और “आर्यपुत्रः” कहा है, वह क्षण दाम्पत्य भाव का अनुभव प्रदर्शित करने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। आगे चल कर जब षष्ठाङ्क में (दुष्यन्त-नामधेयाङ्किता मुद्रिका मिल जाने के बाद) अन्तःपुर की अन्य स्त्रियों के सामने दुष्यन्त के मुख से कदाचित् “गोत्र-स्खलन” हो जाता है, ऐसा निरूपण आता है⁴⁴, तो वह बिलकुल निराधार नहीं लगता।

किन्तु देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में तो यह मृणाल-वलय का प्रसंग नहीं है। अतः वहाँ षष्ठाङ्क में गोत्र-स्खलन का जब निर्देश आता है तब उसका कोई पूर्व-निर्दिष्ट आधार नहीं मिलता। कहने का तात्पर्य यही है कि बंगाली वाचना में मृणाल-वलय का प्रसंग है और उस प्रसंग के निमित्त से दोनों के चित्त में जो सहज दाम्पत्यभाव प्रकट हुआ था उससे ही षष्ठाङ्क में दुष्यन्त से अनजान में होनेवाले गोत्र-स्खलन की स्वाभाविकता प्रतीतिकर बनती है। इस तरह षष्ठाङ्क में आनेवाले गोत्र-स्खलन का निर्देश हमारे लिये मृणाल-वलय के प्रसंग का समर्थक प्रमाण बनता है।

3-1-8 (ग) बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में प्रक्षिप्त माने गये दूसरे प्रसंग की, अर्थात् शकुन्तला की दृष्टि पुष्परज से कलुषित होने पर दुष्यन्त द्वारा अपने वदन-मारुत से निर्मल करने के प्रसंग की मौलिकता भी कृति-निष्ठ अन्तःसाक्ष्य से समर्थित होती है। यहाँ प्रथमतः यही बात विचारणीय है कि शकुन्तला की दृष्टि कलुषित होने जैसे किसी प्रसंग की हम अपेक्षा रख सकते हैं या नहीं? प्रथमाङ्क में वृक्षसेचन के दौरान परिश्रान्त हुई शकुन्तला का वर्णन करते हुए दुष्यन्त ने कहा है, स्रस्तं कर्णाशिरीषरोधि वदने घर्माम्भसां जालकं, बन्धे स्रंसिनि चैकहस्तयमिताः पर्याकुला मूर्धजाः (शाकु. 1-26, राघवभट्ट, पृ. 47) अर्थात् शकुन्तला अपने कर्णों में शिरीष पुष्पों को लगाती थी। इसीलिये षष्ठाङ्क में शकुन्तला का चित्र अंकित करते हुए दुष्यन्त ने फिर कहा है, कृतं न कर्णापितबन्धनं सखे, शिरीषमागण्डविलम्बिकेसरम्। न वा शरच्चन्द्रमरीचिकोमलं मृणालसूत्रं रचितं स्तनान्तरे।। (शाकु. 6-18, राघवभट्ट, पृ. 213) इस तरह शकुन्तला अपने कानों में प्रसाधन के रूप में पुष्प लगाती थी, और इसी लिये कदाचित् उसके नेत्र में पुष्परेणु गिरने की सम्भावना (एवं नाटकीय अपेक्षा) थी। लेकिन यहाँ ऐसा प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या ऐसा कोई प्रसंग महाकवि ने ही अपने हाथों से लिखा होगा? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये उच्च स्तरीय समीक्षा को मान्य हो ऐसा कोई प्रमाण देना आवश्यक है।

महाकवि कालिदास ने इस नाट्यकृति की दृश्यावली में सर्वत्र एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप खड़ा करने की जिस कलात्मक सर्जनविधा का साद्यन्त विनियोग किया है उसकी ओर सब का ध्यान आकृष्ट करने की जरूरत है। उदाहरण के रूप में-प्रथमाङ्क में


  1. दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचिताम् अन्तःपुरेभ्यो यदा, गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम्।
    शाकु. 6-5 (राघवभट्ट, पृ० 195)

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मृगया-विहारी दुष्यन्त का कण्वमुनि के आश्रम में प्रवेश होते ही-न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन्... शब्द सुनायी पड़ते हैं, वैसे ही सप्तमाङ्क के आरम्भ में दुष्यन्त मारीच के आश्रम में प्रवेश करता है और वहाँ “मा चापलम् कुरु। कथं गत एवात्मनः प्रकृतिम्,” ऐसे शब्द नेपथ्य से आते हैं। यहाँ प्रथमाङ्क में शिकारी दुष्यन्त का जो एक रूप प्रस्तुत किया था, उसका ही दूसरा प्रतिरूप सिंहबाल के साथ खेल रहे सर्वदमन का खड़ा किया गया है। इस तरह महाकवि ने सम्पूर्ण कृति में एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप (एक दृश्य के सामने दूसरा प्रतिदृश्य) खड़ा करने की स्पृहणीय नाट्य-शैली का मार्ग अपनाया है। यह नाट्य-शैली भी हमारे लिये कृति-निष्ठ अन्तःसाक्ष्य बन सकती है और उसके आधार पर बंगाली (मैथिली और काश्मीरी) वाचना के तृतीयाङ्क में शकुन्तला की दृष्टि कर्णोत्पल रेणु से कलुषित होने का जो प्रसंग वर्णित किया गया है उसका समर्थन किया जा सकता है। जैसे तृतीयाङ्क में दुष्यन्त ने अपने वदन-मारुत से शकुन्तला की दृष्टि निर्मल कर दी थी, उसी एक दृश्य के सामने, षष्ठाङ्क में कवि ने दूसरा प्रतिदृश्य भी खड़ा किया है। धीवर के पास से जब मुद्रिका मिल जाती है और दुष्यन्त को शकुन्तला का पुनःस्मरण हो जाता है तब शकुन्तला का चित्रांकन करते हुए वह एक श्लोक बोलता हैः

कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी,
पादास्तामभितो निषण्णचमरा गौरीगुरोः पावनाः।
शाखालम्बितवल्कलस्य च तरोर्निर्मातुमिच्छाम्यधः,
शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम्।।

<p align="right">6-17</p>

इसमें कहा गया है कि मुझे (दुःषन्त को) इस चित्र में बह रही मालिनी नदी की बालुका में बैठा एक हंस-मिथुन आकारित करना है। हिमालय की उपत्यका में बैठे चमरों के समूह को बनाना है। वृक्ष की डालियों पर कुछ वल्कल वस्त्र टँगे हों एवं उस वृक्ष के अधो भाग में कृष्णमृग के शृङ्ग पर अपना वाम-नेत्र खुजलाती हुई एक हरिणी भी चित्रित करने की चाहत हो रही है। यहाँ “कण्डूयमानां मृगीम्” का जो चित्र बनाने की इच्छा प्रकट की गयी है वह निरतिशय व्यञ्जनापूर्ण है। षष्ठाङ्क में वर्णित इस प्रसंग का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से तृतीयाङ्क में निरूपित शकुन्तला के नेत्र कलुषित होने के प्रसंग के साथ ही है। वहाँ पर दुष्यन्त ने जब अपने वदन-मारुत से शकुन्तला की दृष्टि को निर्मल कर देने का प्रस्ताव रखा था, तब शकुन्तला ने कहा था कि मेरे मन में तुम्हारे लिये विश्वास नहीं है। किन्तु अब दुष्यन्त इस चित्र से व्यंजित करना चाहता है कि वह अब शिकारी के रूप में शकुन्तला को प्राप्त करना नहीं चाहता अपितु हरिणीस्वरूपा शकुन्तला का सगन्ध और विश्वसनीय हरिण बनके, शकुन्तला का जीवनाधार बनना चाहता है। दुष्यन्त ने तृतीयाङ्क के उसी प्रसंग को स्मरण-पट पर रख कर एक प्रतिदृश्य के रूप में, यह “कण्डूयमानां मृगीम्” का चित्र बनाने

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 65

की इच्छा प्रकट की है। इस तरह एक दृश्य के सामने दूसरा परिदृश्य खड़ा करने की जो निरूपण-शैली समग्र कृति में बार बार दिखायी देती है उसको तार्किक रूप से ही आन्तरिक सम्भावना के रूप में स्वीकारना चाहिए। इस आधार पर पुष्परज से शकुन्तला के नेत्र कलुषित होने का जो प्रसंग है वह प्रक्षिप्त नहीं है, बल्कि सर्वथा मौलिक है ऐसा मानना ही चाहिए।

3-1-9 तृतीयांक के अन्त भाग में भी एक उपान्त्य श्लोक का प्रक्षेप दिख रहा है। शकुन्तला को ले कर गौतमी चली गयी। दुष्यन्त प्रियापरिभुक्त लतावलयाच्छादित वेतसगृह में खड़ा खड़ा उसके मन्मथलेख इत्यादि पर सानुराग दृष्टि से झाँक रहा है और कहता है कि मुझसे इस वेतसगृह से बाहर निकलना आसान नहीं है। ऐसी प्रेमासक्त दशा में फँसे नायक को रंगमंच से निकालने के लिए नाट्यकार कालिदास उसके वीरत्व को ही टटोलते हैं। अतः नेपथ्योक्ति है “भो भो राजन्, सायन्तने सवनकर्मणि संप्रवृत्ते०” (श्लोक-41) अर्थात् सायंकाल होते ही यज्ञकर्म में बाधा डालने के लिए काले-पीले वर्ण के राक्षसों की छायायें आकाश में मंडराने लगी हैं। इसको सुनते ही दुष्यन्त के वीरत्व को चुनौती मिलती है और वह रंग से बाहर दौड़ जाता है। कालिदासीय नाटकों में अन्यत्र भी दिखनेवाली यह पद्धति पूर्ण रूप से नाटकीय है। किन्तु बंगाली वाचना में दुष्यन्त की उक्ति और नेपथ्योक्ति में व्यवधान बननेवाला श्लोक-40 अस्वाभाविक लगता है। जिसमें दुष्यन्त कहता है कि-

रहः प्रत्यासत्तिं यदि सुवदना यास्यति पुन-
र्न कालं हास्यामि प्रकृतिदुरवापा हि विषयाः।
इति क्लिष्टं विघ्नैर्गणयति च मे मूढहृदयं
प्रियायाः प्रत्यक्षं किमपि च तथा कातरमिव॥
3-40

धीरोदात्त चरितवाले नायक के मुख में विषयोपभोग की लालसा प्रकट (या अप्रकट) शब्दों में प्रस्तुत होना दो दृष्टियों से अनुचित है। 1. मूल महाभारत के दुष्यन्त में जो विषयोपभोग के प्रति उतावलापन दिखता है, उसका परिमार्जन करते हुए कालिदास ने हमारे सामने एक धीरोदात्त नायक, जिसको वह नाटक के आरम्भ में ही साक्षात् पिनाकी की उपमा देते हैं, रेखांकित करना चाहता है। उसके मुँह में उपर्युक्त श्लोक के शब्द संगत नहीं बैठते हैं। तथा 2. नाटकीयता की दृष्टि से सोचा जाय तो प्रियासम्बद्ध तीन तीन चीजों को वेतसगृह में ही छोड़कर बाहर निकलना मुश्किल है ऐसा बोल बोले जाने पर ही परिस्थितिवशात् नायक को (प्रेमासक्त दशा को तत्क्षण छोड़ कर) अपनी क्षत्रियता को ललकारने वाली परिस्थिति के सामने लड़ने के लिए रंगभूमि से बाहर निकलने में ही नाटकीयता है। अतः प्रेमासक्त दशा का अनुरणन करनेवाला उपर्युक्त दूसरा श्लोक प्रक्षिप्त ही मानना होगा।

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बंगाली वाचनावाले तृतीयांक के 3, 7, 11, 17, 24, 28 एवं 40 क्रमांक के श्लोक प्रक्षिप्त हो सकते हैं ऐसा अनेक कारणों से अनुमित हो रहा है। इस तरह से, कुल 41 श्लोकों में से प्रक्षिप्त 7 श्लोकों को निकाला जाय तो 34 श्लोकवाला परिमाण अवशिष्ट रहेगा, जो काश्मीरी वाचना के (और पाटण की 349/16630 एवं 169/6654 पाण्डुलिपियों⁴⁵ में संचरित हुए 11वीं शती के 33 या 34 श्लोकवाले) पाठ के साथ मिलता जुलता सिद्ध होगा।

3-2-1 देवनागरी वाचनावाले तृतीयांक के पाठ में संक्षेप हुआ है उसके दो-तीन प्रमाण हमारे सम्मुख पड़े ही हैं, उसे केवल आँख खोलकर देखने की जरूरत है। जैसे, 1. डॉ० एस. के. बेलवलकरजी ने बताया है कि दोनों सहेलियों के चले जाने के बाद दुष्यन्त ने कहा है कि अभी दिवस पूरा नहीं हुआ है, और लतामण्डप के बाहर तो कड़ी धूप है अर्थात् मध्याह्न का समय है। इस उक्ति के नीचे पाँच-छह संवाद के बाद तुरन्त नेपथ्य से आवाज आती है कि “चक्रवाकवधुके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम्, उपस्थिता रजनी।” तो इस तरह की योजना में, अर्थात् मध्याह्न से लेकर रात्रि का प्रारम्भ होने तक का काल केवल पाँच-छह संवाद में ही दिखाना तर्कसंगत नहीं है। यह विसंगति किसी भी दर्शक को खटकनी ही चाहिए। सारभूत बात यही है कि, “अपरिनिर्वाणो दिवसः” और “रजनी उपस्थिता” के बीच में कुछ पाठ्यांश की कटौती हुई होगी ऐसा मानने के लिए हम बाध्य हो जाते हैं। 2. अब इस बात का भी कोई सबूत मिलना आवश्यक है कि यदि कटौती हुई है तो दो कटे हुए भागों को कहाँ, कैसे जोड़ा गया है तथा उसका भी कोई निशान (पदचिह्न) देवनागरी वाचना में कहीं पर है या नहीं?। इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए तृतीयांक का निम्नोक्त श्लोक की ओर, जो केवल देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना में ही मिलता है, ध्यान आकृष्ट करने की आवश्यकता है:

राजा-

अपरिक्षतकोमलस्य यावत् कुसुमस्येव नवस्य षट्पदेन।
अधरस्य पिपासता मया ते सदयं सुन्दरि गृह्यते रसोऽस्य॥

<div align="right">3-21</div>

देवनागरी वाचना का प्रत्येक श्लोक सामान्यतया बंगाली आदि (बृहत्पाठ परम्परा) में मिलता है, लेकिन उपर्युक्त श्लोक तृतीयांक के इस मोड़ पर खड़ा है कि जो मूल पाठ में कटौती का स्थान है। अतः काटे हुए दो स्थानों को जोड़ने के लिए जिस श्लोक की नवीन रचना हुई है वह स्वाभाविक है कि बंगाली आदि वाचनाओं में नहीं होगा क्योंकि उसकी


  1. श्रीहेमचन्द्राचार्य ज्ञान-मन्दिर एवं वाडी पार्श्वनाथ का जैन भण्डार, जिला-पाटण, गुजरात में ये पाण्डुलिपियाँ संगृहीत हैं। उसकी ही वंशज पाण्डुलिपि एल.डी. इन्स्टीट्यूट ऑफ इन्डोलॉजी, अहमदाबाद में 1948 क्रमांक पर है।

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 67

रचना विशेष प्रयोजन से की गयी है। तथा यह श्लोक जिस छन्द में लिखा गया है वह भी हेमचन्द्राचार्य के द्वारा “मालभारिणी” के नाम से 12वीं शती में प्रथम बार अभिज्ञात किया गया है। (उससे पहले भी यह छन्द कालिदास के साहित्य में प्रयुक्त हुआ है, लेकिन वहाँ उसका अभिज्ञान “औपच्छन्दसिक” के नाम से किया जाता था।) अर्थात् शाकुन्तल के मूल पाठ में कटौती करने के बाद, दो भागों को जोड़ने के लिए जो नया श्लोक लिखा गया है, उसका छन्द भी ध्यानास्पद बनता है, क्योंकि राघवभट्ट जब उसकी मालभारिणी जैसे नये नाम से पहचान दे रहे हैं तब वह भी “यह श्लोक उत्तरवर्ती काल में लिखा गया होगा” इसका प्रमाण बन सकता है। 3. बंगाली वाचना में नायक–नायिका का जो प्रेमभरा सहचार वर्णित है उसमें मुख्य रूप से दो प्रसंग हैं। (क) दुष्यन्त ने शकुन्तला के हाथ में मृणालवलय रूप कंकण पहनाया है, तथा (ख) पुष्परज से कलुषित हुई उसकी दृष्टि को वदनमारुत से निर्मल कर दिया है। एवमेव, इन दोनों प्रसंगों के प्रवर्तन में दुष्यन्त ने शकुन्तला को “जीवितेश्वरी” के रूप में उल्लिखित किया है, तथा शकुन्तला ने दुष्यन्त को “आर्यपुत्र” शब्द से सम्बोधित किया है। इससे दोनों के बीच में स्वाभाविक रूप से ही अपनेपन का भाव उदित हुआ है, और इससे सहज प्रेम का एक चित्र प्रस्तुत होता है। लेकिन देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में उपर्युक्त दोनों प्रसंगों को संक्षेपीकरण के आशय से हटाया गया है। अतः उस संक्षिप्त पाठ्यांश में से स्वाभाविक प्रेम का चित्र प्रस्तुत करनेवाले दोनों प्रसंग अदृश्य हो गये हैं। अब इन दृश्यों को हटाकर किसको स्थानापन्न किया गया है? इसकी भी जिज्ञासा होगी। तो यहाँ पर महाभारत के आदिपर्व में आये हुए शकुन्तलोपाख्यान (सम्भवपर्व, अध्याय–67) का अनुकरण करते हुए दुष्यन्त के द्वारा गान्धर्व–विवाह का प्रस्ताव, बल्कि कण्व के आने की प्रतीक्षा किये बिना ही शकुन्तला को गान्धर्व–विवाह का रास्ता बताते हुए उसको उकसाने जैसे प्रसंगों का सन्निवेश किया गया है। महाभारत के शब्द इस तरह के हैं:—

दुःषन्त उवाच— गान्धर्वेण च मां भीरु विवाहेनैहि सुन्दरि।
विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते॥4॥

शकु० उवाच— फलाहारो गतो राजन् पिता मे इत आश्रमात्।
तं मुहूर्तं प्रतीक्षस्व, स मां तुभ्यं प्रदास्यति॥5॥

दुःषन्त उवाच— इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते।
त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि, त्वद्–गतं हि मनो मम॥6॥

68 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

आत्मनो बन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः।
आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः।।7।।⁴⁶

इसमें दुष्यन्त की भोगेच्छा इतनी प्रबल है कि कण्व मुनि नजदीक में ही फलाहार ढूँढने गये हैं ऐसा शकुन्तला के द्वारा कहे जाने पर भी वह उनकी प्रतीक्षा नहीं कर सकता है। गान्धर्व-विवाह करने में धर्म का लोप नहीं होता है इत्यादि कह कर जैसे महाभारत में दुष्यन्त ने शकुन्तला को उकसाया है वैसे ही देवनागरी के परिवर्तित किये गये पाठ में भी गान्धर्व-विवाह वाले श्लोक का नवीन प्रक्षेप करके, शकुन्तला को उकसाया जाता है। नाटक में दुष्यन्त शकुन्तला को सहेलियों से भी सलाह-मशविरा करने के लिए अवकाश नहीं देता है। तथा अपरिक्षतकोमलस्य यावत्० इत्यादि शब्दों से (उपर्युक्त नवीन श्लोक में) दुष्यन्त रंगमंच पर शकुन्तला के अधरोष्ठ का रसपान करने की प्रकट शब्दों में माँग करता है, जो उसके महाभारत-वर्णित स्वरूप के साथ सुसंगत बैठता है। किन्तु वह कालिदास के द्वारा संकल्पित साक्षात् पिनाकिन् जैसे धीरोदात्त चरितवाले नायक से विरुद्ध लगता है। महाकवि कालिदास ने इस नाटक में जो उदात्त चरितवाला नायक निरूपित करने का उपक्रम रखा था उसको संक्षेपीकरण के सिलसिले में दुर्भाग्य से भुला दिया गया, और फिर से महाभारत का भोगेच्छुक और उतावलापन दिखानेवाला दुष्यन्त देवनागरी शाकुन्तल में हाजिर हो गया। साथ में दूसरा दुर्भाग्य यह भी प्रकट हुआ कि यह गान्धर्वेण विवाहेन०वाला देवनागरी वाचना का श्लोक बंगाली एवं मैथिली परम्परा में भी चुपके से प्रविष्ट हो गया। (क्योंकि वह मूल महाभारत में था।) अतः बंगाली पाठ में स्वाभाविक और निर्मल प्रेम का चित्र होने के साथ साथ, उक्त प्रक्षेप के कारण, अधीर दुष्यन्त भी दृश्यमान होने लगा। निष्कर्षतः 1. देवनागरी वाचना के पाठ में से (संक्षिप्तीकरण के कारण) स्वाभाविक प्रेम का चित्र गायब हो गया और महाभारत के भोगेच्छुक दुष्यन्त का पुनरागमन हुआ तथा 2. बंगाली वाचना में स्वाभाविक चित्र यथावत् रहते हुए भी महाभारत का उतावलापन दिखाता हुआ, गान्धर्व-विवाह का रास्ता जताता हुआ, भोगेच्छा को मुखरित करता हुआ दुष्यन्त भी आकारित किया गया। पहले में संक्षेपजनित क्षति है, तो दूसरे में प्रक्षेपजनित विकृति है। किन्तु दोनों परम्पराओं की उच्च स्तरीय पाठालोचना करने से इन दोनों को, याने संक्षेप और प्रक्षेप को पहचाना जा सकता है। यदि उसे नहीं पहचानेंगे तो कालिदास के अभिमत नायक को हम नहीं देख सकेंगे। (आज पाण्डुलिपियों में संचरित हुए देवनागरी पाठ में महाभारत का दुष्यन्त है और उपलब्ध बंगाली पाण्डुलिपियों के पाठ में दो रूपवाला दुष्यन्त दिखायी दे रहा है।)

3-2-2 देवनागरी वाचना में संक्षेप का दूसरा प्रमाण भी सरलता से देखा जा सकता


  1. महाभारते आदिपर्वणि, सम्भवपर्वणि अध्यायः 67 (श्लोकाः 4, 5, 6 एवं 7) भण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पुणे, 1933

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 69

है। यहाँ तृतीयांक का जो उपान्त्य श्लोक है उसमें, “हस्ताद् भ्रष्टं बिसाभरणम्” शब्दों के होते हुए भी शकुन्तला के हाथ से गिरते हुए किसी मृणाल-वलय का निर्देश नहीं है। दूसरी ओर अङ्क के आरम्भ में तो कहा गया था कि शकुन्तला ने अपने हाथ में जो मृणालवलय पहना है वह प्रशिथिल है लेकिन उसके गिरने का प्रसंग देवनागरी पाठ में कहीं है ही नहीं, जो संक्षिप्त किये गये पाठ का सबल प्रमाण बनता है।

3-2-3 देवनागरी पाठ में प्रक्षेप के उदाहरण भी कुत्रचित् मिलते हैं। जैसे कि तृतीयांक में जब शकुन्तला ने कहा कि उसे उस राजर्षि की अनुकम्पा का भाजन बनाया जाय तब दोनों सहेलियों ने उसे अभिनन्दन देने का विचार किया। क्योंकि शकुन्तला जिसमें आसक्त हुई थी वह पौरवों में ललामभूत था। प्रियंवदा की उक्ति है-सखि, दिष्ट्या अनुरूपस्ते अभिनिवेशः। सागरम् उज्झित्वा कुत्र वा महानदी अवतरति। क इदानीं सहकारम् अन्तरेणातिमुक्तलतां पल्लवितां सहते। यहाँ दो उपमानों से शकुन्तला का अभिनन्दन किया जा रहा है। परन्तु उसमें एक ही विचार की पुनरुक्ति भी हो रही है। इसके सामने बंगाली वाचनानुसारी पाठ में दूसरा वाक्य है ही नहीं। अब इससे भी सिद्ध होता है कि देवनागरी के पाठ में पुनरुक्ति रूप दूसरा वाक्य प्रक्षिप्त है।

4-0-1 बंगाली वाचना और देवनागरी-दाक्षिणात्य वाचनाओं के पाठ में, चतुर्थाङ्क के प्रारम्भ में ही एक महत्त्वपूर्ण भेद यह मिलता है कि अन्यमनस्का शकुन्तला को दुर्वासा मुनि शाप देकर चल पड़े तब उनसे शापमुक्ति की याचना करने के लिए कौन जाता है, अनसूया या प्रियंवदा?। प्रथम वाचना के मुताबिक अनसूया जाती है और द्वितीय वाचनानुसार प्रियंवदा जाती है। दोनों सहेलियाँ पुष्पावचयन कर रही थीं तब उन्होंने सुना कि आश्रम के द्वार पर कोई अतिथि आकर खड़े थे और उन्होंने शकुन्तला को शाप दे दिया है। बंगाली वाचना में, इस प्रसंग के जो संवाद अनसूया के मुख में रखे गये थे वे सब देवनागरी वाचना में पलट कर प्रियंवदा के मुख में रखे गये हैं। जैसे (बंगाली वाचना में)-

प्रियंवदा—को अण्णो हुदवहादो दहिदुं पहवदि। ता गच्छ। पादेसुं पडिअ णिअत्तावेहि जाव से अहं पि अग्घोदअं उवकप्पेमि। (कोऽन्यः हुतवहाद् दग्धुम् प्रभवति। तद्गच्छ। पादयोः पतित्वा निवर्तय यावद् अस्याहमर्घ्योदकं उपकल्पयामि।)

अनसूया—तधा। (तथा।) (इति निष्क्रान्ता)

प्रियंवदा—(पदान्तरे स्खलितं रूपयन्ती) अम्मो, आवेअक्खलिदाए पब्भट्ठं मे अग्गहत्थादो पुप्फभाअणं। (अम्मो, आवेगस्खलितायाः प्रभ्रष्टं मे अग्रहस्तात् पुष्पभाजनम्।) (नाट्येन पुष्पावचयं विधत्ते।)

अनसूया—(प्रविश्य) सहि, सरीरी विअ कोवो कस्स सो अणुणअं गेण्हदि। किं चि उण साणुकम्पो किदो। (सखि, शरीरी इव कोपः, कस्य सः अनुनयं गृह्णाति। किंचित् पुनः सानुकम्पः कृतः।)

70 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

प्रियंवदा – एदं जेव तस्सिं बहुदरं। ता कथेहि। (एतदेव तस्मिन् बहुतरम्। तत्कथय।)

अनसूया – जदो णिअत्तिदुं णेच्छदि तदो पादेसुं पणमिअ विण्णाविदो मए। भअवं। पढमभत्तिं अवेक्खिअ अज्ज तुम्ह अविण्णादपहावपरमत्थस्स दुहिदाजणस्स भअवदा अअं अवराहो मरिसिदव्वो त्ति। (यतः निवर्तितुं नेच्छति ततः पादयोः प्रणम्य विज्ञापितः मया। भगवन्, प्रथमभक्तिमवेक्ष्य अद्य तव अविज्ञात-प्रभावपरमार्थस्य दुहितृजनस्य भगवता अयमपराधः मर्षितव्यः इति।)

प्रियंवदा – तदो तदो। (ततस्ततः।)

अनसूया – तदो सो ण मे वअणं अण्णधा भवितुं अरिहदि। किं तु अहिण्णाणाभरणदंसणादो से सावो णिअत्तिस्सदि त्ति मन्तअन्तो ज्जेव अन्तरिदो। (ततः सः न मे वचनमन्यथा भवितुमर्हति। किं तु अभिज्ञानाभरणदर्शनादस्याः शापः निवर्तिष्यते इति मन्त्रयन् एवान्तरितः।)

प्रियंवदा – सक्कं दाणिं अस्ससिदुं। अत्थि तेण राएसिणा संपत्थिदेण अत्तणो णामाङ्किदं अङ्गुलीअअं सुमरावणीअं ति सउन्तलाहत्थे सअं जेव पिणद्धाविदं। एसो ज्जेव तस्सिं साहीणो उवाओ भविस्सदि। (शक्यमिदानीमाश्वसितुम्। अस्ति तेन राजर्षिणा सम्प्रस्थितेनात्मनः नामाङ्कितमङ्गुरीयकं स्मरणीयमिति शकुन्तलाहस्ते स्वयमेव पिनद्धम्। तदेषः एव तस्मिन्स्वाधीनः उपायः भविष्यति।)

अनसूया – एहि। देवकज्जं दाव से णिव्वत्तम्ह। (एहि, देवकार्यं तावदस्याः निर्वर्तयाव।)
(इति परिक्रामतः)

प्रियंवदा – (विलोक्य) अनसूये, पेक्ख दाव वामहत्थविणिहिदवअणा आलिहिदा विअ पिअसही तग्गदाए चिन्ताए अत्ताणं पि ण विभावैदि। किं उण अदिधिविसेसं। (अनसूये, प्रेक्षस्व तावत् वामहस्त-विनिहितवदना आलिखिता इव प्रियसखी तद्गतया चिन्तया आत्मानमपि न विभावयति। किं पुनः अतिथिविशेषम्।)

अनसूया – पिअंवदे, दोण्णं जेव णो हिअए एसो वुत्तन्तो चिट्ठदु। रक्खणीआ खु पइदिपेलवा पिअसही। (प्रियंवदे, द्वयोः एव नौ हृदये एषः वृत्तान्तः तिष्ठतु। रक्षणीया खलु प्रकृतिपेलवा प्रियसखी।)

प्रियंवदा – को दाव उण्होदएण णोमालिअं सिञ्चदि। (को तावदुष्णोदकेन नवमालिकां सिञ्चति)

(इत्युभे निष्क्रान्ते)

बंगाली वाचना के इस पाठ में परिवर्तन करके देवनागरी-दाक्षिणात्य में ऐसा दिखाया जाता है कि प्रियंवदा दुर्वासा से शाप-मोचन की प्रार्थना के लिए गयी थी। अब यह सोचना है कि इन दोनों में से कहाँ पर मौलिक पाठ होने की सम्भावना है?। निम्न स्तरीय

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 71

पाठालोचना के अनुसार तो बंगाली पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ पाठ प्राचीनतर है। और कश्मीर की शारदा लिपि में संचरित हुआ पाठ प्राचीनतम होने का दावा करता है, क्योंकि बंगाली-लिपि से पहले शारदा-लिपि का प्रचलन हुआ था। किन्तु लिपियों की ऐतिहासिकता से बाहर निकलकर सोचा जाय तो भी यहाँ पर अनसूया का स्वभाव अधिक स्थिर और काबिल होने से वही दुर्वासा के पास पहुँचे उसमें औचित्य है। देवनागरी पाठ के अनुसार यदि अनसूया के द्वारा प्रियंवदा को इस कार्य के लिए भेजा जाता है तो वह उसके नटखट चरित्र के साथ संगत नहीं होता है। अतः शाप-मोचन के लिए, बंगाली पाठानुसार अनसूया को ही भेजा जाय वही मौलिक प्रतीत होता है। और इसके प्रतिपक्ष में, याने देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में, शाप-मोचन की याचना के लिये प्रियंवदा का जाना पाठ-विकृति का परिणाम लगता है। क्योंकि वह प्रियंवदा के चरित्र के अनुरूप नहीं है।

इस प्रसंग का पूर्वार्द्ध बंगाली पाठ में भले ही सुरक्षित रहा हो, किन्तु जैसे ही हम आगे चल कर देखते हैं तो उसमें भी इस प्रसंग का उत्तरार्ध दूषित हुआ है ऐसा दिख रहा है। जैसे, शकुन्तला को जो शाप मिला है उसको छुपा कर रखने का प्रस्ताव अनसूया ने रखा है। यह बात अनसूया की प्रकृति के अनुरूप नहीं लगता है। इस विसंगति को समझने के लिए अवशिष्ट रही मैथिली एवं काश्मीरी वाचना के पाठ को देखना होगा। मैथिली में तो बंगाली पाठ जैसा ही चित्र है। केवल काश्मीरी पाठ में ऐसा है कि दुर्वासा के शाप की बात दो सहेलियों के बीच संगोपित रखने का प्रस्ताव प्रियंवदा के द्वारा रखा जाता है। तुलनात्मक अभ्यास से यह बात साफ प्रकट होती है कि काश्मीरी पाठ में शापमोचन के लिए अनसूया जाती है और शाप को छुपा कर रखने की बात प्रियंवदा कहती है। लेकिन इस काश्मीरी पाठ का जब मैथिली में संक्रमण हुआ होगा तब अनसूया के मुख में एक अधिक उक्ति का प्रक्षेप किया गया है: “एहि देवदाकज्जं दाव णिव्वुत्तमह। (इति परिक्रामतः।)” । (अर्थात् चलो हम दोनों उसका यानि शकुन्तला का देवकार्य सम्पन्न करें। ऐसा एक अधिक वाक्य बोलकर दोनों सहेलियाँ रंगमंच पर परिक्रमण करती हैं।) किन्तु इस नये अधिक वाक्य के कारण उसके पीछे आ रही तीनों उक्तियों की वक्ता उलटा-पुलटा हो जाती हैं। जिसके कारण शाप को छुपा के रखने की बात, जो मूल में प्रियंवदा ने की थी, वह अनसूया के मुख में आ जाती है। मैथिली वाचना में मिल रहा उपर्युक्त एक अधिक वाक्य प्रक्षिप्त है ऐसा मानने का आधार क्या है? तो उसके दो समाधान हैं: (1) दुर्वासा का शाप मिलने जैसी भूकम्पीय घटना आकारित हो जाने के बाद उसकी छाया से बाहर निकलकर क्या अनसूया देवता-कार्य के निर्वर्तन को याद करने की मानसिकता में रह सकती है? यह सम्भव ही नहीं है। अतः काश्मीरी वाचना के पाठ में जैसे प्रियंवदा कहती है कि हमारी सखी को राजा ने अङ्गूठी दे रखी है, उससे वह स्वाधीनोपाय है। तब दोनों सहेलियाँ रंगमंच पर परिक्रमण करके सीधा उसी कुटीर पर जाय (जहाँ शकुन्तला अपने प्रिय के विचारों में खोई खोई बैठी है) वही

72 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

उचित है। (2) यह दूसरा वाक्य प्रक्षिप्त होने का प्रमाण यह भी है कि शुरू में बताया गया है कि शकुन्तला को (स्वयं) सौभाग्यदेवता अर्चन भी करना है इस लिए कुछ ज्यादा पुष्पों का चयन किया जाय। इस पूर्वोक्त सन्दर्भ के विरुद्ध जब बोला जाता है कि-एहि, देवकार्यं तावद् अस्याः (शकुन्तलायाः) निर्वर्तयाव। तब वह असंगत सिद्ध होता है। क्योंकि शकुन्तला के बदले में सहेलियाँ ही उसके लिए देवकार्य सम्पन्न करने के लिए उद्यत हो जाती हैं। और देवता के पास न जा कर वे दोनों पहुँचती तो वहीं हैं जहाँ शकुन्तला अन्यमनस्क होकर बैठी है! अतः, मैथिली वाचना में दोनों सहेलियों के रंगमंच पर परिक्रमण को दिखलाते हुए जो एक अधिक वाक्य मिलता है, वह प्रक्षिप्त ही है। जिसका अनुसरण करते हुए बंगाली वाचना में, (और तदनन्तर देवनागरी इत्यादि में भी) प्रियंवदा की उक्ति अनसूया की बन जाती है।

शाप-मोचन का उपाय माँग कर अनसूया वापस आकर सब बात बताती है तो प्रियंवदा कहती है कि दुष्पन्त ने हस्तिनापुर जाते समय शकुन्तला को अङ्गूठी दी है जिससे वह स्वाधीनोपाय है, अब चिन्ता का कोई कारण नहीं है। तब प्रियंवदा से यह बात जान कर अनसूया ने जरूर इतनी सावधानी बरती है कि उसने शकुन्तला से वह अङ्गूठी किसी भी तरह से प्राप्त करके सुरक्षित करली है, और चतुर्थाङ्क के अन्त में (दोनों वाचनाओं के पाठ के अनुसार) अभिज्ञानाभरण रूप उस राजमुद्रा को शकुन्तला के हाथ में अनसूया ने ही सौंप दिया है। क्योंकि उसी अनसूया ने दुर्वासा के मुख से प्रत्यक्ष में सुना था कि किसी अभिज्ञानाभरण से ही शाप की निवृत्ति होगी। इस लम्बी चर्चा से सारभूत बात यह निकलती है कि (1) शाप-मोचन माँगने के लिये अनसूया का जाना-वही मौलिक सिद्ध होता है तथा (2) शाप की बात छुपा के रखने का प्रस्ताव अनसूया का नहीं हो सकता, वह प्रियंवदा का ही है। बंगाली पाठ में पहली बात सुरक्षित रही है, लेकिन दूसरी अशुद्धि का प्रवर्त्तन मैथिली परम्परा में हुए प्रक्षेप के कारण हुआ है। परिणामतः तीसरे स्तर पर देवनागरी और दाक्षिणात्य पाठों में दोनों तरह की अशुद्धियाँ संक्रान्त होकर सर्वत्र प्रसारित हो गयी होंगी।

अब एक छोटी सी आवश्यक स्पष्टता की जाती है: मौलिक पाठ में विचलन होने का क्रम काश्मीरी से शुरू करके, दूसरे स्तर पर मैथिली है और तदनन्तर तृतीय स्तर पर बंगाली वाचना है ऐसा मन्तव्य कहाँ से प्राप्त हुआ है? ऐसा प्रश्न किया जाय तो उसका सप्रमाण उत्तर अनुगामी अनुच्छेद में होने वाला है।

4-1-1 चतुर्थाङ्क में श्लोक-संख्या 21 से 26 तक की मिलती है। जैसे, मैथिली वाचना में 26 श्लोक हैं, तो बंगाली वाचना में 24 श्लोक हैं। किन्तु राघवभट्ट की देवनागरी वाचना में केवल 21 श्लोक प्राप्त होते हैं। इस तरह की कम-ज्यादा श्लोकसंख्या ही हमें विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि किस वाचना में मौलिक पाठ सुरक्षित रहा होगा,

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 73

या किस में प्रक्षेप हुआ होगा, अथवा किस वाचना के पाठ में संक्षेप हुआ होगा?। बंगाली वाचना के पाठ में, चतुर्थाङ्क के आरम्भ में प्रभात वेला का आकलन करने के लिए शिष्य पर्णकुटीर से बाहर निकल कर जिन चार श्लोकों का गान करता है, वे निम्नोक्त हैं

यात्येकतोऽस्तशिखरं पतिरोषधीनाम्,
आविष्कृतोऽरुणपुरःसर एकतोऽर्कः।
तेजोद्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्यां,
लोको नियम्यत इवैष दशान्तरेषु⁴⁷।।4-2

अपि च-

अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती मे
दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणीयशोभा।
इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनेन
दुःखानि नूनमतिमात्रदुरुद्वहानि⁴⁸।।4-3

अपि च-

कर्कन्धूनामुपरि तुहिनं रञ्जयत्यग्रसन्ध्या
दार्भं मुञ्चत्युटजपटलं वीतनिद्रो मयूरः।
वेदिप्रान्तात् खुरविलिखिताद् उत्थितश्चैष सद्यः,
पश्चादुच्चैर्भवति हरिणः स्वाङ्गमायच्छमानः⁴⁹।।4-4

अपि च-

पादन्यासं क्षितिधरगुरोर्मूर्ध्नि कृत्वा सुमेरोः
क्रान्तं येन क्षयिततमसा मध्यमं धाम विष्णोः।


  1. (अनुवाद)-एक ओर चन्द्रमण्डल अस्तशिखर को पहुँच रहा है और एक ओर अरुण को आगे किये उदित हो रहा है सूर्य। दो तेज और दोनों का एक साथ व्यसन (अस्त) तथा अभ्युदय। इनसे लोक को शिक्षा मिलती है अपनी दशा बदलने की। कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2), अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जायिनी, 2008, पृ. 399
  2. (अनुवाद)-चन्द्र डूब गया तो वही कुमुद्वती अब आँखों को आनन्दित नहीं कर रही है। इष्ट (प्रिय) के प्रवास से उत्पन्न दुःख अबलाओं को अत्यन्त दुःसह होते हैं।-कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2), अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जायिनी, 2008, पृ. 399
  3. (अनुवाद)-और देखो बेरों के ऊपर पड़ी ओस को उषाकाल रंग रहा है, जागा मोर लकड़ी के उटज पटल को छोड़ रहा है, खुरों से खुदे वेदिका के छोर से हाल ही उठ खड़ा हुआ मृग अपने शरीर को लम्बा खींचते हुए पिछले भाग से ऊँचा हो रहा है-कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2), अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जायिनी, 2008, पृ. 398

74 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

सोऽयं चन्द्रः पतति गगनादल्पशेषैर्मयूखै-
रत्यारूढिर्भवति महतामप्यपभ्रंशनिष्ठा⁵⁰ ।। 4-5
(द्विवेदी, 2008)

बंगाली वाचना के पूर्वनिर्दिष्ट चार श्लोकों का एक साथ होना सम्भव नहीं लगता है, क्योंकि नाटक जैसी समय सीमा में आबद्ध कला में इतना लम्बा वर्णन असह्य होता है। एवमेव, यहाँ तो कण्वाश्रम का शिष्य केवल प्रभातकाल का आकलन करने के लिए इन श्लोकों का गान करता है। इस सन्दर्भ को देखते हुए यहाँ चार चार श्लोकों का होना सम्भव नहीं है। मतलब कि यहाँ बंगाली वाचना पाठ मौलिकता के नजदीक नहीं लगता है। अतः अन्य वाचनाओं में इस स्थान की क्या स्थिति है? इसको ध्यान में लेकर पाठालोचना शुरू करनी होगी। जैसे, उपर्युक्त चार श्लोकों में से पहले दो “याति”० एवं “अन्तर्हिते”० श्लोकों को देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचनाओं ने मान्य किया है। तथा काश्मीरी वाचना ने केवल “कर्कन्धूनाम्”० और “पादन्यासं”० को ही मान्य किया है। अर्थात् इन दोनों वाचनाओं में केवल दो दो श्लोकों को ही स्थान मिल पाया है। परन्तु दोनों वाचनाओं ने जिन दो श्लोकों को मान्य रखा है वे दोनों भिन्न-भिन्न श्लोक हैं। अलबत्ता चार चार श्लोकों को स्वीकारनेवाली बंगाली पाठपरम्परा की अपेक्षा से केवल दो ही श्लोकों को मान्य करनेवाली वाचनाओं को ही बेहतर मानना होगा। अतः यहाँ सोचना होगा कि केवल दो दो श्लोकों को प्रस्तुत करनेवाली देवनागरी एवं काश्मीरी जैसी वाचनाओं में से किस का पाठ मौलिक, अर्थात् कालिदास-प्रणीत होगा?

देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में जिन दो श्लोकों को (“याति”० एवं “अन्तर्हिते”०) स्थान मिला है, उन दोनों में शकुन्तला के भावी दुर्दैव का सूचन रखा गया है, किन्तु किसी भी नाट्यकृति में विचारों की पुनरुक्ति करने में समय की हानि होती है, जो नाट्यकला में असह्य मानी गयी है। दूसरा, इन दोनों श्लोकों को “अपि च” निपात से बाँधा गया है, लेकिन “अपि च” के विनियोग का पूर्वोक्त स्वारस्य यहाँ घटित नहीं होता है। तीसरा, इन श्लोकों में जो वसन्ततिलका छन्द का विनियोग हुआ है, वह विरह, करुणा, दुःख भरे भावों की अभिव्यक्ति के लिए संगत नहीं बैठता है। इन श्लोकों में तो शकुन्तला के भावी दुःख का सूचन किया जा रहा है, अतः यहाँ वसन्ततिलका जैसे छन्द को देख कर भी यह सूचित होता है कि ये कालिदास-प्रणीत नहीं हो सकते हैं।

इसी तरह से, भूतकाल में आचार्य शरदरञ्जन राय (राय, 1908) ने भी इन दोनों को


50. (अनुवाद)– जिस (इन्द्र) ने पर्वतराज सुमेरु के सिर पर पादन्यास पर अँधियारी दूर करते हुए भगवान् विष्णु के दूसरे धाम पर विचरण किया था वही चन्द्र अब बहुत कम बची किरणों के साथ आकाश से गिर रहा है। अत्यारूढि बड़ों को भी पतन का मुख दिखलाती है। –कालिदासग्रन्थावली, (भाग-2) अनु. पं. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी, कालिदास अकादमी, उज्जयिनी, 2008, पृ. 398

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 75

प्रक्षिप्त मानना चाहिए ऐसी बात कही थी। उनका कहना था कि पूर्वार्ध में जो वर्णन है वह प्राभातिक समय का आकलन करने के लिए उपयुक्त नहीं है। यदि सूर्य आविष्कृत हो ही गया है तो फिर “होमवेला हो गयी है, चलो गुरु को उसका निवेदन किया जाय” ऐसा कहना सुसंगत नहीं है। यदि इस श्लोक में “आविष्कृतारुण” ऐसे सामासिक शब्द को पाठान्तर के रूप में लिया जाय तो व्यसनोदय के यौगपद्य का कथन दूषित होता है। तथा इस श्लोक में प्रक्रमभङ्ग दोष भी हो रहा है, इस लिए इन दोनों श्लोकों का मौलिक होना सम्भव नहीं है।

दूसरे पक्ष में, याने काश्मीरी वाचनानुसारी पाठ में अन्य दो (कर्कन्धूनाम्० एवं पादन्यासं०) श्लोकों को स्वीकार किया गया है। यहाँ सब से पहले यह कहना होगा कि ब्राह्मी लिपि से निकली हुई अन्यान्य लिपियों में शारदा लिपि का क्रम बंगालीलिपि की अपेक्षा से पहले है। अतः उसमें संचरित हुई पाठपरम्परा को अधिक श्रद्धेय एवं प्राचीनतम मानना होगा। फिर भी इसकी मौलिकता पर तर्कपूर्ण विचार करना होगा। देवनागरी की तुलना में देखा जाय तो काश्मीरी वाचनावाले दोनों श्लोकों में मन्दाक्रान्ता छन्द का प्रयोग हुआ है, जो उस श्लोक में प्रकट किये गये शकुन्तला के भावी दुःख भरे दिवसों के साथ सुसंगत है। दूसरा, इन दोनों श्लोकों को भी “अपि च” निपात से बाँधा गया है, तथापि इन दो श्लोकों की निरूप्यमाण विषयवस्तु में पुनरुक्ति नहीं है क्योंकि कर्कन्धूनाम्० वाले श्लोक की प्रासंगिकता जाँची जाय तो (= प्रभात के समय का आकलन करना) स्वयं स्पष्ट है, तथा पादन्यासं क्षितिधरगुरोः० वाले दूसरे श्लोक से प्राकरणिक अर्थ (=शकुन्तला की भावी अवदशा) का सूचन हो रहा है, और उसके साथ अनसूया की उक्ति का अनुसन्धान भी हो जाता है। परिणामतः यहाँ इन दोनों श्लोकों के बीच में जो “अपि च” का विनियोग हुआ है, वह भी समुच्चयार्थक के रूप में सुसंगत बैठता है। कण्वाश्रम के शिष्य ने पहले श्लोक में, यज्ञवेदी के प्राङ्गण में अपने सम्मुख जो चहलपहल हो रही है उसका चित्र खींचा है। दूसरे श्लोक में शिष्य ने ऊर्ध्व दृष्टि करके देखा तो चन्द्रमा का पतन हो रहा है, उसका वर्णन किया है। कालिदास किसी भी दृश्य की द्विपार्श्वी रमणीयता को वर्णित करने के लिये “अपि च” का प्रयोग करते हैं, ऐसा जो पहले कहा गया है उसका चारितार्थ्य इन दो श्लोकों में ही सिद्ध होता है। इस दृष्टि से इन (कर्कन्धूनाम्० एवं पादन्यासं०) दोनों श्लोकों की ही मौलिकता सिद्ध होती है।

पूर्वोक्त चार श्लोकों में से (देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना में जिन दोनों को मान्यता मिली है वे) दो श्लोक प्रक्षिप्त होने के प्रमाण मिल रहे हैं और अन्य दो श्लोकों (जिनको काश्मीरी वाचना में मान्यता मिली है उन)का मौलिक होना प्रतीत होता है तो अब प्रश्न होगा कि यह बात कैसे बनी कि बंगाली वाचना में चारों श्लोक एक स्थान पर हाजिर हो गये? इस प्रश्न का उत्तर बंगाली वाचना में से नहीं मिल सकता है। उसके लिए तो इस

76 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

समग्र चर्चा में अवशिष्ट रही मैथिली वाचना की पाठपरम्परा को देखना होगा। वहाँ पर भी यद्यपि उपर्युक्त चारों श्लोकों का स्वीकार हुआ है, किन्तु उसमें इन चारों श्लोकों का उपस्थिति क्रम भिन्न है, वह ध्यातव्य है। मैथिली वाचना में 1. कर्कन्धूनाम्०, 2. पादन्यास०, 3. याति० और 4. अन्तर्हिते०-इस क्रम से चारों श्लोकों को अवतारित किया है। यह क्रमभेद इस बात का द्योतक हो सकता है कि काश्मीरी वाचना के जिन दो श्लोकों में मौलिकता झलक रही है उसका स्थान मैथिली परम्परा में पहला बना रहा है। और फिर कालान्तर में, उसके पीछे दो नये श्लोकों का प्रक्षेप हुआ होगा। यहाँ याति० और अन्तर्हित० श्लोकों को कब किसने प्रक्षिप्त किया यह तो हम नहीं जान सकते हैं, लेकिन शारदा-लिपि की पाठपरम्परा में मौलिक पाठ का संचरण होने के बाद, द्वितीय स्तर में मैथिली में उसका अनुसरण होने का प्रमाण यही है कि काश्मीरी पाठ का श्लोकक्रम उसमें यथावत् रहा है। और सामान्यतया प्रक्षिप्तांश का क्रम दूसरा ही रहता है, इस दृष्टि से प्रक्षिप्त सिद्ध हो रहे दोनों श्लोकों का क्रम तीसरे-चौथे स्थान पर रखा गया है। तथा “अपि च” जैसे समुच्चयार्थक निपात का सहारा लेकर ऐसा प्रक्षेप करना आसान भी था। पाठसंचरण के दौरान “अपि च” से प्रक्षेपों का प्रस्ताव करने की चेष्टा एक आम बात है।

मैथिली पाठपरम्परा में दो नये श्लोकों का प्रक्षेप होने के बाद, जब शङ्कर ने (झा, 1957) इन दोनों श्लोकों के ऊपर रसचन्द्रिका जैसी टीका लिखी होगी तब इन दोनों का महत्त्व बढ़ गया होगा। शङ्कर ने याति० वाले श्लोक का ध्वन्यर्थ निकालते हुए लिखा है कि “एतावता पतितः सौभाग्यगर्वितायाः शकुन्तलाया अग्रे दुःखं भविष्यतीति सूचितम्।”, तथा अन्तर्हिते० श्लोक का व्यंग्यार्थ बताते हुए लिखा कि “अन्यापदेशेन शकुन्तला झटिति दुष्पन्तचित्ताहरणरूपेणात्यारोहेण विरहाम्बुधौ पतिष्यतीति सूचितम्।” (रसचन्द्रिका, पृ. 235) इस टीका ने प्रक्षिप्त श्लोकों में रही चमत्कृति जरूर उद्घाटित की, लेकिन उसमें पुनरुक्ति हो रही है एवं उसमें प्रासंगिक सन्दर्भ (प्रभातकाल का बोध) छूट गया है-यह बात शङ्कर ने नहीं पहचानी। परिणामतः, तीसरे स्तर पर, शङ्कर ने जिसका ध्वन्यर्थ दिखाया था इन दोनों (प्रक्षिप्त श्लोकों) को बंगाली वाचना में प्राथम्य मिल गया। अर्थात् शाकुन्तल की पाठपरम्परा में दो मौलिक श्लोकों के साथ दो नये श्लोकों का प्रक्षेप होने के बाद, बंगाली वाचना में इन चारों का क्रम उलटा-पुलटा किया गया होगा। जिसमें याति० एवं अन्तर्हित० को पहला-दूसरा स्थान मिला और कर्कन्धूनाम्० एवं पादन्यासं० को तीसरा-चौथा स्थान दिया गया। (मैथिली पाठ से विपरीत क्रम जो बंगाली पाठ में दृश्यमान हो रहा है उसमें ही पाठविचलन का पौर्वापर्य निर्धारित हो रहा है।) चतुर्थ स्तर पर, जब मूल पाठ में कटौती करके इस नाटक के संक्षेपीकरण का कार्य हाथ पर लिया गया होगा तब, (बंगाली वाचना में) तीसरे एवं चौथे क्रम पर जो श्लोक थे उनको देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में से हटाया गया। लेकिन हकीकत ऐसी सिद्ध हो रही है कि जिन दो श्लोकों को देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में से हटाया गया वे ही केवल मौलिक होने का दावा कर सकते हैं।

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 77

इस तरह से प्रातःकाल का वर्णन करने के बहाने चतुर्थाङ्क के प्रारम्भ में “अपि च” निपातों से जुड़ी चार श्लोकों वाली जो शृङ्खला मिल रही है उसका तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करने से शाकुन्तल की पाठपरम्परा में जो विचलन हुआ है उसका पौर्वापर्य निर्धारित किया जा सकता है। यह एक स्थान ऐसा पहली बार ध्यान में आ रहा है जिसके सहारे हम शाकुन्तल के मौलिक पाठ के विचलन के क्रम को समझ सकते हैं।

4-1-2 बंगाली वाचनानुसारी चतुर्थाङ्क के पाठ में एक स्थान द्रष्टव्य हैः शकुन्तला की बिदाई के समय आश्रमस्थित सभी पेड़-पौधे और पशु-पक्षी आदि संतप्त हैं। यहाँ पर अनसूया कहती है कि इस आश्रम में ऐसा कोई नहीं है जो तेरे विरह से दुःखी न हो। देख यह चक्रवाक की स्थिति ..... इत्यादि। उसकी मूल प्राकृत उक्ति इस तरह की है “सहि, ण णो अस्समपदे अत्थि को वि चित्तवन्तो जो तए विरहीअन्तो अज्ज ण ऊसुओ ण किदो। पेक्ख,

पुड्डुंणिवत्तन्तरिदं वाहरिदो णाणुवाहरेइ पिअं।
मुहउव्वूढमृणालो तइ दिट्ठिं देइ चक्काओ॥ 4-18

(सखि, न नः आश्रमपदे अस्ति कोऽपि चित्तवान् यः त्वया विरह्यमाणः अद्य न उत्सुकः कृतः। प्रेक्षस्व-पुटकिनीपत्रान्तरिताम् व्याहतः नानुव्याहरति प्रियाम्। मुखोद्ध्यूढमृणालः त्वयि दृष्टिं ददाति चक्रवाकः।)

बंगाली पाठ में अनसूया के मुख में रखी चक्रवाक-सम्बद्ध यह एक ही उक्ति मिलती है। दूसरी ओर देवनागरी में इस सन्दर्भ में शकुन्तला एवं अनसूया के द्वारा बोली गयी दो उक्तियाँ मिलती हैं जो निम्न स्वरूप में हैं, यहाँ शकुन्तला की उक्ति से आरम्भ हो रहा हैः

शकुन्तला—हला, पश्य, नलिनीपत्रान्तरितमपि सहचरम् अपश्यन्त्यातुरा चक्रवाक्यारौति, दुष्करमहं करोमीति।
अनसूया—सखि, मा मैवम् मन्त्रय।

एसा वि पिएण विणा गमेइ रअणिं विसाअदीहअरं।
गरुअं पि विरहदुक्खं आसाबन्धो सहावेदि॥
(एषापि प्रियेण विना गमयति रजनीं विषाददीर्घतराम्।
गुर्वपि विरहदुःखमाशाबन्धः साहयति।।)

किन्तु इन दोनों में मूल पाठ्यांश में संक्षेप किया ही गया है। इसकी जानकारी हम जब काश्मीरी वाचना का पाठ देखते हैं तब मिलती है, क्योंकि उसमें तीनों उक्तियों वाला अखण्ड पाठ सुरक्षित रहा है, जो निम्नोक्त हैः

अनसूया—सहि, ण सो अस्समपदे अत्थि को वि चित्तवन्तो जो तए विरहअन्तीए ण उस्सुओ किदो अज्ज। पेक्ख दाव,

78 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

पुड्डणिवत्तन्तरिदं वाहरिदो णाणुवाहरेइ पिअं।
मुहउव्वूढमृणालो तइ दिट्टिं देइ चक्काओ।।4-18

(सखि, न सः आश्रमपदे अस्ति कोऽपि चित्तवान् यः त्वया विरह्यमाणया न उत्सुकः कृतः अद्य। पश्य तावत्-पद्मिनीपत्रान्तरिताम् व्याहतः नानुव्याहरति प्रियाम्। मुखोढूढमृणालः त्वयि दृष्टिं ददाति चक्रवाकः।।)।

शकुन्तला- (जनान्तिकम्) हला पेक्ख, नलिनीपत्तन्तरिदंपि सहअरं अदेक्खन्ती आदुरं चक्कवाई आरडइ। दुक्करं खु अहं करेमिति। (हला, पश्य, नलिनीपत्रान्तरितमपि सहचरम् अपश्यन्त्यातुरा चक्रवाक्याटति, दुष्करं खलु अहं करोमीति।)

प्रियंवदा- सहि, मा एव्वं मन्तेहि। (सखि, मा मैवम् मन्त्रय।)

एस वि पिएण विणा गमेइ रअणिं विसूरणादीहं।
गरुअं पि विरहदुक्खं आसाबन्धः सहावेदि।।
(एषापि प्रियेण विना गमयति रजनीं विसूरणादीर्घाम्।
गुर्वपि विरहदुःखम् आशाबन्धः साहयति।।)

इस तरह चक्रवाकी से सम्बद्ध तीनों उक्तियाँ काश्मीरी में सुरक्षित रही हैं। तथा मैथिली वाचना में भी ये तीनों सुरक्षित रही हैं, और हम तक पहुँची भी हैं$^{51}$ जिसका उल्लेख डॉ० बेलवलकरजी ने नहीं किया है।$^{52}$ यद्यपि चक्रवाक की उक्तियों में कटौती हुई है इसकी ओर सबसे पहले ध्यान आकृष्ट करनेवाले मूर्धन्य विद्वान् एस. के. बेलवलकर जी ही थे। (निसर्ग कन्या शकुन्तला, 1962 (वि. सं. 2019) उन्होंने शकुन्तला की एक “निसर्ग कन्या” के रूप में पहचान प्रस्थापित करके ऐसी अपेक्षा व्यक्त की है कि शकुन्तला जब पतिगृह की ओर प्रस्थान कर रही है तब भले ही सहेलियों ने एवं पिता कण्व ने दुर्वासा के शाप की जानकारी शकुन्तला को न दी हो, किन्तु प्रकृति-समस्त में से किसी वनस्पति ने या पशु-पक्षी ने क्यों शकुन्तला को इस शाप के सन्दर्भ में सावधान नहीं किया? यही एक बड़ी समस्या है। ऐसा कुछ होना न केवल अपेक्षित था, अनिवार्य भी था। काश्मीरी वाचना में, चक्रवाकवाले प्रसंग में यह आकारित किया गया है। किन्तु दुर्भाग्य से बंगाली एवं देवनागरी वाचनाओं में कुल तीन उक्तियों में से एक एवं दो उक्तियाँ ही हम तक संचरित हो कर आई हैं। यदि काश्मीरी वाचना की (तथा मैथिली वाचना की) पाण्डुलिपियाँ प्राप्त करके देखा जाय तो तीनों उक्तियों वाला पूर्ण संवाद, जो उपर्युक्त अवतरण में दिया गया है


  1. द्रष्टव्य-मिथिला विद्यापीठ, दरभंगा से प्रकाशित श्रीरमानाथ झा द्वारा संपादित-अभिज्ञानशाकुन्तलम्, पृ. 75
  2. लेकिन चक्रवाक सम्बन्धी जो तीन उक्तियाँ काश्मीरी में होने के साथ साथ मैथिली में भी मिल रही हैं वह इसी बात का साक्ष्य दे रहा है कि शाकुन्तल की उपलब्ध पाठ परम्परा काश्मीरी वाचना में से पहले मैथिली वाचना में गयी होगी और तदनन्तर ही वह पाठ बंगाली में गया होगा।

अभिज्ञानशकुन्तलम्      प्रस्तावना      79


वह हम तक संचरित होकर आया ही है। चक्रवाक के इस प्रसंग में (तीनों संवादों के द्वारा) शकुन्तला को दुष्यन्त की ओर से नकारात्मक प्रतिभाव ही मिलेगा और शकुन्तला को कुछ कालावधि तक पुनर्मिलन की प्रतीक्षा करनी होगी ऐसा व्यंजित किया गया है।

श्री बेलवलकरजी के शब्दों में देखें तो—“यहाँ पर पूरी घटना शकुन्तला को यह समझाने के लिए लायी गयी है कि आगे तुम्हारे भाग्य में क्या बदा है। चकवी पुकारती है किन्तु चक्रवाक उत्तर नहीं देता, क्योंकि उत्तर न देने के कारणों पर उसका कोई वश नहीं है, उसका हृदय शकुन्तला के वियोग से भरा हुआ है। इसी प्रकार शीघ्र ही शकुन्तला भी पुकारेगी और दुष्यन्त भी उसका उत्तर नहीं देगा। अनसूया अपनी सखी को सान्त्वना देती है और वह विश्वास के साथ सान्त्वना दे भी सकती थी क्योंकि उसके हाथ में शाप का अन्त करानेवाली अँगुठी तो थी ही। इसीलिए ठीक इस घटना से अगले संवाद में ये सखियाँ शकुन्तला को अँगूठी का स्मरण करा देती हैं। दूसरी दृष्टि से हम कह सकते हैं कि कण्व ने अपने जिस शोक को प्रकट नहीं होने दिया उसी को चक्रवाक ने एक प्रकार के दैवी परिज्ञान से समझकर शकुन्तला को भावी विपत्ति और दुःख की चेतावनी दे दी।$^{53}$” इस उच्च स्तरीय पाठालोचना से यह सुदृढ हो जाता है कि बंगाली वाचना में और देवनागरी वाचना में संचरित होकर जो पाठ हम तक पहुँचा है वह प्रकृत सन्दर्भ में संक्षिप्त किया गया पाठ है।

4-1-3 बंगाली वाचनानुसारी चतुर्थांक के पाठ में दूसरे स्थान पर एक श्लोक का जो संक्षेप मिलता है वह इस तरह का हैः-शकुन्तला पतिगृह की ओर प्रस्थान कर रही है तब (बंगाली वाचनानुसारी चतुर्थांक के पाठ में) इस तरह का संवाद हैः शकुन्तला कण्व से पूछती है कि मैं पति के घर जा रही हूँ, लेकिन पिताजी आपका विरह कैसे सह पाऊँगी? तब पिता कण्व श्लोक 4-22 से उत्तर देते हैं कि कुलीन व्यक्ति के घर में गृहिणी पद प्राप्त होने के बाद तू बहुविध कार्यकलाप में व्यस्त हो जायेगी और तेरे अङ्क में पुत्र का आगमन हो जाने के बाद तो सुख ही सुख होने से तू मेरे विरह से उत्पन्न होनेवाले दुःख को भूल जायेगी। इतना सुनने के बाद शकुन्तला पिता के चरणों में प्रणाम करती है (ऐसी रंगसूचना है)। अर्थात् बंगाली में कण्वमुनि एक ही श्लोक बोलते हैं। किन्तु इस सन्दर्भ का काश्मीरी एवं मैथिली पाठ निम्नोक्त है, जिसमें कण्व दो श्लोक बोलते हैं:

शकुन्तला—कधं तादस्स अङ्कादो परिब्भट्ठा मलअपव्वदुम्मूलिदा विअ चन्दणलदा देसन्तरे जीविदं धारइस्सं। (इति रोदिति) (कथं तातस्याङ्कात् परिभ्रष्टा मलयपवनोन्मूलिता इव चन्दनलता देशान्तरे जीवितं धारयिष्ये।)


  1. निसर्ग कन्या शकुन्तला-शीर्षकवाला आलेख, जो कालिदास-ग्रन्थावली (तीसरा खण्ड, समीक्षा निबन्ध, पृ. 59 से 70), अनुवादक-सीताराम चतुर्वेदी ने अलीगढ से 1962 में प्रकाशित किया है वह बार बार द्रष्टव्य है।

80 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

कण्वः- वत्से, किमेवं कातरासि।

अभिजनवतो भर्तुः श्लाघ्ये स्थिता गृहिणीपदे
विभवगुरुभिः कृत्यैस्तस्य प्रतिक्षणमाकुला।
तनयमचिरात् प्राचीवार्कं प्रसूय च पावनं
मम विरहजं न त्वं वत्से शुचं गणयिष्यसि।। 4-22

अपि च, इदमवधारय

यदा शरीरस्य शरीरिणश्च पृथक्त्वमेकान्तत एव भावि।
आहार्ययोगेन वियुज्यमानः परेण को नाम भवेद् विषादी।। 4-23

शकुन्तला- (पितुः पादयोः पतित्वा) ताद वन्दामि।

यहाँ श्लोक 22 के नीचे, “अपि च” निपात से बाँधा गया एक श्लोक-23 दिख रहा है, जो केवल काश्मीरी एवं मैथिली वाचना के पाठ में ही उपलब्ध होता है। बंगाली, देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचनाओं में वह नहीं मिलता है। डॉ० एस. के. बेलवलकरजी के द्वारा सम्पादित अभिज्ञानशाकुन्तल में भी वह श्लोक नहीं मिलता है, किन्तु ऑक्सफर्ड लाईब्रेरी में सुरक्षित दो शारदा पाण्डुलिपियों में यह श्लोक “अपि च” निपात से अवतारित किया गया है। अतः विचारणीय है कि क्या दूसरा श्लोक “अपि च” के विनियोग से काश्मीरी-मैथिली में प्रक्षिप्त किया गया होगा या फिर मौलिक होते हुए भी बंगाली, देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में से उसे हटाया गया है? यहाँ पूर्वधारणा के रूप में मान लिया जाय कि मूल पाठ में पहलेवाला एक ही श्लोक रचा गया था। अब, पहले श्लोक 22 में शकुन्तला को पिता की याद नहीं आयेगी उसके लिए बहुत प्रीतिकारक कारण पेश किये गये हैं। फिर भी यह चिन्त्य तो है ही कि पुत्री को ससुराल में कितना भी सुख मिल जाय तो भी क्या वह अपने पिता को भुला सकती है? सब का अनुभवजन्य उत्तर यही है कि ढेर सारे सुख में भी पुत्री अपने पिता को कदापि नहीं भुला सकती है। अतः प्रश्न होगा ही कि क्रान्तद्रष्टा महाकवि ने यहाँ सर्वजनानुभव-विरुद्ध क्यों लिखा है? क्या सचमुच में शकुन्तला सुखातिशय में भी पिता कण्व को भुला देगी? वृद्ध पिता की कोई चिन्ता उसे नहीं सताती रहेगी? इस प्रश्न का एक ही उत्तर सभी रसिकों के मन में होगा कि शकुन्तला अपने पिता को हरगिज नहीं भूल सकती है। यह बात कण्व भी जानते होंगे, अतः यहाँ उनको कुछ अधिक कहने की आवश्यकता होगी। यदि मूल पाठ में पहलेवाला एक ही श्लोक था ऐसी पूर्वधारणा को छोड़कर, काश्मीरी और मैथिली वाचना में आया हुआ दूसरा श्लोक भी मूल में होगा ऐसा स्वीकारते हैं तो उपर्युक्त क्षति का विसर्जन होता है।

प्रस्तुत चर्चा में पहले कहा गया है कि इस नाट्यकृति में एक श्लोक के बाद “अपि च” से अवतारित दूसरे श्लोक में प्रवर्तमान दृश्य या विचार का दूसरा पहलू रखा जाता है।

अभिज्ञानशकुन्तलम् \qquad प्रस्तावना \qquad 81

ऐसा होना अनिवार्य है, क्योंकि समुच्चयार्थक “अपि च” का प्रयोग तभी हो सकता है जब प्रस्तुत विचार का दूसरा पहलू भी सम्मिलित करना हो। इस दृष्टि से सोचा जायेगा तो पहले श्लोक में शकुन्तला को ससुराल में सुख मिलने पर वह पिता को भूल जायेगी ऐसा कहा जाता है। तत्पश्चात् दूसरे ही श्लोक में कहा जाता है कि इन ऐहिक सुखों के बीच में भी शकुन्तला के हृदयाकाश में पिता के वार्धक्य को लेकर सदैव चिन्ता विद्यमान रहनेवाली है तो उसका निरसन करने के लिए क्रान्तद्रष्टा कालिदास ने ऋषि कण्व से निम्नोक्त दूसरा श्लोक कहलाया है:

अपि चेदमवधारय
यदा शरीरस्य शरीरिणश्च पृथक्त्वमेकान्तत एव भावि।
आहार्ययोगेन वियुज्यमानः परेण को नाम भवेद् विषादी।। 4-23

शकुन्तला—ताद वन्दामि। (पितुः पादयोः पतति।)

अर्थात् कण्व ने शकुन्तला को आश्वासन देते हुए “अपि च” से अवतारित 23 वें श्लोक से यह भी कह दिया है कि शरीर और शरीरी का पृथक्त्व अवश्यंभावी है। जैसे कोई नट अपने पहने हुए मुकुटादि आहार्य चीजों का त्याग करते समय दुःखी नहीं होता, (वैसे ही कल कण्वमुनि के देहावसान की खबर मिले तो भी शकुन्तला को दुःखी नहीं होना चाहिए)। यहाँ “अपि च” के प्रयोग का याथार्थ्य पूर्ण रूप से सिद्ध होता है। कण्व ने अपनी पुत्री को दो बातें कह कर उसे दोनों दृष्टियों से स्वस्थ मनःस्थितिवाली बनाया है। एक तो ससुराल में निरतिशय सुख एवं नयी जिम्मेवारियों को लेकर पिता की याद नहीं आयेगी, और दूसरा पिता का शरीर आहार्य चीज रूप है, जो एक दिन नष्ट होनेवाला है तो उसकी चिन्ता करना जरूरी नहीं है। आश्रम में पली ऋषिकन्या के लिए आरण्यक पिता का यह औपनिषदिक दर्शन इस स्थान पर एकदम सुसंगत प्रतीत होता है। और इस दृष्टि से देखा जायेगा तो “अपि च” का विनियोग भी समुच्चयार्थक के रूप में यहाँ सर्वथा चरितार्थ हो रहा है। अतः काश्मीरी और मैथिली वाचना में दृश्यमान यह दूसरा श्लोक मौलिक होने में संदेह नहीं रहता है।

उपर्युक्त दो श्लोकोंवाला काश्मीरी पाठ जो पहले मैथिली पाठ में संक्रान्त हुआ होगा वह वहाँ पर सुरक्षित रहा है। लेकिन तीसरे स्तर पर बंगाली एवं देवनागरी तथा दाक्षिणात्य वाचनाओं में से, “अपि च” से अवतारित दूसरा श्लोक हटाया गया होगा। इस प्रकार के संक्षिप्तीकरण से चतुर्थाङ्क का एक विशेष सौन्दर्य, जो दार्शनिक पिता के वचनों में से झलक रहा है उससे हम वंचित रह जाते हैं। कालिदास ने अपने अन्य काव्यों में भी औपनिषदिक दर्शन व्यक्त किया है और इस चतुर्थाङ्क में भी शकुन्तला जब पूछती है कि पिताजी इस तपोवन को मैं फिर से कब देख पाऊँगी? तब कण्व मुनि ने कहा है कि उत्तरावस्था में दौष्यन्ति (भरत) के कन्धों पर राज्यधुरा स्थापित करके शान्ति के लिए इस