भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 262 में से

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76 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्

समग्र चर्चा में अवशिष्ट रही मैथिली वाचना की पाठपरम्परा को देखना होगा। वहाँ पर भी यद्यपि उपर्युक्त चारों श्लोकों का स्वीकार हुआ है, किन्तु उसमें इन चारों श्लोकों का उपस्थिति क्रम भिन्न है, वह ध्यातव्य है। मैथिली वाचना में 1. कर्कन्धूनाम्०, 2. पादन्यास०, 3. याति० और 4. अन्तर्हिते०-इस क्रम से चारों श्लोकों को अवतारित किया है। यह क्रमभेद इस बात का द्योतक हो सकता है कि काश्मीरी वाचना के जिन दो श्लोकों में मौलिकता झलक रही है उसका स्थान मैथिली परम्परा में पहला बना रहा है। और फिर कालान्तर में, उसके पीछे दो नये श्लोकों का प्रक्षेप हुआ होगा। यहाँ याति० और अन्तर्हित० श्लोकों को कब किसने प्रक्षिप्त किया यह तो हम नहीं जान सकते हैं, लेकिन शारदा-लिपि की पाठपरम्परा में मौलिक पाठ का संचरण होने के बाद, द्वितीय स्तर में मैथिली में उसका अनुसरण होने का प्रमाण यही है कि काश्मीरी पाठ का श्लोकक्रम उसमें यथावत् रहा है। और सामान्यतया प्रक्षिप्तांश का क्रम दूसरा ही रहता है, इस दृष्टि से प्रक्षिप्त सिद्ध हो रहे दोनों श्लोकों का क्रम तीसरे-चौथे स्थान पर रखा गया है। तथा “अपि च” जैसे समुच्चयार्थक निपात का सहारा लेकर ऐसा प्रक्षेप करना आसान भी था। पाठसंचरण के दौरान “अपि च” से प्रक्षेपों का प्रस्ताव करने की चेष्टा एक आम बात है।

मैथिली पाठपरम्परा में दो नये श्लोकों का प्रक्षेप होने के बाद, जब शङ्कर ने (झा, 1957) इन दोनों श्लोकों के ऊपर रसचन्द्रिका जैसी टीका लिखी होगी तब इन दोनों का महत्त्व बढ़ गया होगा। शङ्कर ने याति० वाले श्लोक का ध्वन्यर्थ निकालते हुए लिखा है कि “एतावता पतितः सौभाग्यगर्वितायाः शकुन्तलाया अग्रे दुःखं भविष्यतीति सूचितम्।”, तथा अन्तर्हिते० श्लोक का व्यंग्यार्थ बताते हुए लिखा कि “अन्यापदेशेन शकुन्तला झटिति दुष्पन्तचित्ताहरणरूपेणात्यारोहेण विरहाम्बुधौ पतिष्यतीति सूचितम्।” (रसचन्द्रिका, पृ. 235) इस टीका ने प्रक्षिप्त श्लोकों में रही चमत्कृति जरूर उद्घाटित की, लेकिन उसमें पुनरुक्ति हो रही है एवं उसमें प्रासंगिक सन्दर्भ (प्रभातकाल का बोध) छूट गया है-यह बात शङ्कर ने नहीं पहचानी। परिणामतः, तीसरे स्तर पर, शङ्कर ने जिसका ध्वन्यर्थ दिखाया था इन दोनों (प्रक्षिप्त श्लोकों) को बंगाली वाचना में प्राथम्य मिल गया। अर्थात् शाकुन्तल की पाठपरम्परा में दो मौलिक श्लोकों के साथ दो नये श्लोकों का प्रक्षेप होने के बाद, बंगाली वाचना में इन चारों का क्रम उलटा-पुलटा किया गया होगा। जिसमें याति० एवं अन्तर्हित० को पहला-दूसरा स्थान मिला और कर्कन्धूनाम्० एवं पादन्यासं० को तीसरा-चौथा स्थान दिया गया। (मैथिली पाठ से विपरीत क्रम जो बंगाली पाठ में दृश्यमान हो रहा है उसमें ही पाठविचलन का पौर्वापर्य निर्धारित हो रहा है।) चतुर्थ स्तर पर, जब मूल पाठ में कटौती करके इस नाटक के संक्षेपीकरण का कार्य हाथ पर लिया गया होगा तब, (बंगाली वाचना में) तीसरे एवं चौथे क्रम पर जो श्लोक थे उनको देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में से हटाया गया। लेकिन हकीकत ऐसी सिद्ध हो रही है कि जिन दो श्लोकों को देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं में से हटाया गया वे ही केवल मौलिक होने का दावा कर सकते हैं।